24 January 2015

जेटली जी विज्ञापन को छुट्टा रखेंगे

-दिलीप ख़ान

अभी टीवी मीडिया में विज्ञापन की सीमा को लेकर भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण के प्रस्ताव को दो साल भी नहीं हुए थे कि नए सूचना और प्रसारण मंत्री अरुण जेटली ने इसको लागू करने पर अनचाहापन जाहिर किया। जेटली के मुताबिक़ ऐसा करना अभिव्यक्ति की आज़ादी के साथ धोखा होगा। पहला जे एस वर्मा स्मृति संबोधन देते हुए उन्होंने कहा कि टीवी न्यूज़ मीडिया के लिए प्रति घंटे अधिकतम 12 मिनट विज्ञापन दिखाने की बाध्यता अंतत: संविधान के अनुच्छेद 19(1) के साथ मेल नहीं खाती। ट्राई ने 2013 के मार्च महीने में सारे टीवी न्यूज़ चैनलों को एक एक नोटिस दिया था कि अक्टूबर 2013 से प्रति घंटे 12 मिनट से ज़्यादा विज्ञापन नहीं दिखाए जा सकते। उस वक़्त ब्रॉडकास्टरों ने अपने राजस्व में कमतरी का तर्क देते हुए कहा था कि इतनी कम समयावधि में अगर इसे लागू किया गया तो सारे न्यूज़ चैनल घाटे में चले जाएंगे। 
मूल रूप से राष्ट्रीय सहारा में छपा लेख

मंत्रालय ने इसके लिए दिसंबर 2014 तक के लिए समय सीमा बढ़ाई जब तक डिज़िटाइजेशन की प्रक्रिया पूरा करने का मंत्रालय ने लक्ष्य रखा था। डिज़िटाइजेशन के साथ इसको लागू करने का तर्क ये था कि एक बार अगर ये प्रक्रिया पूरी होती है तो राजस्व का जो हिस्सा चैनलों को विज्ञापन से हासिल होता है उसका बड़ा टुकड़ा सब्सक्रिप्शन पर शिफ्ट हो जाएगा। यानी सेट टॉप बॉक्स और सब्सक्रिप्शन के ज़रिए चैनलों को होने वाली मात्र 10 फ़ीसदी की आमदनी बढ़कर 30-40 फ़ीसदी के स्तर तक पहुंच जाएगी। लेकिन ना ये पूरा हुआ और ना ही विज्ञापन की समय सीमा निर्धारित हो पाई। सब्सक्रिप्शन के चलते ग्राहकों पर तो बोझ बढ़ गया लेकिन ना ही उनके सामने टीवी स्क्रीन पर विज्ञापन कम हुए ना ही पुरानी दर में न्यूज़ देखा मुमकिन हो पाया।

पूरे मीडिया उद्योग में ये अफ़वाहें तैरती रही कि ट्राई का ये नियम 'नया' और प्रतिकामी है। हक़ीकत ये है कि केबल टेलीविज़न नेटवर्क्स रूल्स 1994 के तहत ही उसने चैनलों को ये हिदायत दी थी। इस सरकारी क़ानून को मंत्रालय ने जब मंजूर किया है तो फिर मंत्रालय इसको लागू कराने के प्रति गंभीरता क्यों नहीं दिखा रहा? अगर नियम में कोई पेंच है तो उसमें संशोधन होना चाहिए या पूरे क़ानून को निरस्त कर देना चाहिए फिर नियम लागू होना चाहिए। लेकिन हो ये रहा है कि क़ानून भी है क़ानून का पालन भी नहीं हो रहा। उसी अधिनियम में एडवर्टाइज़मेंट कोड ऑफ़ टीवी नेटवर्क (विनियमन) रूल 1994 के तहत ये भी चर्चा की गई है कि टीवी में दिखाए जाने वाले विज्ञापन इस तरह के होंगे ताकि वो उसके मुख्य विषय सामग्री से अलग दिखे। क्या टीवी में इस नियम को फॉलो किया जाता रहा है? 

अगर नहीं, तो इस पर मंत्रालय ने क्या कार्रवाई की? निर्मल बाबा का प्रायोजित शो (विज्ञापन) जब चैनलों के लिए झमाझम टीआरपी का ज़रिया बना तो एक के बाद एक चैनलों पर उसका प्रसारण शुरू हुआ। उसमें स्क्रीन पर बेहद छोटे अक्षर में चालाकी बरतते हुए एडीवीटी (Advt.) लिखा होता था जिसे किसी दर्शक के लिए देख पाना मुश्किल था। तमाम आलोचनाओं के बाद इस शो को कुछ चैनलों ने बंद कर दिया और जो चलाते रहे उन्होंने एडीवीटी का फोंट बढ़ा दिया।

विज्ञापन के मोर्चे पर नियम-क़ायदे को लागू करने का मामला अभिव्यक्ति की आज़ादी से टकराव का मामला नहीं है। किसी भी टीवी न्यूज़ चैनल को जब मंत्रालय लायसेंस देता है तो वो न्यूज़ नाम की सामग्री के प्रसारण के लिए होता है। विज्ञापन उसकी आमदनी का ज़रिया है ताकि ख़बर को चलाए रखने लायक राजस्व चैनल बना पाए। इस तरह ये पूरा मामला मीडिया के पत्रकारिता वाले पक्ष का नहीं बल्कि उद्योग वाले पक्ष का है। उद्योग के लिए नियम लागू करना कहीं से भी अभिव्यक्ति की आज़ादी पर ना तो चोट है ना ही किसी भी तरह का अंकुश। दूसरी बात, क्या विज्ञापन का जो मौजूदा स्लैब है जिसमें चैनल मनमाना तरीके से 20-22 मिनट तक विज्ञापन दिखाते रहते हैं, इसमें छोटे-मझोले चैनलों के लिए प्रतियोगिता में टिके रहने का कोई स्कोप है? 

