22 August 2015

बीफ़=गौमांस में अफ़वाहों का संचारशास्त्रीय अध्ययन

-दिलीप ख़ान
विश्वसनीयता की जांच-परख किए बग़ैर जारी कोई बयान या रिपोर्ट अफ़वाह है। लेकिन इसका उद्देश्य होता है कि लोग उस बयान या रिपोर्ट पर भरोसा कर लें।
- अलपोर्ट और पोस्टमैन*
3 अक्टूबर 2008 को वेबसाइट आईरिपोर्ट पर एक सूचना छपी कि एप्पल के (दिवंगत) सीईओ स्टीव जॉब्स को हृदयाघात होने वाला है। जल्द ही ये सूचना दुनिया के व्यापारिक और उद्योग जगत में तेज़ी से फैल गई। सूचना की तहकीकात की कोशिश नहीं हुई और ना ही इसकी वैधानिकता की जांच की ही। नतीजा ये हुआ कि $105.04 से गिरकर एप्पल के शेयर का भाव $94.65 रह गया। कंपनी को 9 अरब डॉलर का नुकसान हुआ। [1] डेविड डुबॉयस ने अफ़वाहों पर अध्ययन में पाया कि उद्योग जगत में इस तरह की कई सूचनाएं छोड़ दी जाती हैं जो आकर्षक और लोगों की भावनाओं से जुड़ी हों। ऐसी सूचनाएं तेज़ी से फैलती हैं और लोग इसकी विश्वसनीयता की जांच किए बगैर इसे आगे बढ़ा देते हैं। मैक्डोनल्ड के बारे में किए गए एक दिलचस्प अध्ययन में डेविड ने पाया कि किस तरह सोशल मीडिया पर कोई सूचना आने के बाद वो बिजली की तेज़ी से लाखों-करोड़ों लोगों तक पहुंच जाती है। मैक्डोनल्ड के बारे में एक अफ़वाह फैली कि रेस्तरां के बाहर एक बोर्ड लगा है जिसमें कहा गया है कि अश्वेत लोगों को वहां खाने के बदले में डेढ़ डॉलर का ज़्यादा भुगतान करना होगा। इसके बाद फेसबुक और ट्विटर पर इस अफवाह ने गति पकड़ ली और दुनिया भर के मुल्क़ों में मैक्डोनल्ड के खिलाफ माहौल बन गया। [2]  

अफ़वाहों को लेकर दुनिया भर में कई उदाहरण हैं जिनपर अकादमिक शोध हो चुके हैं। कई अफ़वाह ऐसी हैं जो हमारे आस-पास मौजूद हैं, कुछ ऐसीं जिन्हें हम बचपन से सुनते रहे हैं। पीढ़ी-दर-पीढ़ी कई मान्यताएं/सूचनाएं आगे बढ़ती रहती हैं और लोग एक-दूसरे पर भरोसा करते हुए सूचनाओं को आगे बढ़ाते रहते हैं। लकड़सुंघवा की कहानियों से लेकर आत्मा की खोजके लिए शीशे की बंद केबिन में किए गए प्रयोग तक कहानियों की लंबी श्रृंखला हैं जिन्हें देश में लाखों लोगों ने सुन रखी हैं। अफ़वाहों के फैलने की वजह क्या है? क्यों तेज़ी से ये फैलती हैं और लोग ऐसी सूचनाओं पर भरोसा करते हुए उन्हें आगे क्यों बढ़ाते हैं? ये कुछ बुनियादी सवाल हैं जो अफ़वाह शब्द के साथ ही दिमाग़ में कौंधते हैं। डिफ्रांज़ो और बोर्दिया ने अफ़वाह को परिभाषित करते हुए कहा कि लोगों के बीच फैलने वाली ऐसी सूचनाएं जो मोटे तौर पर प्रासंगिक लगती हैं लेकिन उनकी विश्वसनीयता जांची नहीं होती [3]  

मोटे तौर पर प्रासंगिक लगने का मसला दिलचस्प है। यानी समाज की मान्यता के दायरे में किसी बात को अगर कान में डाल दी जाए तो अपरिचित नहीं लगने की वजह से लोग उस पर भरोसा कर सकते हैं। यानी मान्यता, भरोसा और विश्वसनीय लग सकने भर के आस-पास की बात पर लोग आसानी से यक़ीन कर सकते हैं। एक बार किसी समूह ने उस पर मुहर लगा दी तो फिर रोमांच और मान्यताओं के चलते वो आगे बढ़ती रहेगी। आधिकारिक चैनलों से सूचना के अभाव (या फिर इस पर विश्वास के अभाव) के चलते लोग एक-दूसरे की कही-सुनी बातों पर यक़ीन करने लगते हैं और इस तरह एक-दूसरे की समस्या की सामूहिक निपटान प्रक्रिया के तहत अफ़वाह का जन्म होता है। [4] 

