26 March 2015

युद्ध-क्षेत्र में आदिवासी जिंदगियाँ : बीजापुर के गावों में सुरक्षा कैंप के बीच असुरक्षित जीवन

26 से 31 दिसंबर 2014 के बीच पी.यू.डी.आर. का एक जांच दल छत्तीसगढ़ के बीजापुर ज़िले के 9 गावों में गया | जांच दल ने इन क्षेत्रों में माओवादियों से लड़ने के लिए तैनात सुरक्षा बलों के द्वारा की जा रही गिरफ्तारियों, धमकियों, एवं उत्पीड़न के साथ-साथ यौन-उत्पीड़न की घटनाओं को दर्ज़ किया | मुख्यतः आदिवासी, इन गावों (सार्केगुड़ा, राजपेटा, कोट्टागुड़ा, पुसबाका, तीमापुर, लिंगागिरी, कोरसागुड़ा, बासागुड़ा, कोट्टागुडेम) के निवासियों ने सुरक्षा कैम्पों में रह रहे सशस्त्र बलों द्वारा प्रतिदिन किये जाने वाले अपराधों तथा हिंसक गतिविधियों के तथ्य बयान किये | सुरक्षा बलों द्वारा लगातार इन 'क्षेत्रों में प्रभुत्व' स्थापित करने के प्रयास के दस्तावेज़ीकरण के अलावा, यह रिपोर्ट निम्न बिन्दुओं पर विशेष ध्यान आकर्षित करती है -
1. आबादी की एक बड़ी संख्या के खिलाफ 'स्थाई वारंट' जारी किये गए हैं और इनमें से एक बड़ी संख्या को 'फरार' घोषित कर दिया गया है | एक मोटा आंकलन यह दिखाता है की केवल बीजापुर में ही कम से कम 15 से 35 हज़ार लोग 'स्थाई वारंट' के आतंक और भय के साये में जी रहे हैं |
2. सशस्त्र बल और स्पेशल पुलिस ऑफिसर (एस.पी.ओ.) बेलगाम तरीके से अवैध बर्ताव करते हैं जैसे की नियमतः आदिवासी ग्रामीणों के घरों पर छापा मारना, पिटाई करना, लूट-पात, हवालात में बंद करना तथा उनको सुरक्षा कैम्पों में 'बेगार' (मुफ्त श्रम) करने के लिए बाध्य करना | यौन-उत्पीड़न के मामले भी सामने आये |
3. एक ओर सुरक्षा बलों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज़ करने की असंभवता और दूसरी ओर जेलों में बंद ग्रामीणों की गिरफ्तारियों की बढ़ती संख्या |
4. कैम्पों में आपूर्ति-प्रणाली सुनिश्चित करने हेतु सेना द्वारा बढ़ते स्तर पर सड़क-निर्माण कार्यों की वजह से सशस्त्र बलों की उपस्थिति में अधिक्यता | सड़कों को खोलने का काम सशस्त्र बलों द्वारा सड़क उदघाटन अभ्यास के बाद ही किया जाता है और तत्पश्चात सड़क-अवरोधकों तथा चेक पोस्टों पर बार-बार यात्रियों को रोका जाता है | यह रोज़ाना का सिलसिला है |
5. बीजापुर और बासागुड़ा के बीच चलने वाली सार्वजनिक बसों में सशस्त्र बलों के जवानों के होने के कारण ग्रामीणों को यात्रा के दौरान उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है | अंतर्राष्ट्रीय नियमों की घोर अवहेलना करते हुए, सुरक्षा बल जान-बूझकर संभाव्य मुठभेड़ों के खिलाफ यात्रियों को 'मानवीय कवच' के रूप में इस्तेमाल करते हैं |
6. आदिवासी ग्रामीणों की जीवन-स्थिति पर कैम्पों ने बहुत बुरा प्रभाव डाला है | कृषि-कार्यों में कमी और परिणामस्वरुप पारिवारिक आय और वेतनों में गिरावट इस उत्पीड़न का निश्चित परिणाम है | ख़राब स्वास्थ्य सेवाओं के साथ ही वर्तमान स्कूल व्यवस्था (जिसके तेहत स्थानीय ग्रामीण सहायकों की सेवाएं ली जा रही थी) को अब इरादतन 'आश्रम स्कूलों' में बदला जा रहा है और इसका मकसद आदिवासी बच्चों को उनके घरों और ग्रामीण परिवेश से खींच लेना है |
7. वर्तमान परिस्थिति की प्रबलता सलवा जुडूम की गतिविधियों (2005 से 2009 के बीच ग्रामीणों के बेदखली और सामूहिक विस्थापन) से तुलनीय है और उसको आगे बढ़ाती है | वर्तमान परिस्थिति केवल विस्थापन और यतित पुनर्वास की दुर्गति को रेखांकित करती है जिसके तेहत पहले भी ग्रामीणों को गुज़रने के लिए बाध्य किया गया था |
8. माओवादियों द्वारा बारम्बार किये जा रहे बम विस्फोटों तथा सड़कों को निशाना बनाये जाने के बावजूद, ग्रामीण सुरक्षा कैम्पों से डरते हैं क्योंकि वे सशस्त्र बल ही है जो उन्हें प्रताड़ित करते हैं और उनके खिलाफ नृशंस व्यवहार करते हैं |
9. क्रमबद्ध आवधिक जनसंहारों के साथ-साथ इस क्षेत्र में दैनिक उत्पीड़न राज्य द्वारा चलाए जा रहे युद्ध की दोहरी रणनीति का हिस्सा है |
10. वर्तमान सैन्य उपक्रम के पीछे यही मंसूबा है की खनन गतिविधियों को और अधिक बढ़ाने के लिए क्षेत्र को साफ कर दिया जाए | उद्देश्य यह भी है की आदिवासियों की राज्य का विरोध करने की इच्छशक्ति को ख़त्म कर दिया जाये और उन्हें आधिकारिक प्रयासों को स्वीकार करने के लिए तैयार किया जाये|