अगर विज्ञापन पर बने नियम को हम अभिव्यक्ति की आज़ादी से जोड़ भी दें तो इसमें लोकतांत्रिक रवैया कहां है? बड़े चैनलों और बड़े समूहों के पास ज़्यादा विज्ञापन झटकने के सौ तरीके हैं और छोटे चैनल इस पूरे परिदृश्य में टिक नहीं पाते। भारतीय प्रतियोगिता आयोग ने भी चैनलों के रवैये पर दो-तीन बार गंभीर टिप्पणी की है। विज्ञापन लाने का जो प्रमुख जरिया चैनलों के पास है वो है टीआरपी। लिहाजा विज्ञापन को लुभाने के लिए चैनल टीआरपी को लुभाते हैं और टीआरपी को लुभाने के लिए कई दफ़ा विषय सामग्री में गंभीरता की बजाए सनसनी और हल्केपन की चाशनी लपेट देते हैं। यानी ज़्यादा से ज़्यादा विज्ञापन जुटाने का संबंध सीधे तौर पर कंटेंट से भी जुड़ा है। चैनलों की ज़िम्मेदारी सुनिश्चित करने के लिए इस तरह का कोई आयोग नहीं है जो उन्हें दिशा-निर्देश दे सके। चैनलों के स्व-नियमन की कुछ संस्थाएं पिछले कुछ वर्षों में इतने मौक़ों पर असफ़ल साबित होते रहे हैं कि ऐसे किसी भी संस्था का वजूद सतह पर मालूम ही नहीं पड़ता।

प्रिंट मीडिया के लिए समाचार और विज्ञापन का अनुपात बहुत पहले से निश्चित है। टीवी इससे बाहर क्यों रहे? लेकिन टीवी मीडिया ने इतनी आक्रामकता से अपनी मौजूदगी दर्ज की है कि इसको लेकर नियम-क़ायदे बनाने के लिए सरकार के पास कोई समय मिलता ही नहीं दिख रहा। 2013 में ही 'पेड न्यूज़' पर संसद की स्थाई समिति की लंबी चौड़ी-रिपोर्ट में भी विज्ञापन को लेकर कई चिंताएं जताई गईं। पेड न्यूज़ ख़ुद में विज्ञापन का ही रूप है। क्या नई सरकार उस रिपोर्ट को लागू कराने के पक्ष में है? अगर विज्ञापन को लेकर खुली छूट जारी रही और एडवर्टाइज़मेंट स्टैंडर्ड काउंसिल ऑफ़ इंडिया के हाथ में मौजूद शक्ति असल में विज्ञापनदाताओं को ताक़तवर बनाने को लेकर झुकी रही तो टीवी की ख़बरों की गुणवत्ता पर सवाल उठते रहेंगे। 

09 January 2015

शार्ली एब्दो प्रकरण विवाद

-दिलीप ख़ान
[फ़ेसबुक पर टुकड़ों में  बात करने के बदले एक साथ ही यहां अपना पक्ष लिख दे रहा हूं।]

शार्ली एब्दो पत्रिका के दफ़्तर पर हुए ख़ूनी हमले के बाद अभिव्यक्ति की आज़ादी का पुराना विमर्श फिर से सामने आ गया है। पूरे मामले पर सोशल मीडिया पर जिस तरह की बहस चल रही है उसको मोटे तौर पर तीन-चार खांचों में बांटा जा सकता है। पहला तबका ऐसे लोगों का है जो ऐसे किसी भी हमले के ख़िलाफ़ हैं और पत्रिका में छपे कार्टूनों से जिन्हें कोई परेशानी नहीं है। दूसरा तबका ऐसे लोगों का है जो हमले के ख़िलाफ़ हैं, लेकिन कार्टून्स के भी ख़िलाफ़ हैं। तीसरा तबका वो है जो कार्टून्स के कारण हमले तक के पक्ष में दबी ज़ुबान हामी भर रहे हैं।

पहले खांचे में वो लोग भी शामिल हैं जो हाल-हाल तक ‘पीके’ पर प्रतिबंध लगाने की बात करते थे। अचानक धार्मिक दायरा बदलने से वो शार्ली एब्दो की अभिव्यक्ति की आज़ादी के समर्थक हो गए। ऐसे लोग, एक ही मसले पर अपने धर्म पर अलग और दूसरे धर्म पर अलग स्टैंड लेने वाले ढुलमुल प्रजाति के होते हैं। 

दूसरे और तीसरे खांचे के लोगों में से तीन-चार तर्क ज़ोरों से दिए जा रहे हैं। पहला, पैग़ंबर की कोई आकृति नहीं है तो फिर उनपर कार्टून बनाना धार्मिक भावना को आहत करने वाला कदम है। दूसरा, शार्ली एब्दो पत्रिका लगातार धर्म पर चोट करने के चलते विवादों से घिरी रही है। तीसरा, वो ना सिर्फ़ इस्लाम बल्कि कैथोलिक और यहूदियों को भी समय-समय पर नाराज़ करती रही है। कुल जमा मतलब ये कि उस पत्रिका के कंटेंट ने धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने का काम लगातार किया है। तर्कों को खींचकर उस समूची पत्रिका को ही अश्लील, हल्की और फसाद पैदा करने का कारखाना बताया जा रहा है। 

विवादित कार्टून्स

2006 में इस साप्ताहिक पत्रिका ने पैगंबर मोहम्मद पर एक कार्टून छापा और इसके चलते बड़ा विवाद हुआ। इसके बाद सीरीज़ में इस्लाम पर इस पत्रिका ने अंक निकाले। सर्वाधिक विवादित कार्टूनों में से एक में पैगंबर मोहम्मद कह रहे हैं कि “कट्टरपंथियों की हरक़त से पैगंबर खुश हुआ है”। इस व्यंग्य में अगर इस्लामिक चरमपंथियों के नकार के बजाए पैगंबर का कैरीकेचर ध्यान खींचता है तो कार्टून नाम की पुरानी विधा के अब-तक के सफ़र पर समाज की कूपमंडूकता का झटके में भारी पड़ना तय हो जाता है। अगर पैगंबर के नाम पर ही मार-काट मचाने वाले कुछ चरमपंथी अपनी राजनीति को समाज में पैबस्त करने पर जुटे हुए हैं तो एक कैरीकेचर वाली पत्रिका के सामने कोई विकल्प नहीं बचता कि वो यह बात सीधे पैगंबर के मुंह से कहलवाए कि उनके नाम के आधार पर ये तमाम हमले बंद होने चाहिए। 

इस अंक का फ्रांस सहित दुनिया के कई मुल्क़ों में विरोध हुआ। तत्कालीन फ्रांसीसी राष्ट्रपति यॉक शिरॉक ने इसे भड़काऊ बताया था और अंतत: पत्रिका को लंबी क़ानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी। फ्रांस में अदालती लड़ाई जीतने के बाद पत्रिका में साप्ताहिक प्रकाशन जारी रहा, जिनमें अलग-अलग सामाजिक, राजनीतिक मसले (सिर्फ़ धार्मिक नहीं) शामिल थे। बाद के दिनों में निकोलस सरकोज़ी और फ्रांस्वा ओलांद ने “फ्रांस की पुरानी व्यंग्य परंपरा” का हवाला देते हुए पत्रिका का बचाव किया। 2011 में एक बार फिर पत्रिका को लेकर विवाद हुआ। पत्रिका ने एक अंक में पैगंबर मोहम्मद को अतिथि संपादक बना दिया और उस अंक में पत्रिका के मॉस्टहेड के नीचे एक उपशीर्षक दिया और अंक का नाम रखा ‘शरिया एब्दो’। ये शरिया क़ानून पर चोट करने वाला अंक था। 
क्या शार्ली रेसिस्ट पत्रिका है?