सांस्कृतिक और सामाजिक बनावट को चुनौती देने वाली कोई भी बात इस दायरे में बिल्कुल फिट बैठती है। खान-पान चूंकि इस बनावट का ज़रूरी हिस्सा है इसलिए लोग इसे लेकर ना सिर्फ़ चौकस रहते हैं बल्कि दूसरे समुदाय पर नज़र भी रखते हैं। भारत में ऐसी ही एक मान्यता गौमांस को लेकर विकसित हुई है, बल्कि यूं कहें कि हाल में ये मान्यता ज़्यादा तेज़ी से फैली है। इसकी ज़द में ना सिर्फ़ समाज का वो हिस्सा आया जिसे हम संचार की भाषा में इनफॉर्मल रिसिविंग समूह कह सकते हैं, बल्कि वो भी आया जोइंप्रोवाइज़्ड न्यूज़ए सोशियोलॉजिकल स्टडी ऑफ़ रियूमर किताब के लेखर टी शिबूतानी की भाषा में एक हद तकआधिकारिक समूह है। यानी मीडिया। जिस मीडिया के समाज के बड़े तबके को ये अपेक्षा होती है कि वो किसी मान्यता या किसी बयान की सच्चाई की पड़ताल करेगा, वो मीडिया देश में गौमांस को लेकर मौजूद धारणाओं का सच दिखाने के बदले उन मान्यताओं को स्वीकार करता दिखा। अंग्रेज़ी के बीफ़ शब्द का अनुवाद हिंदी में मीडिया के बड़े हिस्से ने गौमांस किया।

कम्यूनिकेशन के लिहाज से ये बेहद महत्वपूर्ण बात है कि कैसे मीडिया ने प्रचलित धारणाओं की ज़द में रहते हुए बीफ़ को (सिर्फ़) गौमांस कहा और अफ़वाह और इसको लेकर चल रहे प्रोपेगैंडा को एक तरह से ज़मीन मुहैया कराई। सच्चाई को जानने-समझने और समझाने का प्रयास चूकता दिखा। सच्चाई ये है कि बीफ़ की अंतरराष्ट्रीय श्रेणी में गाय-बछड़ों के अलावा भैंस भी शामिल हैं। इस तथ्य के अभाव के चलते बीफ़ के अनुवाद ने देश में कई बार दंगे की हालत पैदा कर दी। 2013 के अगस्त में दिल्ली-जयपुर राष्ट्रीय राजमार्ग पर धारूहेरा में आरएसएस और बजरंग दल की अगुवाई में लोगों ने मिलकर 70 से ज़्यादा ट्रकों को खाक़ कर दिया। एक ट्रक में गौमांस होने की आशंका के बाद वहां लोग जमा हुए और इसे आस्था का मसला करार देते हुए तोड़-फोड़ करते रहे। कस्टम के अधिकारियों ने जब जांच की तो पता चला कि वो गाय नहीं भैंसे का मांस है। [5]

बीफ़ को गौमांस समझने के चलते देश में कई मुश्क़िलें खड़ी हुईं। इस लेख में बाक़ी मुश्क़िलों के बजाए गड्ड-मड्ड हुई धारणाओं के चलते जो व्यापक जनमानस में बदलाव आया है उसको संचार के नज़रिए से समझने की कोशिश की जा रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जब लोक सभा चुनाव प्रचार के दौरान देश भर में घूम रहे थे तो उन्होंने कई रैलियों में पिंक रिवोल्यूशन का मसला उठाया। ज़ोर दिया गया कि भारत ने हाल के वर्षों में गोमांस का निर्यात तेज़ किया है। [6] मीडिया में भी यही ख़बरें छपीं। बाद में आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत ने 2014 के विजयादशमी के दिन अपने संघ मुख्यालय में भाषण में देश के सामने अपील की कि गोमांस निर्यात पर पाबंदी लगनी चाहिए। [7] बड़ी तादाद में लोगों ने इस पर प्रतिक्रिया व्यक्त की। निर्यात के पक्ष और विपक्ष, दोनों में।

आरएसएस और अन्य संगठन की गौमांस निर्यात पर पाबंदी की मांग पहली नज़र में ही तथ्यात्मक तौर पर ग़लत है।गौमांस निर्यात’ विवाद का मुद्दा बन ही नहीं सकता क्योंकि देश में गौमांस पर पूरी तरह पाबंदी है। क़ानूनी पाबंदी। नरेन्द्र मोदी जब चुनाव प्रचार के दौरान इसे यूपीए सरकार का गुप्त एजेंडा कह रहे थे तो उससे ऐसी ध्वनि निकल रही थी जैसे भारत की जनता से चुरा-छिपाकर सरकार गौमांस का निर्यात करती हो। लेकिन समय बदला और सरकार बदली, लेकिन तथ्य नहीं बदले। नरेन्द्र मोदी अब देश के प्रधानमंत्री हैं। तथ्य ये है कि मोदी सरकार ने चीन और रूस दोनों को बीफ़ निर्यात बढ़ाने का आश्वासन दिया है। रूस और चीन दुनिया में 20 फ़ीसदी से ज़्यादा मांस का आयात करने वाले मुल्क़ हैं। फ़िलहाल भारत इन दोनों देशों को सीधे मांस निर्यात नहीं करता, बल्कि वियतनाम के रास्ते यहां मांस भेजा जाता है। सरकार की कोशिश है कि अब सीधे मांस इन दोनों देशों तक पहुंचाया जाए। [8]