23 February 2015

धर्म-परिवर्तन, घरवापसी और देशद्रोह: खतरा क्या है?

२८ जुलाई १९८९ को राजस्थान उच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ ने अदालत के भीतर स्थापित मनु की प्रतिमा को हटाने का फैसला सर्वसम्मति से पारित किया था. उस समय डा. सुरेन्द्र कुमार ने इस फैसले को वापस लेने के तर्क में १४ सूत्रीय बातें रखीं. उन्होंने मनु के पक्ष में कहा कि “बादशाह शाहजहाँ के लेखक पुत्र दाराशिकोह ने मनु को वह प्रथम मानव कहा है, जिसे यहूदी, ईसाई, मुसलमान आदम कहकर पुकारते हैं.” कोर्ट ने उनका हर तर्क गौर से सुना और अपना फैसला वापस लिया. याचिकाकर्ता ने ब्रिटेन, अम्रेरिका, जर्मन से प्रकाशित ‘इनसाइक्लोपीडिया’ को भी इस विषय पर बतौर प्रमाण रखा. यह बताया कि इसमें भी ‘मनु’ को आदि पुरुष, आदिम धर्मशास्त्रकार, आदि विधि धर्मप्रणेता, आदि न्यायशास्त्री और आदि समाजव्यवस्थापक वर्णित किया है. अगर यह सही है तो वेदों का पूरी तरह द्विज की श्रेणी में रख दिया जो कि मनुस्मृति से पूर्व रचे गये.
ये कैसे हिन्दू समुदाय हैं जो वेदों से पहले मनुस्मृति को तरजीह देते हैं. इसका मतलब है कि कहीं कुछ है जो वेदों और मनुस्मृति के बीच अलग है. जो गंभीर चिंता पैदा करता है. एक वजह तो यह हो सकती है कि मतभेद धर्मशास्त्रों को मानने वाले धर्माचार्यों के अंदरूनी मतभेद या कलह का नतीजा हो. या फिर मनुस्मृति को इसलिए तो नहीं रचा गया कि उससे एक ख़ास वर्ण या समुदाय को सर्वश्रेष्ठ घोषित किया जा सके और दूसरे को निम्न वर्ण कहकर उसका हर तरीके से शोषण किया जाए. सनातन धर्मग्रंथ वेद हैं जिनकी प्रामाणिक तिथि भले ही गौण है. मनुस्मृति को ५७१ ईस्वी के शिलालेख में प्रामाणिक घोषित किया गया है. वेदों और मनुस्मृति को मानने वाले वर्ण भले ही एक हों मगर जातीय समुदाय अलग-अलग हैं. मतलब यह कि दोनों एक ही धार्मिक अस्मिता के दो अलग-अलग समुदायों का वर्गीय संघर्ष है. जिसमें मनुस्मृति के मानने वालों ने वर्ण-व्यवस्था दी, जातियां निर्धारित कीं. शंकराचार्य पैदा किये और इसको प्रचारित किया.
सवाल यह है कि अगर याचिकाकर्ता की चौदह सूत्रीय बातें मान ली जाएँ तब किसी भी व्यक्ति या समुदाय द्वारा इस्लाम क़ुबूल करने पर धार्मिक हिन्दू समुदायों को आपत्ति कतई नहीं होनी चाहिए. धर्म परिवर्तन के बावजूद इस्लाम क़ुबूल करने पर भी आखिर वे रहेंगे तो आदम (मनु) की ही औलादें. उन्होंने आगे और भी बहुत कुछ कहा  “महर्षि दयानंद ने वेदों के बाद मनुस्मृति को ही धर्म में प्रमाण माना है” अब अगर वेद मनुस्मृति से पहले लिखे गये थे तो मनु सृष्टि का पहला व्यक्ति (आदम) कैसे घोषित हुआ? इसका मतलब है वेद लिखने वाले आदम-मानव, मनु से पहले भी धरती पर मौजूद थे. फिर मनु को दुनिया का पहला व्यक्ति किस तरह माना जाय? श्री अरविन्द अगर मनु को अर्द्ध देव मानते हैं तो पूर्णदेव कौन थे? वह आदम की शक्ल में पैदा नहीं हुए. फिर किस रूप में जन्मे? अगर वेद की रचना मनुस्मृति से पहले हुई तो वैदिक ऋचाओं को हिन्दू ला में शामिल क्यूँ नहीं किया गया? मनु के विधानों को ही हिन्दू ला के लिए अथारिटी क्यों माना गया?