सवाल ये है कि क्या शार्ली एब्दो सिर्फ़ इस्लाम पर कार्टून्स छापकर उस एकमात्र धर्म को निशाने पर अब तक रखती आई है या फिर क्या ये पत्रिका सिर्फ़ धार्मिक मामलों पर ही कार्टून्स और व्यंग्य छापती है?  मौजूदा परिप्रेक्ष्य में ये दोनों सवाल काफी अहम हैं। शार्ली एब्दो में व्यंग्य, कार्टून और कैरीकेचर ही प्रमुख सामग्री है और हफ़्तेवार प्रकाशन में विवाद का मामला सिर्फ़ धर्म को लेकर ही बार-बार आया। इसलिए पत्रिका के बारे में पढ़ने पर ऐसा लगता है गोया पत्रिका हर अंक में धार्मिक मामलों पर विवादित कार्टून प्रकाशित करती रही हो। जबकि ऐसा है नहीं। जिस दूसरे कार्टून पर ज़्यादा विवाद है वो है- पोप का कंडोम पहनना। ये तब की ख़बर है जब ख़बर आई थी कि पोप चर्च के भीतर सेक्स करते हैं। हालांकि अब तो ब्रूसेल्स मे एक पोप पर बाल तस्करी, बलात्कार सहित कई मामले अदालत में साबित हुए। इसलिए पोप पर चोट करने पर हैरानी नहीं होनी चाहिए, लेकिन हैरानी सिर्फ़ इसलिए होती है क्योंकि पोप को आलोचना से परे कर दिया गया है। 

ठीक पराशक्ति अल्लाह या ईश्वर की तरह। अगर पोप के सेक्स करने के तथ्य को कार्टून का रूप दे दिया गया तो धार्मिक असहिष्णुता का मामला कैसे हो गया? तथ्य, तथ्य है। चर्च के भीतर सेक्स पर पाबंदियों पर व्यंग्य करते हुए किसी कार्टून में अगर नन को हस्तमैथुन करते दिखाया गया है तो ये व्यक्तिगत और निजी मामला नहीं है। किसी ख़ास नन के बारे में नहीं है, बल्कि उस ट्रेंड पर बात करता हुआ ये कार्टून है जिसमें नन की सैक्सुअल ज़रूरत को पूरा करने के तरीके को रेखांकित किया गया है। क्या सेक्स पर बात करना या सेक्स पर कार्टून छापना अश्लील है? या, धार्मिक लोगों के सेक्स पर बात करना अश्लील और नाक़ाबिल-ए-बर्दाश्त है? या, धार्मिक मान्यताओं को चुनौती देते हुए राजनीतिक यथार्थ को बयां करने के लिए पैगंबर मोहम्मद का कार्टून बना देना दुनिया के लिए ख़तरनाक है?  अभिव्यक्ति के टूल हर दफ़े अगर समाज के हर तबके से पूछकर तलाशे जाए तो शायद कार्टून और कैरीकेचर में दर्ज़ होने वाले कैरेक्टरों की संख्या मुट्ठी भर रह जाएगी। 

राजनीतिक मामलों को लेकर प्रतिबंध

1970 के दशक में प्राकृतिक आपदा को लेकर निकाले गए एक अंक के बाद इस पत्रिका को प्रतिबंधित कर दिया गया था। तब तक ये दूसरे नाम से निकलता था। प्रतिबंध के दायरे से बाहर निकलने के लिए इसका नाम शार्ली एब्दो रखा गया। हालांकि इस पत्रिका में कई बार ये आरोप भी लगे हैं कि इसके कुछ कार्टून्स नस्लवादी रहे हैं। लेकिन, नस्लीयता का मामला जहां भी रहा शार्ली एब्दो के भीतर भी विरोध हुए। कोई भी पत्रिका ग़लती करती है, शार्ली ने भी की। कुछ लोग निकलकर नई पत्रिका भी निकाले। लेकिन नस्लीयता के जितने इल्ज़ाम है, उनमें से ज़्यादातर धार्मिक संगठनों ने ही लगाए। लिस्ट उठाकर चेक कर लीजिए।  मैं फ्रेंच नहीं जानता, इसलिए ये दावा नहीं कर सकता कि मैंने पत्रिका पढ़ी है। 

लेकिन, इस पत्रिका पर हमले के बाद इंटरनेट सहित समाचार एजेंसियों पर जितनी सामग्रियां थीं, उनमें से ज़्यादातर को पढ़ा क्योंकि अगले दिन आधे घंटे को प्रोग्राम बनाना था इस पर। कुल जमा इस नतीजे पर हूं कि असहमत हैं तो असहमति जताइए लेकिन जो सहमत हैं उनपर क्यों पिल पड़ रहे हैं? आपकी असहमति किसी कार्टून पर ठीक वैसे ही हो सकती है जिस तरह आपकी किसी बात पर किसी और की असहमति। आपकी असहमति के चलते कोई बात करना बंद नहीं कर देगा। आप आहत हैं तो आहत होना मुबारक़। कार्टून और कैरीकेचर के नाम पर ज़रा-ज़रा सी बात पर आहत होने के चलन को जिस तरह सिद्धांत के तौर पर पेश करने की कोशिश की जा रही है वो अंतत: बहुत संकुचित दिशा की तरफ़ लेकर हमें बढ़ेगा। 

23 December 2014

मृत्यदंड के बारे में: रोबेस्पिया

(मृत्युदंड का विरोध किस तरह आज से ही नहीं बल्कि फ्रांस की क्रांति के समय से ही समाज के जनवादीकरण से जुडा हुआ है. और यह भाषण आज भी किस तरह प्रासंगिक बना हुआ है. यह 22 जून 1791 को महान क्रांतिकारी रोबस्पेरे द्वारा फ़्रांस की संविधान सभा में दिये गए भाषण का हिंदी अनुवाद है.)

एथेंस में जब खबर पहुंची कि अर्गोस नगर के नागरिकों को मृत्युदंड दिया गया है तो वहां के लोग भाग कर देवालयों में गए और उन्होंने देवताओं को आह्वान किया कि वे एथेंस के लोगों को ऐसे भयानक और क्रूर विचारों से बचाएं. मेरा आह्वान देवताओं से नहीं कानून निर्माताओं से है, उनसे जो देवत्व के शाश्वत नियमों के संचालक और भाष्यकार हैं, कि ऐसे खूनी कानूनों को फ़्रांस की संहिता से मिटा दे जो न्यायिक हत्याओं को निर्देशित करते हैं और जिनको उनकी नैतिकता और नया संविधान ख़ारिज करते हैं. मैं उनके समक्ष साबित करना चाहता हूँ : 1. कि मृत्युदंड सारतः अन्याय है. और 2. कि यह दण्डो में से सबसे दमनकारी नहीं है और यह अपराधों को रोकने से ज्यादा उन्हें संगुणित करता है.