असल में गौमांस का मसला भारत के बहुसंख्यक समुदाय की भावनाओं से जुड़ा है और राजनीतिक संचार की रणनीति के तहत अगर इस तथ्य को देखा जाए तो गोलबंदी के लिहाज से बहुसंख्यक समुदाय को उपयुक्त लगने वाली बात कहकर उसे अपने पक्ष में किया जा सकता है। राजनीतिक संचार में बहुसंख्यक समुदाय को उपयुक्त लगने वाली बात में अफ़वाह और प्रोपेगैडा को लेकर विमर्श नया नहीं है, बल्कि जिस वक़्त ठोस तरीके से कम्यूनिकेशन स्टडीज़ की सैद्धांतिकी गढ़ी गई उसी वक़्त से इन अवधारणाओं पर भी शोध हुए। दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान नाज़ियों के प्रोपेगैंडा पर दर्जनों शोध हो चुके हैं और सैंकड़ों लेख लिखे जा चुके हैं कि किस तरह उस वक़्त यहूदियों के ख़िलाफ़ ऐसे तथ्य लोगों तक पहुंचाए जाते थे जो नाज़ियों को गोलबंद करने में कारगर साबित हो। साथ ही विश्वयुद्ध में शरीक दुश्मन मुल्क़ों के बारे में रेडियो के ज़रिए कई तरह की अफ़वाहें और प्रचार (प्रोपेगैंडा) फैलाए जाते थे ताकि रणनीतिक बढ़त हासिल हो सके। [9]

अफ़वाह और प्रोपेगैंडा जब वांछित लाभ के लिए समाज में फैलाए जाते हैं तो उसमें तथ्यों की जांच की संभावना बहुत सीमित रह जाती है, अगर उस पर बड़े हिस्से ने यक़ीन करना शुरू कर दिया हो। बड़े हिस्से के यक़ीन को आधिकारिक सूचना के ज़रिए भी संतुष्ट करना बेहद मुश्किल काम है, क्योंकि आधिकारिक सूचना से ज़्यादा विश्वसनीयता उन्हेंसामाजिक समस्याओं के समाधान के लिए एक-दूसरे की सुनी-सुनाई बातों से हासिल हो रही होती है। [10] मनोविज्ञान के साथ इसका गहरा ताल्लुक है। चर्चित मनोविश्लेषक जी ली बॉन ने 19वीं सदी के अंत में लिखी अपनी प्रसिद्ध किताब द क्राउड में लिखा है कि किसी एक व्यक्ति के मुक़ाबले भीड़ का व्यवहार पूरी तरह अलहदा होता है। 

उनके मुताबिक़ “भीड़ में शामिल लोग किसी भी तरह के हों, सच्चाई ये है कि वो भीड़ का हिस्सा बन चुके हैं। लिहाजा उनके सोचने-समझने की दिशा सामूहिकता के साथ जुड़ जाती है। यही सामूहिकता तय करती है कि वह व्यक्ति किस तरह सोचेगा, महसूस करेगा और किसी ख़ास परिस्थिति में किस तरह की प्रतिक्रिया व्यक्त करेगा। [11] उन्होंने ये भी कहा कि भीड़ की बौद्धिकता भीड़ से अलग एक व्यक्ति की बौद्धिकता से कमतर होती है क्योंकि भीड़ तार्किक तरीके से सोचने में सक्षम नहीं हो पाती। भीड़ हमेशा मौक़े के मुताबिक़ रिएक्ट करती है। मनोविज्ञान के मुताबिक़ भीड़ तस्वीरों में सोचती है और एक तस्वीर तत्काल कई तस्वीरों का निर्माण कर देती है। कोई ज़रूरी नहीं है कि बाद की तस्वीरों का कोई सीधा संबंध पहली तस्वीर के साथ हो ही। इस तरह जो सोचने की प्रक्रिया है वो क्षणिक तौर पर मान्यताओं के दायरे में गढ़ी गई दुनिया को बचाने और उसको विस्तार देने की कोशिश का नतीजा होती है जिसकी कोई तार्किक परिणति हो, ज़रूरी नहीं।

गौमांस को लेकर गढ़ी गई मान्यताओं में दो जीज़ें बेहद महत्वपूर्ण हैं। पहली, बहुसंख्यक समुदाय के भीतर इसको लेकर मौजूद धारणा और दूसरी बहुसंख्यक समुदाय को गोलबंद करने के लिए इस्तेमाल होने वाली राजनीतिक शब्दावली और रूपक। अगर किसी राजनीतिक पार्टी के लिए गौमांस का निर्यात किसी दूसरी सरकार का गुप्त एजेंडा है तो उस राजनीतिक पार्टी को सत्ता मिलने के बाद उस गुप्त एजेंडा का या तो बंद करना चाहिए या फिर उसका तथ्यात्मक पर्दाफाश। लेकिन पिंक रिवोल्यूशन सिर्फ़ रैलियों के नारों में ही सिमटकर रह गया और नई सरकार उसी गुप्त एजेंडे को चुपचाप आगे बढ़ाने लगी। भारत दुनिया में बीफ़ का निर्यात करने वाला दूसरा सबसे बड़ा देश है। [12] लेकिन बीफ़ में भारत सिर्फ़ भैंस के मांस का निर्यात करता है। बीफ़ के प्रचलित अनुवाद के चलते इस उद्योग से जुड़े कारोबारियों को भी कई दफ़ा मुश्किलों का सामना करना पड़ा। बीफ़ के साथ गौमांस अनुवाद’ के अलावा दो-तीन धारणा और भी मौजूद हैं। पहला ये कि सबसे ज़्यादा बीफ़ निर्यात खाड़ी के देशों में होता है। तथ्य ये है कि भारत सबसे ज़्यादा बीफ़ निर्यात दक्षिण-पूर्वी एशिया के मुल्क़ों को करता है, जिनमें वियतनाम शीर्ष पर है। [13] दूसरा, बीफ़ कारोबार में सिर्फ़ मुसलमान लगे हुए हैं। तथ्य ये है कि इसमें सवर्ण हिंदू’ [14] और यहां तक कि जैन समुदाय (जो धार्मिक मान्यताओं के चलते शाकाहारी होते हैं) के लोग भी बड़ी संख्या में इस कारोबार में शामिल हैं। [15]

निर्यात से जुड़ी अफवाहों के अध्ययन में रियूमर और प्रोपेगैंडा के अलावा मीडिया की भूमिका भी पड़ताल के क़ाबिल है, लेकिन मीडिया ने इसको लेकर कब और क्या छापा-दिखाया, वो इस लेख के केंद्र में नहीं है। अफ़वाहों में भीड़ या समुदाय की सुरक्षा और दूसरी अस्मिताओं के बरअक्स अपनी सांस्कृतिक मान्यताओं को वर्चस्वशाली तरीके से पेश करने की प्रवृत्ति उत्प्रेरक का काम करती हैं। फ़ेसबुक और ट्विटर पर फैलाई गई अफ़वाहों के चलते बेंगलुरू में पूर्वोत्तर के लोगों के खिलाफ़ हुई हिंसा और नतीजतन बड़ी तादाद में उनके फौरी पलायन को इसकी नजीर माना जा सकता है। [16] विलियम जेम्स नेप्रिंसिपल ऑफ़ साइकोलॉजी में इस बात पर ज़ोर दिया है कि हिंसात्मक चेतना को अफ़वाहों के ज़रिए और ज़्यादा विस्तार दिया जा सकता है। उनके मुताबिक़ ऐसी चेतना से लैस लोगों के बीच अफ़वाहों का एक टुकड़ा गिरने के बाद अनवरत तौर पर अफ़वाहों का बाज़ार गर्म हो जाता है। यानी एक अफ़वाह अपने साथ पुछल्लों की तरह कई अफ़वाह समेटे आती हैं। [17] 

इस तरह समूह (या कहें भीड़) के ग़ुस्से को मज़बूती देने में अफ़वाहों की बड़ी भूमिका होती है। इस लेख की शुरुआत में ही मैकडोनल्ड का उदाहरण दिया गया। वो एक तरह से सामाजिक-राजनीतिक संदर्भ के साथ जुड़ी अफ़वाह थीं, लेकिन कई ऐसे उदाहरण हैं जो सीधे-सीधे खान-पान के साथ नत्थी हैं। एक शोध में डेविड डुबॉयस ने प्रयोग किया। उन्होंने कई लोगों को जमा कर एक-दूसरे को एक बात कहने के लिए तैयार किया। बात ये थी कि अमुक रेस्तरां के हैमबर्गर में कीड़े का मांस मिलाया जाता है। लेकिन ये ख़बर पुष्ट नहीं है जब इस संदेश को कई लोगों ने एक-दूसरे तक पहुंचाया तो आख़िर में हालात ऐसे बने कि ये ख़बर पुष्ट नहीं है वाले हिस्से पर किसी का ध्यान नहीं रह गया और प्रयोग में शामिल कई लोग ख़ुद उस रेस्तरां में जाने से कतराने लगे। [18] संचार अध्ययन में ऐसे कई शोध हुए हैं कि जिनमें न्वाइज़ (यानी कही गई बात को पूरी तरह उसी अर्थ में नहीं समझना) को केंद्र में रखा गया है। अफ़वाह के मामले में इसका घनत्व और बढ़ जाता है। अफ़वाहों के रास्ते कई दफ़ा दूसरों के व्यवहार को नियंत्रित करने की कोशिश की जाती है और इसका दायरा ना सिर्फ़ असंगठित या छितराए हुए दायरे में होता है बल्कि दफ़्तर के भीतर भी अफ़वाह को इसका ज़रिया बनाया जाता है। [19] ऑफ़िस में किसी के व्यवहार को नियंत्रित करने में अफ़वाह का सहारा जब लिया जा सकता है तो ज़ाहिर है कि सामाजिक दायरे को तोड़ने वालों को नियंत्रित करने में इसका इस्तेमाल ज़्यादा आसान है।

भारत में बीफ़ को लेकर ऐसी ही अफ़वाहों को मान्य बनाने की कोशिश हुई है और इसे लगातार वांछित नतीजे की तलाश में उछाला गया है। बीफ़ जिनकी फूडहैबिट में शामिल हैं उनको बहुसंख्यक धार्मिक समुदाय का वर्चस्वशाली हिस्सा द अदरके तौर पर देखते हुए नियंत्रित करने की कोशिश में रहता है। कई अध्ययन ऐसे हैं जिनमें पाया गया है कि बीफ़ के मुक़ाबले वे लोग मटन (बकरे का मांस) पसंद करते हैं जिनकी आमदनी में सुधार हुआ है। ये सिर्फ़ भारत के भीतर ही चलन नहीं है बल्कि दूसरे देशों में भी फूड हैबिट में ये ट्रेंड देखने को मिला है। बांग्लादेश और जापान जैसे दो अलग-अलग धार्मिक कंपोजिशन वाले देशों में भी मांस के चयन में क़ीमत के महत्व को महसूस किया गया है। [20] 