नागरिक समाज के दायरे से बाहर यदि एक कटु शत्रु मेरा जीवन ख़त्म करने की कोशिश करता है, या बीसियों बार धकेलने पर भी मेरे द्वारा उगाई गई फसल को नष्ट करने वापस आ जाता है. तो क्योंकि मेरे पास विरोध के लिए केवल मेरी व्यक्तिगत शक्ति का ही सहारा है इसलिए मुझे उसे अनिवार्यतः नष्ट करना होगा या उसे ख़त्म कर देना होगा और प्राकृतिक रक्षण का नियम मुझे औचित्य और स्वीकृति प्रदान करता है. लेकिन समाज में, जब सभी की शक्ति केवल किसी एक व्यक्ति के खिलाफ लामबंद है तो न्याय का कौन सा सिद्धांत उसकी हत्या की स्वीकृति दे सकता है? कौन सी अनिवार्यता इसे दोषमुक्त कर सकती है? एक विजेता जो अपने बंदी शत्रु की हत्या करता है बर्बर कहलाता है! एक प्रौढ़ जो किसी बालक को शक्तिहीन कर उसे दंड देने की सामर्थ्य रखता है यदि उसकी हत्या कर दे तो राक्षस समझा जाता है! एक अभियुक्त जिसे समाज द्वारा सजा दी गई है एक पराजित और शक्तिहीन शत्रु के सिवा कुछ भी नहीं है और वह एक प्रौढ़ के सामने बालक से भी ज्यादा असहाय है.

अतः, सत्य और न्याय की नज़र में मौत के ये नज़ारे जिन्हें यह अनुष्ठानपूर्वक आदेशित करता है, कायराना कत्लों के सिवा कुछ भी नहीं है, ये केवल कुछ व्यक्तियों के बजाय समूचे राष्ट्र के द्वारा कानूनी तरीको से किये गये गंभीर अपराध है. कानून चाहे कैसे भी निर्मम और वैभवशाली क्यों न हों, हैरान मत होइए, ये चंद उत्पीड़कों के कारनामों से ज्यादा कुछ नहीं हैं. ये ऐसी काराएं हैं जिनसे मानव जाति को अधोपतित किया जाता है. ये ऐसी भुजाएं हैं जिनसे उसे पराधीन किया जाता है,
ये कानून खून से लिखे गए हैं. किसी भी रोमन नागरिक को मौत की सजा देना वर्जित था. यह जनता द्वारा बनाया गया कानून था. लेकिन विजयी स्काईला ने कहा : वे सभी जिन्होंने मेरे विरुद्ध अस्त्र उठाये मृत्यु के भागी हैं. ओक्टावियन और अपराध में उसके सहभागियों ने इस नए कानून की पुष्टि की.

तिबेरियस की अधीनता में ब्रूटस की प्रशंसा करना मृत्युयोग्य अपराध था. कालिगुला ने उन सबको मृत्युदंड दिया जिन्होंने भी सम्राट के चित्र के समक्ष नग्न होने की धृष्टता की. एक बार जब आतताई शासकों द्वारा राजद्रोह के अपराध – जो अवज्ञापूर्ण या नायकोचित कृत्य हुआ करते थे – का आविष्कार कर लिया गया तो फिर कौन बिना स्वयं को राजद्रोह का भागी बनाए यह सोचने की हिम्मत कर सकता था कि इनकी सजा मृत्युदंड से थोड़ी कम होनी चाहिए?

अज्ञानता और निरंकुशता के राक्षसी मिलन से पैदा हुए उन्माद ने जब दैवीय राजद्रोह के अपराध का आविष्कार कर लिया, जब इसने अपने मतिभ्रम में स्वयं ईश्वर का प्रतिशोध लेने का बीड़ा उठा लिया, तब क्या यह जरुरी नहीं हो गया था कि यह उन्हें रक्त अर्पित करे, और स्वयं को ईश्वर का ही रूप मानने वाले, उसे दरिन्दे की श्रेणी में पहुंचा दें?

पुरातन बर्बर कायदे के समर्थक कहते है कि मृत्युदंड अनिवार्य है, बिना इसके अपराध पर लगाम लगाना संभव नहीं है. यह आपसे किसने कहा? क्या आपने उन सभी अंकुशों का आकलन कर लिया है जिनके द्वारा दंडविधान मनुष्य की संवेदना पर काम करता है? अफ़सोस, मृत्यु से पहले मनुष्य कितना शारीरिक और नैतिक कष्ट सहन कर सकता है?

जीने की इच्छा उस आत्मसम्मान के सामने नतमस्तक हो जाती है, जो ह्रदय पर शासन करने वाले आवेगों में सबसे प्रबल होता है. एक सामजिक मनुष्य के लिए सबसे खतरनाक सजा अपमानित होना है, सार्वजनिक निंदा का पात्र बन जाना है. यदि कानून निर्माता नागरिक को इतनी सारी नाजुक जगहों पर चोट पहुंचा सकता है तो उसे मृत्युदंड के इस्तेमाल करने की हद तक क्यों गिर जाना चाहिए? दंड दोषी को यातना देने के लिए नहीं होता है, वरन वह उसके भय से अपराध को रोकने के लिए दिया जाता है.

जो कानून निर्माता मृत्यु और उत्पीड़नकारी सजाओं को अन्य तरीकों के ऊपर वरीयता देता है वह जनभावनाओं को आहत करता है और शासितों के बीच अपनी नैतिक साख को कमजोर करता है. एक ऐंसे ढोंगी गुरु की तरह जो बार बार की क्रूर सजाओं से अपने शिष्य की आत्मा को जड़ और अपमानित बना देता है. वह कुछ ज्यादा ही जोर से दबाकर सरकार की स्प्रिंगों को ढीला और कमजोर कर देता है.

जो कानून निर्माता म्रत्युदंड का विधान स्थापित करता है वह इस उपयोगी सिद्धांत का निषेध करता है कि किसी अपराध को दबाने का सबसे सही तरीका उन आवेगों की प्रकृति के अनुसार दंड तय करना है जोकि उसको पैदा करते हैं. मृत्युदंड का विधान इन सभी विचारों को धूमिल कर देता है यह सभी अन्तःसम्बन्धों को विघटित कर देता है और इस प्रकार दंडात्मक कानून के उद्देश्य का ही खुलेआम निषेध करता है.

आप कहते हैं कि मृत्युदंड अनिवार्य है. यदि यह सत्य है तो क्यों बहुत सारे लोगों को इसकी जरुरत नहीं पड़ी. विधि के किस विधान के तहत ऐसे लोग ही सबसे बुद्धिमान, सबसे खुश और सबसे स्वतंत्र थे? यदि मृत्युदंड ही बड़े अपराधों को रोकने के लिए सबसे उचित है तो ऐसे अपराध वहां सबसे कम होने चाहिए जहाँ इसे अपनाया और प्रयोग किया गया. किन्तु तथ्य एकदम विपरीत हैं. जापान को देखिये: वहां से ज्यादा मृत्युदंड और यातनाएं और कहीं नहीं दी जाती परन्तु वहां से अधिक संख्या में और वहां से अधिक जघन्य अपराध और कहीं नहीं होते. कोई कह सकता है कि जापानी लोग भीषणता में उन बर्बर कानूनों को चुनौती देना चाहते हैं जो उन्हें आहत और परेशान करते हैं. क्या यूनानी गणतन्त्रों -जहाँ सजाएँ नरम थी और जहां मृत्युदंड या तो बहुत कम थे या थे ही नहीं- में खूनी कानूनों द्वारा शासित देशों से ज्यादा अपराध और कम अच्छाइयां थी? क्या आपको लगता है की रोम में पोर्सियाई ज़माने में जब इसके वैभवशाली दिन थे, जब सारे कड़े कानूनों को हटा दिया गया था, स्काईला जो अपने अत्याचारों के लिए कुख्यात था, के जमाने की तुलना में ज्यादा अपराध होते थे, जब सभी कठोर कानूनों को वापस ले आया गया था? क्या रूस के निरंकुश शासक ने जब से मृत्युदंड को ख़त्म कर दिया है वहां किसी प्रकार का संकट आ खड़ा हुआ है? ऐसा लगता है कि इस तरह की मानवता और दार्शनिकता का प्रदर्शन करके वह लाखों लोगों को अपनी निरंकुश सत्ता के अधीन रखने के जुर्म से दोषमुक्त होना चाहते हैं.

न्याय और विवेक की बात सुनिए. ये आपको चिल्ला कर कह रहे हैं कि मानवीय निर्णय कभी भी इतने निश्चित नहीं होते कि वे कुछ मनुष्यों द्वारा जो कि गलतियाँ कर सकते हैं, किसी अन्य व्यक्ति की मृत्यु के बारे में तय करने के औचित्य का प्रतिपादन कर सकें. यदि आप सबसे सम्पूर्ण न्यायिक फैसले की भी कल्पना कर लें, यदि आप सबसे ज्यादा ज्ञानी और ईमानदार जजों की भी व्यवस्था कर लें तब भी गलतियों की संभावना बची रहती है. आप इन गलतियों को सुधारने के औजारों से स्वयं को क्यों वंचित कर देना चाहते हैं? स्वयं को किसी उत्पीडित निर्दोष की मदद करने में अक्षम क्यों बना देना चाहते हैं? क्या किसी अदृश्य छाया के लिए, किसी अचेतन राख के लिए आपके बाँझ पाश्चाताप का, आपकी भ्रामक भूलसुधार का कोई अर्थ है? वे आपके दंड विधान की बर्बर तत्परता के त्रासद साक्ष्य हैं. अपराध को पाश्चाताप और अच्छे कार्यों के द्वारा सुधार सकने की संभावना को किसी व्यक्ति से छीन लेना, अच्छाई की तरफ उसके लौट आने के सारे रास्ते निर्ममता से बंद कर देना, उसके पतन को शीघ्रता से कब्र तक पहुंचा देना जो अब भी उसके अपराध से दागदार है, मेरी नज़र में क्रूरता का सबसे भयावह परिष्करण है.

एक कानून निर्माता का सबसे पहला कर्तव्य उन सार्वजनिक नैतिक मूल्यों की स्थापना करना और उन्हें बचाए रखना है, जो सभी आज़ादियों और सभी सामाजिक खुशियों के मूल स्रोत हैं. किसी विशिष्ट उद्देश्य को पाने के प्रयास में यदि वह सामान्य और आवश्यक उद्देश्यों को भूल जाता है तो वह सबसे भौंडी और भयानक गलती करता है. अतः राजा को लोगों के सामने न्याय और विवेक का सबसे आदर्श उदहारण पेश करना चाहिए. यदि इस को परिभाषित करने वाली शक्तिशाली, संयत, और उदार सख्ती की जगह क्रोध और प्रतिशोध से काम लेते हैं, यदि वे बिना वजह के खून बहाते हैं, जिसको बचाया जा सकता था और जिसे बहाने का उन्हें कोई अधिकार नहीं. और वे लोगों के सामने निर्मम दृश्य, और यातना से विकृत लाशों को प्रस्तुत करते हैं तो यह नागरिकों के जेहन में न्याय और अन्याय के विचार को बदल देता है. वे समाज में ऐसे तीखे दुराग्रहों के बीज बो देते हैं जो उतरोतर बढ़ते जाते हैं. मनुष्य, मनुष्य होने की गरिमा खो देता है जब उसके जीवन को इतनी आसानी से जोखिम में डाला जा सकता है. हत्या का विचार तब इतना डरावना नहीं रह जाता जब कानून खुद ही इसे एक मिसाल और तमाशे की तरह पेश करता है. अपराध की भयावहता तब कम हो जाती है जब उसे एक और अपराध के जरिये दण्डित किया जाता है. किसी दंड की प्रभावपूर्णता को उसकी कठोरता की मात्रा से मत आंकिये: ये दोनों एक दूसरे के एकदम उलटी बाते हैं. हर कोई उदार कानूनों की सहायता करता है. हर कोई कठोर कानूनों के खिलाफ षड्यंत्र करता है.

यह देखा गया है की स्वतंत्र देशों में अपराध कम हैं और दंडात्मक कानून ज्यादा उदार हैं. कुल मिलाकर, स्वतंत्र देश वे हैं जहाँ व्यक्ति के अधिकारों का सम्मान किया जाता है और इसके फलस्वरूप जहाँ के कानून न्यायपूर्ण हैं. जहाँ अतिशय कष्ट देकर मानवता का उल्लंघन किया जाता है यह इस बात का प्रमाण है कि वहां मनुष्यता की गरिमा को अभी पहचाना नहीं गया है, यह इस बात का प्रमाण है कि वहां कानून निर्माता स्वामी है जो दासों को चलाता है और अपनी मर्जी के मुताबिक जब चाहे उन्हें सजाएं देता है. अतः मेरा निष्कर्ष है कि मृत्युदंड को समाप्त कर देना चाहिए.