यानी जो मांस सस्ता है और वहां की औसत आमदनी और धार्मिक मान्यताओं के लिहाज से मुफ़ीद है वो उस समुदाय में ज़्यादा लोकप्रिय है, लेकिन आमदनी बढ़ने के साथ ही उसका रुझान भी बदलता है। भारत में बीफ़ निर्यात को लेकर बनी धारणाओं में अफ़वाहों का बड़ा योगदान है और इसकी विश्वसनीयता की  परख में मीडिया की चूक (या लापरवाही या अनदेखापन या सचेतन कोशिश) ने इस अफ़वाह की आंच को बढ़ाने में और योगदान दिया। अनुवाद की ग़लती महज अनुवाद तक सीमित ना रहकर पूरी सामजिक मान्यता, सांस्कृतिक पृष्ठभूमि और राजनीतिक वर्चस्व तक खिंच गई और बीफ़ मतलब गाय भैंस दोनों का मांस होता है ये बात दबी रह गई। भारत में कारोबारियों ने इसके लिए सचेतन बफेलो मीट शब्द का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है। लेकिन बीफ़=गौमांस ने संचार और राजनीति दोनों में शोध के लिए कई ऐसे पहलू छोड़ दिया है जिनपर काम अब भी बाक़ी है।

(मूल रूप से मीडिया स्टडीज़ ग्रुप की पत्रिका जनमीडिया के जून अंक में प्रकाशित)

[*]Allport, G. W., & Postman, L. J. (1947). The psychology of rumor. New York: Holt, Rinehart & Winston. Rosnow, R. L. (2001). Rumor and gossip in interpersonal interaction and beyond: A social exchange perspective. In R. M. Kowalski (Ed.),
Behaving badly: Aversive behaviors in interpersonal relationship

[1] From Rumors to Facts, and Facts to Rumors: The Role of Certainty Decay in Consumer Communications
- DAVID DUBOIS, DEREK D. RUCKER, and ZAKARY L. TORMALA?

[2]. David Dubois, Rumors: How they spread and how to combat them [web link- http://www.hec.edu/Knowledge/Marketing/Consumer-Behavior/Rumors-How-They-Spread-and-How-to-Combat-Them]

[3] DiFonzo, N., & Bordia, P. (2007a). Rumor psychology: Social and organizational
approaches. Washington, DC: American Psychological Association.
Page-16
[4] Shibutani, T. (1966). Improvised news: A sociological study of rumor. Indianapolis,
IN: Bobbs-Merrill.
[5] Jo winterbottom and Meenakshi Sharma, In the land of the holy Cow, fury over beef export, Reuters    [Web link- http://in.reuters.com/article/2013/12/12/india-beef-idINDEE9BB00O20131212, Last accessed – 18-05-2015]

[6] https://www.youtube.com/watch?v=1ElnjqtBbuc Last accessed – 18-05-2015
[7] Full text of speech by RSS sarsanghchalak Mohan Bhagwat on Vijaya Dashmi- 2014, Nagpur [Web link- http://samvada.org/2014/news/full-text-of-speech-by-rss-sarasanghchalak-mohan-bhagwat-on-vijaya-dashmi-2014-nagpur/ Last accessed – 18-05-2015]
[8] Dilip Khan, Special report on Meat industry in india, RSTV [web link- https://www.youtube.com/watch?v=6n6WTwOsG-A , Last accessed – 18-05-2015 ]

[10] Shibutani, T. (1966). Improvised news: A sociological study of rumor. Indianapolis,
IN: Bobbs-Merrill.
[11] LE BoN, G. "Psychologie des. Foules " (English translation " The Crowd," Lond.,
1896).
[12] Russia allows buffalo meat imports from india, December 4, 2014 [Web link- http://thebricspost.com/russia-allows-buffalo-meat-imports-from-india/#.VVmjOflViko , Last accessed – 18-05-2015]
PK Krishnakumar, ET Bureau , India’s beef exports rise 31% in 2013-14, Economic times [http://articles.economictimes.indiatimes.com/2014-06-25/news/50856076_1_buffalo-meat-beef-exports-meat-export , Last accessed – 18-05-2015]

[13] Agricultural and processed food products export development authority, ministry of commerce and industry, government of india [web link- http://apeda.gov.in/apedawebsite/MEAT_MANUAL/Chap2/Chap2.pdf, Last accessed – 18-05-2015
[14] सवर्ण हिंदू शब्द पर ज़ोर इसलिए है क्योंकि हिंदुओं में दलित समुदाय की कई जातियों में आज भी गौमांस खाने का चलन है।
[15] Dilip Khan, Special report on Meat industry in india, RSTV [web link- https://www.youtube.com/watch?v=6n6WTwOsG-A , Last accessed – 18-05-2015 ]
[16] After rumours, northeast people flee Bangalore, The hindu [web link- http://www.thehindu.com/news/national/karnataka/after-rumours-northeast-people-flee-bangalore/article3776549.ece  Last accessed – 18-05-2015 ]