अनुवाद: कुलदीप प्रकाश साभार

15 October 2014

महिषासुर दिवस के मायने

दिलीप ख़ान
(जब जेएनयू में पहली या दूसरी बार महिषासुर दिवस मनाया गया था तो उस वक़्त ये टिप्पणी लिखी थी। मेल से निकालकर यहां पेस्ट कर रहा हूं। इसे सवर्णों से लड़ने के तौर-तरीके की भीतरी आलोचना के तौर पर लिखा गया है।) 

दुनिया और भारत के प्राचीन इतिहास को पढ़ते हुए कोई भी इतिहास का विद्यार्थी कभी किसी दुर्गा नाम के चरित्र से नहीं टकराया। इतिहास के मुताबिक़ ऐसा कोई चरित्र मानव सभ्यता के विकासक्रम में था ही नहीं। अगर होता तो यह अरब या यूरोप-अमेरिका के देशों में रहने वाले वहां के निवासियों के लिए परिचित चरित्र होता। यानी एक ख़ास भूगोल में रहने वाले ख़ास धर्म के भीतर ख़ास तबके ने अपने धर्म की गाथा फैलाने के उद्देश्य से इस चरित्र को गढ़ा। अनेक चरित्र गढ़े गए, जिनमें दुर्गा भी एक हैं। दुर्गा की कहानी अकेले पूरी नहीं हो सकती, तो महिषासुर के अलावा और भी चरित्र बने। अब इस चरित्र को लेकर मोटे तौर पर तीन वर्ग बंटे हैं। पहला, जो दुर्गा की मौजूदा कहानी को मान्यता देता है और उसके साथ है। दूसरा, जो दुर्गा की कहानियों को नए सिरे से डीकोड करके उसमें खलनायक के तौर पर प्रस्तुत किए गए पात्रों को मौजूदा दमित अस्मिता के साथ खड़ा करता है और दुर्गा को इस आधार पर चुनौती देता है। तीसरा, जो दुर्गा और महिषासुर को काल्पनिक चरित्र मानता है और इन दोनों को खारिज करता है। 

मिथक किसी भी समाज का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। धार्मिक दायरे के भीतर चरित्र जैसे ही घुसता है तो उसके होने-ना होने या फिर कितना होने और कैसा होने के सवाल का आम तौर पर लोप हो जाता है। क्योंकि धर्म के मसले पर सवाल से ज़्यादा महत्वपूर्ण होता है कि आप उसमें वर्णित प्रसंगों को कितना फॉलो करते हैं। जितना यक़ीन, उतने धार्मिक। उतने मिथक के करीब और उतने मिथक बनाने वाले की राजनीति के भी। मिथकों में मौजूद चरित्रों की कहानियों या फिर उनकी प्रस्तुति पर जैसे ही शक शुरू होता है मिथकों का क़िला भी ढहने लगता है। नई व्याख्याओं के ज़रिए हो सकता है कि मिथक के मुख्य (हीरो या हीरोइननुमा) चरित्र की सादगी, राजनीति, सच्चाई और ईमानदारी पर सवाल उठे और मिथक के भीतर उनकी मौजूदगी का लुभावना पक्ष सवालों के घेरे में आ जाए। व्याख्याओं के ज़रिए ऐसा होता है, चाहे वो कहानियों की हो, चाहे फ़िल्मों की। इसलिए व्याख्या अच्छी चीज़ है। समाज जब गतिशील होता है तो व्याख्याओं की संभावना लगातार बनी रहती है। मिथक में खलनायक के तौर पर पेश किए गए चरित्र को बिल्कुल नए सिरे से नायक भी बनाया जा सकता है और नायक/नायिका को खलनायक वाले खांचे में पहुंचाया जा सकता है। 

ऐसा करने का सबको बराबर हक़ है। ठीक उसी तरह जैसे प्रेमचंद, निराला या फिर जयशंकर प्रसाद के पात्रों की व्याख्या होती है और नए अर्थ खुलते हैं। व्याख्या करने का हक़ नहीं छीना जा सकता। ये बुनियादी लोकतांत्रिक अधिकार है। अगर किसी को दुर्गा स्थापना करने का हक़ है तो किसी को महिषासुर स्थापना का भी। एक कर रहा है तो दूसरा भी करे। मौजूदा वर्चस्वशाली धार्मिक आख्यान को चुनौती देने के लिए व्याख्याओं के ज़रिए जो प्रति-नायक खड़ा करने की बात है, एक अर्थ में है तो वो ठीक, लेकिन जैसे ही व्याख्याओं से आगे जाकर पूरा मामला उसी तरह श्रद्धा में टिक जाता है, तब मिथकीय घटना दोनों तरफ़ से सच्चाई के तौर पर स्थापित हो जाती है। यानी पूरा मामला ऐसा हो जाता है कि घटना तो घटी थी, मसला सिर्फ़ व्याख्या का है। यानी एक दुर्गा थी, एक महिषासुर थे। अपने समूचे अस्तित्व में वो इतिहास के किसी कालखंड में किसी जगह पर जन्में थे। पता नहीं किस काल में, लेकिन जन्में थे। हड़प्पा के बाद या फिर मौर्य काल में या फिर हद से हद दिल्ली सल्तनत के दौरान।

जब भक्ति का जवाब भक्ति से दिया जाने लगे तो बदले की कार्रवाई जैसा कुछ तो हो सकता है लेकिन एक वैज्ञानिक तर्कशील समाज की रचना की दिशा में बढाया गया कदम नहीं हो सकता। फ़र्ज कीजिए कि कल को 60 करोड़ लोग दुर्गी के बदले महिषासुर को पूजने लगे, क्या फ़र्क पड़ जाएगा? क्या पूजने से राजनीतिक मानस बदल जाएगा? इस देश में पूजा, भक्ति और राजनीति के बीच के बहुस्तरीय संबंध को देखने के बाद इस स्थापना को मान पाना बहुत मुश्किल है। एक वैज्ञानिक समाज बनाने के लिए बहुत ज़रूरी है कि श्रद्धा के ऐसे मामलों पर प्रमाण के लिए दबाव बनाया जाए। मसलन जैसे ही कोई बोले कि दुर्गा थी तो उनसे पूछा जाना चाहिए कि दुर्गा का जन्म किस ईस्वी में हुआ। ठीक इसी तरह महिषासुर को अगर सच्चाई के रूप में पेश किया जा रहा है तो उनके जन्म और मृत्यु का साल बताया जाना चाहिए। 

दलित-ओबीसी के वास्तविक राजनीतिक संघर्ष को प्रतीकों के ज़रिए श्रद्धा के सवाल पर टांगना चिंताजनक है। ज़रूरी ये है कि मिथक की व्याख्या तो हो, लेकिन व्याख्या के दौरान ये पूरी तरह स्पष्ट हो जाए कि मिथक काल्पनिक चीज़ है। एक डिसक्लेमर हो- इसके सभी पात्र काल्पनिक हैं।’ 

हिंदी की मुश्किलें कहां हैं

-दिलीप ख़ान

हिंदी दिवस और पखवाड़ा बीत चुका है। लिहाजा, हिंदी पर ‘बातचीत और चिंतन’ की इस सरकारी सक्रियता के बाद के वक़्त में इस पर बात करनी ज़रूरी लग रही है क्योंकि अब अगले सितंबर में ही इस भाषा की सुध लेने की कोशिश होगी। और, इस कोशिश के दरम्यान लाखों-करोड़ों रुपए ख़र्च कर चर्चा और जागरुकता अभियान जैसी कवायद के संकल्प के साथ इसे फिर अगले सितंबर में दोहराने को छोड़ दिया जाएगा। मैं इस बहस में नहीं पड़ रहा हूं कि हिंदी दिवस मनाए कि नहीं मनाए, कि दिवस अमूमन कमज़ोर चीज़ों का मनाया जाता है। मैत्रेयी पुष्पा ने 14 सितंबर को एक संगोष्ठी में इसी पसोपेश के साथ अपनी बातों की शुरुआत की थी। इशारा ये था कि सेठों, पुरुषों और अंग्रेज़ी का दिवस नहीं होता बल्कि इसकी बायनरी में खड़ी चीज़ों (मज़दूरों, स्त्रियों और हिंदी) का होता है। 