[17] JAMES, WILLIAM. " The Principles of Psychology," 1890, i, p. 292, and ii, p. 412.
[18] DAVID DUBOIS
[19] Rumor as Revenge in the Workplace Prashant Bordia1, Kohyar Kiazad2, Simon Lloyd D. Restubog1, Nicholas DiFonzo3, Nicholas Stenson4, and Robert L. Tang5
[20] Koizumi, S., S. Kobayashi, S. Takaku and M. Nishino 2000. "Study on consumer behaviorf or meat consumptionin Japan".A nimal sciencejo urnal. Vol. 71' No. 6.
Md. Salauddin Palashl S. A. Saburr, CONSUMPTION LEVEL AND CONSUMER BEHAVIOUR OF MEAT IN DHAKA CITY


11 August 2015

खेती-किसानी और भारतीय राजनीति

दिलीप ख़ान

कौन बड़ा सेल्समैन?
नरेन्द्र मोदी मुझसे बढ़िया सेल्समैन हैं”- मनमोहन सिंह। मनमोहन सिंह का ये बयान बदले भारत में चल रही राजनीति के सारे पत्ते खोल देता है। पुरानी यूपीए-2 सरकार का मुखिया इस वक़्त के प्रधानमंत्री को जब सेल्समैन कह रहे हैं तो उसके साथ बढ़िया नाम का विशेषण भी लगाना नहीं भूल रहे। यानी इस वाक्य को ज़रा सा विस्तार देकर इसका अर्थ खोले तो कुल मतलब ये निकलता है कि मनमोहन सिंह ने अपने सेल्समैनशिप को पूरी तन्मयता से अंजाम देने की कोशिश की और उन्हें बढ़िया सेल्समैन नहीं होने का मलाल रह गया। बहस का एक मुद्दा तो ये है ही कि कैसे देश में प्रधानमंत्री का पद सेल्समैन में रिड्यूस हो गया। लेकिन बीते डेढ़-दो दशक की राजनीति पर नज़र रखने वालों को इसमें कोई चौंकाने वाला तथ्य हाथ नहीं लगा होगा, क्योंकि सामाजिक कार्यकर्ताओं और ग़रीब-वंचितों के सवाल उठाने वालों ने लंबे समय से सत्ता गलियारे पर ये आरोप लगाए हैं कि ये अपनी उपलब्धियों से लेकर योजना, कार्यक्रम को बेचने की जद्दोजेहद में रहते हैं। यही नहीं प्राकृतिक संसाधनों को जिस आनन-फानन में कॉरपोरेट्स के हाथों में सौंपने की मुहिम चली है उसमें हर सरकार का कमोबेस समान रुख रहा है। हाल ही में अरावली पहाड़ों के आस-पास एक निश्चित दूरी पर कोई भी निर्माण कार्य पर रोक लगाने का जब राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण ने फैसला सुनाया तो हरियाणा की पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार की तर्ज पर मौजूदा बीजेपी सरकार ने भी इसे चुनौती देने की ठान ली।

सवाल ये है कि सेल्समैन के तौर पर कोई राजनेता किसको कोई चीज़ बेचेगा? ख़रीदने की स्थिति में कौन है? खेती-किसानी के सवाल को इस ज़मीन से देखने पर मौजूदा राजनीतिक स्पेस में किसानों की स्थिति का अंदाज़ा लगाना आसान होगा। हालांकि इस पर कोई ठोस आधिकारिक अध्ययन नहीं हुआ है, लेकिन छिट-पुट आंकड़े बताते हैं कि बीते 15 साल में लाखों की तादाद में लोगों ने खेती छोड़ दी। क्या खेती छोड़ने के बाद वो बेहतर आर्थिक कारोबार में शामिल हो गए इस पर अध्ययन होना चाहिए, लेकिन ये साफ है कि जो लोग खेती में जुटे हुए हैं उसका बड़ा तबका परेशानी और सतत दबाव में जी रहा है। सरकार उन्हें ये भरोसा दिलाने में नाकाम रही है कि फ़सल नष्ट होने पर सही मुआवज़ा या फिर बेहतर पैदावार ही हालत में अच्छे न्यूनतम समर्थन मूल्य किसानों को मिल पाएंगे।
खेती की मुश्किलें

देश जब आज़ाद हुआ था तो उस वक़्त कुल जीडीपी में खेती और संबंधित क्षेत्र का योगदान 50 फ़ीसदी से ज़्यादा था। विकासशील अर्थव्यवस्था से जैसे-जैसे कोई मुल्क़ विकसित की तरफ़ कदम बढ़ाता है कृषि का जीडीपी में योगदान भी घटता जाता है, लेकिन क्या देश में खेती-किसानी सचमुच यूरोप या अमेरिकी मॉडल पर हो रही है और क्या भारत की सामाजिक बनावट उन मुल्क़ों की तरह है? दोनों सवाल का जवाब ना में है। इस वक़्त कुल जीडीपी में कृषि का योगदान महज 13 फ़ीसदी है, लेकिन प्लान आउटले के आंकड़ें देखें तो साफ़ हो जाता है कि सरकार का ध्यान इतने हिस्से पर भी ठीक से नहीं जाता। खेती का बजट आवंटन 8 फ़ीसदी के क़रीब है। भारत जैसे विशाल देश के लिए ये जानना बेहद ज़रूरी है कि 13 फ़ीसदी जीडीपी में हिस्सेदारी वाला कृषि क्षेत्र की बदौलत ही सवा अरब लोगों का पेट भरता है। यानी जीडीपी की हिस्सेदारी से कहीं व्यापक महत्व खेती-किसानी का है जिसे नज़रअंदाज़ करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी जा रही।