हिंदी की तमाम उत्सवधर्मिता और रुदाली के तमाम आख्यानों से निकलकर ठोस ज़मीनी हालात पर बहस करने की ज़रूरत अब भी शेष है। चंद सवाल ऐसे हैं, जिन पर दशकों से चर्चा हो रही हैं और ऐसा लग रहा है कि दशकों ये चर्चा के केंद्र में रहेंगे। इनमें हिंदी का भविष्य क्या है, हिंदी ज्ञान की भाषा क्यों नहीं बन पा रही, हिंदी को दोयम दर्ज़े का बरताव हासिल है, हिंदी बाज़ार और करियर की भाषा बन पा रही है या नहीं आदि प्रमुख हैं। लेकिन इनसे आगे का सवाल ये है कि हिंदी की बेहतरी के लिए क्या किया जाए और हिंदी के नाम पर चल रहे आंदोलनों, प्रदर्शनों और संवेदनात्मक धरातल पर इससे उपजीं खीझ-खिसियाहट की राजनीतिक दिशा क्या हो?
हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की मांग या फिर कई दफ़ा राजभाषा और राष्ट्रभाषा में फर्क नहीं कर पाने की स्थिति में इसे सचमुच राष्ट्रभाषा के तौर पर रेलवे प्लेटफॉर्म सहित कई जगहों पर नीली-लाल स्याही से लिखने की रूमानियत से ना तो हिंदी की बेहतरी मुमकिन है और ना ही ये मज़बूत बनने वाली है। 

हिंदी क्यों राष्ट्रभाषा हो? क्या इसलिए कि ये देश में सबसे ज़्यादा लोगों द्वारा बोली-बरती जाती है? जब इतने लोग बोलते-बरतते हैं तो भाषा की उन्नति का आत्मविश्वास राष्ट्रभाषा जैसे जुमले में क्यों तलाशा जा रहा है? संख्या को आधार बनाए तो फिर समस्या का समाधान ही हो गया। फिर क्यों कम लोगों द्वारा बोले जाने वाली अंग्रेज़ी को आक्रामक भाषा के तौर पर हिंदी पट्टी और हिंदी को लेकर चिंतित लोग देख रहे हैं? जाहिर है कि अंग्रेज़ी को जिस तरह का सरकारी प्रश्रय मिला है और जिस तरह व्यवस्था में अंग्रेज़ी जानने वालों को सिर्फ़ इस आधार पर लाभ मिल रहा है कि वो अंग्रेज़ी में ख़ुद को संप्रेषित कर सकते हैं, वो चिंता का मूल मुद्दा है। यानी, भाषा के आधार पर किसी भी तरह के विभेद को ख़त्म करना हिंदी के भविष्य, चुनौतियों, बेहतरी आदि तमाम प्रश्नों के केंद्र में है।
मूल रूप से जनसत्ता में प्रकाशित

इसलिए इस विभेद को ख़त्म करके ‘राष्ट्रभाषा’ हिंदी का प्रभुत्व स्थापित करना हिंदी वालों के लिए लाभदायक, खुशफ़हम लेकिन राजनीतिक तौर पर प्रतिगामी कदम होगा। जब हिंदी के लोग ये अपेक्षा करते हैं कि तमिल, तेलुगू या मणिपुरी जानने वाले लोगों को हिंदी का ज्ञान होना चाहिए तो ये सवाल पलटकर भी पूछा जा सकता है कि कितने हिंदीभाषी अपनी सहूलियत को त्यागकर दूसरी भारतीय भाषा सीखने की कोशिश करते हैं? हिंदी को लेकर मोह अगर सिर्फ़ इसलिए है कि आप अंग्रेज़ी नहीं जानते और अंग्रेज़ी से मात खा रहे हैं तो इस मोह में भाषाई उन्नति की ईमानदार कोशिश कम और हिंदी में ही सीमित अपने ज्ञान को स्वीकार करवाने की मजबूरी ज़्यादा है।
हिंदी आंदोलन एक ख़ास भौगोलिक हितों की रक्षा के अंतर्निहित भाव का अगर आंदोलन बनता है तो निश्चित तौर पर आगे चलकर ये दूसरी अंग्रेज़ी बनकर रह जाएगी। लेकिन, हालात अभी इसके ठीक उलट हैं। अभी हिंदी और तमाम भारतीय भाषाओं के लोग ज्ञान की धरातल पर भाषा की दीवार को तोड़ने की कोशिश में हैं ताकि अंग्रेज़ी को सिर्फ़ अंग्रेज़ी होने का बेजा लाभ ना मिल सके। 

मसला ये है कि हिंदी की परवाह और चिंता करने वाले लोग कौन हैं? क्यों हिंदी भाषा पर बात करते समय हिंदी साहित्य को इसका पर्याय मान लिया जाता है? क्यों हिंदी के इतिहास की चर्चा में अमूमन साहित्य का ही ज़िक्र होता है? हिंदी की इस चिंतनपद्धति ने भाषा का सबसे ज़्यादा नुकसान किया है। सिर्फ़ साहित्य की पीठ पर सवार होकर कोई भाषा टिकाऊ नहीं बनी रह सकती। साहित्य बदलाव, रसास्वादन, इंक़लाब और समय काटने का ज़रिया एक साथ बन सकता है और किसी भाषा को टिकाए भी रख सकता है लेकिन उसे समाज की मांगों के अनुरूप इज़्ज़त और रुतबा नहीं दिला सकता। ये इज़्ज़त और बराबरी तब मिलेगी जब ज्ञान के बाक़ी अनुशासनों में हिंदी को व्यावहारिक समानता हासिल हो। 

अगर सरकार हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं को माध्यम के बतौर प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों में पढ़ाती है तो क्या कारण है कि वही सरकार नौकरियों में अंग्रेज़ी को प्राथमिकता देती नज़र आती है? अगर सरकार को अंग्रेज़ी की ज़रूरत मालूम पड़ती है तो फिर सरकारी स्कूलों में शिक्षा का माध्यम अंग्रेज़ी क्यों नहीं है? दरअसल ये व्यवस्था से जुड़ा बुनियादी सवाल है। ये एक साथ भाषा, वर्ग और गांव-शहर के बीच के फासलों से नत्थी सवाल है। लिहाजा ये सामाजिक न्याय का सवाल है। 