जाहिर है खेती पर दबाव है। दोतरफ़ा दबाव। यानी अगर पैदावार नष्ट हुई तो किसानों की लागत वसूली नहीं होती और अगर बंपर पैदावार हुई और न्यूनतम समर्थन मूल्य नहीं बढ़ाया गया तो अनाज की क़ीमत में कमी आने की वजह से फिर से लागत निकालने के लाले पड़ जाते हैं। किसान उस छोर पर नहीं खड़ा है जहां वो सेल्समैन के उत्पादों को ख़रीद सके। राजनीतिक मोर्चे पर भी किसान लगातार रिसिविंग एंड पर पहुंचता जा रहा है। ज़मीन अधिग्रहण के ख़िलाफ़ किसानों के ज़बर्दस्त प्रदर्शन के वावजूद सरकार अध्यादेश लाने पर अडिग रही। फिर, सेल्समैन में तब्दील हो चुकी सरकार को परवाह किसकी रहेगी? जाहिर है उनकी जो उनका माल ख़रीद सके। नागरिक से उपभोक्ता तक का विमर्श नवउदारवादी संरचना में बहुत पुराना है, लेकिन उसे जिस सरलीकृत तरीके से मनमोहन सिंह ने पेश किया वो बताता है कि जो ख़रीदने की स्थिति में है वही सरकार से मोल-तोल करने की भी हालत में है। या कहिए कि सरकार भी उसी से मोल-भाव कर रही है। वो कौन है? किसान तो कतई नहीं। वो वो हैं जो मुंबई में अपनी बहुमंजिला इमारत के एक फ्लोर पर बागवानी करते हैं। वो धान नहीं उगाते, ना ही गेहूं। वो शौकिया बागवानी करते हैं। ज़मीन से दर्जनों फुट की ऊंचाई पर। ऐसे खेतीहरों के कई रूप हैं। किसी का नाम अंबानी नामक शब्द पर ख़त्म होता है, किसी का वाड्रा और किसी का अदानी।

राहुल गांधी ने हाल ही में ज़मीन अधिग्रहण के ख़िलाफ़ माहौल बनाने के लिए देश के कई इलाक़ों का दौरा किया। रेल के साधारण डब्बे में बैठकर पंजाब गए  और पंजाब में जिन चंद किसानों से मिले और जिन्हें मदद का आश्वासन दिया गया, उनमें से एक बुजुर्ग किसान ने शुरुआती जून में थक-हारकर आत्महत्या कर ली। किसान आत्महत्याओं को लेकर राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो का काम लगातार बढ़ता जा रहा है। सबकुछ आंकड़ों में तब्दील हो गया है। 1995 में डब्लूटीओ सम्मेलन के ठीक सामने एक कोरियाई किसान ने जब किसानविरोधी नीतियों से विरोध जताते हुए आत्मदाह किया था उसके बाद से दुनिया में कुछ नहीं बदला। भारत में तो कतई नहीं। भारत के कई हिस्से आत्महत्या वाले नक्शे में अब एंट्री पा रहे हैं। पंजाब इनमें से एक है। विदर्भ, तेलंगाना, बुंदेलखंड और छत्तीसगढ़ तो पुराने इलाक़े हैं। इन आत्महत्याओं की वजहें क्या हैं? पहली, फ़सल नष्ट होना। दूसरी, तकनीक पर बढ़ती निर्भरता। तीसरी, संकर नस्ल के बीजों का आगमन और पारंपरिक बीजों का लुप्तप्राय होना। चौथा, सिंचाईं का अभाव और पांचवां, विदर्भ जैसे इलाक़ों में खाद्यान्न के बदले नकदी फ़सलों का उत्पादन। ज़्यादातर मामलों में सीधी वजह इनमें से कोई नहीं होती। सीधा और तात्कालिक कारण क़र्ज होता है, लेकिन क़र्ज के तार इन्हीं कारकों से जुड़े हैं।

कपास उगाने वाले किसान की अगर फ़सल नष्ट हुई तो लागत तो डूबी ही, साथ ही खाद्यान्न उत्पादन करने वाले किसानों की तरह बची-खुची फ़सल वो खा भी नहीं सकता। सरकारी स्तर पर जो मुश्किले हैं वो मुख्यत: तीन हैं। पहली, मुआवज़े के बंटवारे की सही नीति का अभाव। दूसरी, कंटींजेंसी प्लान का सही तरीके से लागू ना हो पाना और तीसरा किसानों की पहचान। आम तौर पर किसानों की पहचान पर भारत के समकालीन कृषि विमर्श में चर्चा नहीं होती, लेकिन इससे बहुत सारी चीज़ें नत्थी हैं। एक मिसाल से समझिए। बुंदेलखंड के एक भूमिहीन किसान ने बड़े किसान से किराए पर साल भर के लिए ज़मीन ली। पैदावार अच्छी थी लेकिन जब कटने पर आई तो बेमौसम बरसात और ओलावृष्टि के चलते फ़सल बर्बाद हो गई। लागत भी नहीं निलकी। सरकार ने मुआवज़े का ऐलान किया। नियम के मुताबिक़ ज़मीन के मालिक को मुआवज़ा मिला। अब जिस छोटे किसान ने किराए पर ज़मीन ली, जिसने मेहनत की, जिसका पैसा डूबा, जिसकी फ़सल डूबी, सरकार की पूरी नीति में वो कहीं मौजूद ही नहीं है।
खेती में फंसी जान