गांव में हिंदी माध्यम में पढ़ा कोई दलित-आदिवासी अगर उच्च शिक्षा के लिए देश के किसी अग्रणी विश्वविद्यालय में आरक्षण के अधिकार के बूते नामांकन पाता है, तो क्या कक्षा में अचानक दूसरी भाषा को माध्यम के बतौर अपनाने की हालत में वो सहजता हासिल कर सकेगा? हालांकि ये बात एक साथ आरक्षित-अनारक्षित किसी भी ग़ैर-अंग्रेज़ी भाषी लोगों पर लागू हो सकती है, लेकिन अलग-अलग सर्वेक्षणों के सामाजिक-आर्थिक आंकड़ें हमें बताते हैं कि सबसे ज़्यादा संख्या में दलित और आदिवासी ही अभी अपनी पढ़ाई के लिए सरकारी स्कूलों पर निर्भर हैं। 

हिंदी में उच्च शिक्षा नहीं होने के क्या कारण हैं? क्या हिंदी में शिक्षण सामग्री उपलब्ध नहीं है या फिर हिंदी में उच्च शिक्षा की शब्दावली विकसित नहीं हुई है? ये दो सवाल ऐसे हैं जिनका कोई आसान जवाब नहीं है और सबसे ज़्यादा इन्हीं मोर्चे पर काम करने की भी दरकार है। हिंदी में लोग पढ़ना नहीं चाहते, ये सवाल नितांत बेमानी है। सबसे ज़्यादा बिकने वाली हिंदी पत्रिकाओं की सूची पर नज़र दौड़ाइए तो इसमें प्रतियोगिता दर्पण शीर्ष पर हैं। यानी रोज़गार की सामग्री लेपेटे हिंदी अगर लोगों के बीच जा रही है तो लोग उसे अपना रहे हैं। जाहिर है जिस भाषा में रोज़गार नहीं मिलेगा उसमें बोल-चाल और हंसी-मज़ाक से ज़्यादा उन्नति वाले सिरे पर कोई व्यक्ति क्यों ज़ोर लगाएगा? सामाजिक विज्ञान से लेकर दूसरे अनुशासनों में हिंदी माध्यम की सामग्रियों में अल्प मात्रा में आए अनुवादों को छोड़ दें तो मूल लेखन कितने हुए हैं? 

सच मानिए तो इन विधाओं में हिंदी में जिस तरह रवां-दवां तरीके से लेखन हो रहे हैं उसमें बौद्धिक स्तर का अभाव, सिद्धांतों-अवधारणाओं का लोप और सतहीपन ज़्यादातर मौक़ों पर साफ़ झलकता है। पुरानी कुछ किताबों को छोड़ दीजिए तो हाल में हिंदी की कितनी श्रेष्ठ किताबें इन विधाओं में लिखी गई हैं? हिंदी की बेहतरी की दिशा में कोशिश करने की बजाए लेखक बनने की छटपटाहट और किताब लिखने से विश्वविद्यालयों में सहायक प्राध्यापक बनने की दावेदारी के मज़बूत होने की कवायद ज़्यादा झलकती हैं। जो समाज वैज्ञानिक हिंदी-अंग्रेज़ी दोनों जानते हैं और हिंदी में लिख सकने के बावजूद अंग्रेज़ी में लिखते हैं वो हिंदी में रॉयल्टी की मात्रा से परिचित हैं लिहाजा अर्थशास्त्र के दृष्टिकोण से ये उनका ये फ़ैसला बिल्कुल मुफ़ीद है। 

हिंदी की राह में सबसे बड़ा रोड़ा उच्च शिक्षा और रोज़गार में इसके साथ बरते जाने वाला भेद-भाव है। वरना, हिंदी बाज़ार में फर्राटेदार दौड़ रही है। कटरीना कैफ़ सरीखी अभिनेत्री अगर पेशानियों पर ज़ोर डालकर हिंदी के संवाद याद करती हैं तो इसलिए कि बॉलीवुड में हिंदी को मथने से पैसा निकलता है। भारत (और पाकिस्तान भी) के बड़े हिस्से में पहुंच अंग्रेज़ी की बदौलत नहीं बनाई जा सकती। बॉलीवुड अपनी सुविधा, अपने मुनाफ़े के लिए हिंदी को पकड़े हुए है और इसमें कोई भी ऐसी क्रांतिकारी इच्छाशक्ति नहीं है कि वो हिंदी का प्रचार करे। फर्ज कीजिए कि किसी दिन अंग्रेज़ी ने हिंदी को अपदस्थ कर दिया, तो बॉलीवुड के लिए अंग्रेज़ी में स्विच करना बहुत देरी वाला काम नहीं होगा। हिंदी चिंतन और रोज़गार की भाषा जब तक नहीं बनेगी और जब तक एकाग्र होकर इस दिशा में ज़ोर नहीं लगाया जाता तब तक हिंदी के नाम पर तमाम चिंतन-मनन अधूरी और बेमानी रहेगा। 

इसे दुरुस्त करने के लिए दो प्रयासों के ज़िक्र को दोहराने में कोई गुरेज नहीं होना चाहिए। पहला, सरकार उच्च शिक्षा में इसे बराबरी का दर्ज़ा दे और दूसरा हिंदी के लिए चिंता करने की बजाए इस भाषा को जानने-समझने वाले लोग इसमें ज्ञान का सृजन करें। यह सृजनात्मकता अगर स्थगित रही तो बहुत मुमकिन है कि भविष्य में हिंदी का कोई भी बेहतर लेखन पाठकों को ये भरोसा दिलाने में नाकामयाब रहेगा कि वो सचमुच मौलिक और बौद्धिक स्तर पर उच्च मानदंड पर खरा उतरने वाला लेखन है। क्योंकि, इस दौरान हिंदी में इतनी लद्धड़ क़िस्म की किताबें इसी रफ़्तार से छपनी जारी रही तो सचमुच हिंदी में इन अनुशासनों को पढ़ने से विश्वास ही उठ जाएगा। 

विश्वविद्यालयी शिक्षा के दौरान जब पत्रकारिता के हिंदी माध्यमों की किताबों में नारद मुनि को आदि पत्रकार के मिसाल के बतौर हम पढ़ते थे तो हंसी, विस्मय, जुगुप्सा और अजीब सी उदासी हमें घेर लेती थी। हर साल इस तरह की किताबों में इजाफ़ा हो रहा है। लिहाजा, हिंदी को बाहर के साथ-साथ भीतरी चौहद्दी में भी लड़ने की ज़रूरत है। अगर ये लड़ाई नहीं लड़ी गई तो हिंदी में ज्ञान के नाम पर नकली चीज़ें परोसी जाती रहेंगी और दूसरी तरफ़ एक अच्छे सुबह रैपीडैक्स हिंदी को निगलकर डकार मारते हुए चलता बनेगा।