मुआवज़े के नाम पर कैसे 10 रुपए और 100 रुपए के चेक बांटे गए ये दो-तीन महीने पहले की राष्ट्रीय सुर्खियां थीं। जाहिर है ये कोई पहली बार नहीं हुआ। मुआवज़े की रकम किसानों तक पहुंचने से पहले लूट-खसोट और कमीशनखोरी का समूचा तंत्र बिछा है। फिर सवाल आता है कि मुआवज़ा किस हालात में? पहले आधी फ़सल नष्ट होने पर मुआवज़े का नियम था, मोदी सरकार ने इसे घटाकर 33 फ़ीसदी कर दिया। पहल अच्छी है, लेकिन किसान इसे दूसरे नज़रिए से देख रहा है। किसानों का कहना है कि अगर 30 फ़ीसदी फ़सल नष्ट होने पर उन्हें मुआवज़ा नहीं मिलेगा और 33 फ़ीसदी नष्ट होने पर मिलेगा तो 3 फ़ीसदी वो ख़ुद से नष्ट कर देंगे। ज़ाहिर है सरकार को किसानों की स्थिति का अंदाज़ा नहीं है कि प्राकृतिक वजहों से 30 फ़ीसदी फ़सल नष्ट होने पर वो कैसी परिस्थिति में फंस जाते हैं!

ये लगातार दूसरा साल है जब मौसम विभाग ने मानसून में 12 फ़ीसदी कमी का आकलन पेश किया है। बीते साल देश के कई इलाक़े सूखे की चपेट में थे और इस बार भी यही अंदेशा है। इससे किसानों की सेहत पर सीधे फर्क तो पड़ता ही है, लेकिन बाद की स्थिति से भी उसे जूझना पड़ता है। एक तो सिंचाईं के साधन नहीं होने के चलते पैदावार गई और दूसरा आमदनी नहीं होने के चलते हाथ में क्रयशक्ति नहीं रह गई जिससे बाज़ार से वो खाद्यान्न ख़रीद सके। देश में इस वक़्त भी 45 फ़ीसदी से ज़्यादा हिस्से पर सिंचाईं का पूरा दारोमदार बारिश के हाथों में है। सेंटर फॉर साइंस एंड इनवायरामेंट से जुड़ी चर्चित पर्यावरणविद सुनीता नारायण कई वाकयों पर इसी संदर्भ में एक बात दोहराती रहती हैं कि मानसून देश का वित्तमंत्री है। यानी मानसून समय पर नहीं आया या फिर बेमौसम बरसात हुई तो उत्पादन चौपट। सरकार इससे पार पाने के लिए दो तरीके अपना रही है। पहला, फौरी कदम के रूप में कंटींजेंसी प्लान। यानी वित्तीय राहत। दूसरा, भारतीय कृषि एवं अनुसंधान संस्थान इस दिशा में लगातार काम कर रहा है कि बीजों का वो नस्ल तैयार किया जाए जो देर से मानसून आने पर कम समय में उतनी ही पैदावार के लायक हो। यानी सामान्य तौर पर जो फ़सल चार महीने में तैयार होती है, उतनी ही फ़सल दो-ढाई महीने में तैयार हो जाए। लेकिन अभी इस प्रयोग को शहरों में भी ठीक से स्वीकृति नहीं हासिल हुई है और देहातों में तो खेती के योजनाकार पहुंचने में भी हिचकिचाहट दिखाते हैं।

खेती का संबंध सिर्फ़ खेती तक टिका नहीं है, जब तक खेती के अलावा इससे संबंधित क्षेत्रों को मिलाते हुए एक मुकम्मल योजना तैयार नहीं होती, कृषि का संकट बरकरार रहेगा। स्मार्ट सिटी और बुलेट ट्रेन के सपने देखने वाले गलियारे में लघु-कुटीर उद्योग के जाल को विस्तार देने की योजना प्राथमिकता में बहुत पीछे है। यही वजह है कि खाद्य मुद्रास्फीति लगातार बढ़ती जाती है और सकल मुद्रास्फीति आंकड़ों में शून्य के स्तर पर दिखती रहती है। यही विडंबना है और यही देश में नीति-निर्माताओं की प्राथमिकता और लोकेशन भी दर्शाता है। स्मार्ट सिटी को दो बार बेचा जा सकता है। पहले तो निर्माताओं के सामने योजना को बेचकर और फिर अपनी ताक़त दिखाने के लिए तैयार स्मार्ट सिटी को दुनिया के मानचित्र पर। सबकुछ बिकने और बेचने का मामला है। मामला सेल्समैन तक पहुंच गया और बेचने का हुनर बदल गया, लेकिन किसान अभी भी मंडी के चक्कर में ही चप्पलें घिस रहा है। उनके चप्पलों की आवाज़ छोटे मंडी कारोबारियों तक ही सीमित रहती है और बढ़िया सेल्समैन देश स्तर की नीतियां बेचते रहते हैं।  

(सबलोग के जुलाई महीने में प्रकाशित)