एक और महत्त्वपूर्ण बात, अम्बेडकर जिन्दगी भर मनुस्मृति का विरोध करते रहे. कभी भी ख़ुद को मनु की औलाद नहीं माना. जबकि उनकी मूर्ति का अनावरण करते हुए तत्कालीन राष्ट्रपति आर. वेंकटरमण ने  अम्बेडकर को ‘आधुनिक मनु’ कहकर संबोधित किया. इस तरह वे दलितों के संघर्ष, और उनकी समूची जातीय अस्मिता पर एक बड़ा हमला करते है. क्या धर्मगुरू आधुनिक मनु को स्वीकारेंगे? जो शख्सियत हिन्दू नहीं रहा. बौद्ध हो गया, उसे अंत में आधुनिक मनु घोषित किया जाना दलितों के जातीय संघर्ष को कुचलना है. उनकी मृत्युपरांत हिन्दू धर्म में वापसी करने का एक तरीका निकाल लिया.
धर्म परिवर्तन के मामले में लम्बे समय से तमाम तरह की जद्दोजहद जारी रही है. फिलहाल आगरा के उन ६० मुस्लिम परिवारों को देखें. कबाड़ बेचकर गुजर बसर कर रहे इस छोटे से समुदाय को हिन्दू धर्म में शरणागत किया गया. इस्लाम से हिन्दू बनाने के लिए जिनका शुद्धिकरण किया गया. इस शर्मनाक कारनामे को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के धर्म जागरण प्रकल्प और बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने अंजाम दिया.
किसी भी समुदाय में रहने वाले लोगों को जबरदस्ती मजहब बदलने के लिए प्रलोभन देना, संविधान के विरुद्ध है. धर्म बदलने के लिए बलपूर्वक मजबूर करना गलत है. अगर कोई व्यक्ति अपनी इच्छा से धर्म बदलना चाहे तो उसे इस बात की आजादी है. यह अपराध नहीं है. सैकड़ों लोग अब तक हिन्दू से बौद्ध धर्म में जा चुके हैं. इनकी घरवापसी पर हिन्दू समुदायों ने बात क्यों नहीं की ? कोई बहस नहीं छिड़ी ? इसमें दिलचस्प यह है कि जो दलित नेता उदित राज दलितों को सबसे अधिक संख्या में बौद्ध धर्म की ओर ले गये. भले ही उन्हें वर्ण-व्यवस्था में ब्राह्मण होने का दर्जा नहीं मिला. उन उदित राज को बगैर धर्मांतरण के राजनीतिक दल ने स्वीकार कर लिया.  वह खुद ही हिन्दू सम्प्रदाय और धर्म को रिप्रेजेंट करने वाली राजनीतिक पार्टी में शामिल हो गये.
जिन वेदों को हिन्दू धर्म के भीतर मान्यता दी गई. वह आदिम सभ्यता में सनातन धर्म के रूप में जाना जाता रहा है. बौद्ध धर्म का कोई सम्बन्ध हिन्दू कहे जाने वाले सनातन धर्म से कभी नहीं रहा. बौद्ध दीक्षा लेने वाली ज्यादातर जातियां दलित हैं. इस्लाम क़ुबूल करने वाले ज्यादातर समुदाय दलित हैं. हिन्दू होने का दर्जा दलितों को किसने दिया? हिन्दू क्या किसी भौगोलिक दायरे के ख़ास समुदाय में जीने वाले लोगों को माना जाता है. अगर ऐसा है तब तो आदिवासी सबसे पुराने आदि हिन्दू हुए. किन्तु वह तो किसी मनुस्मृति को नहीं जानते. न ही मनु उनके आदि देव हैं. दूसरी तरफ दलितों के आदि देव भी मनु नहीं हैं. फिर ये घरवापसी कराने वाले लोग किन हिन्दुओं को वापस लाने की बात करते हैं. आखिर किसी दलित या आदिवासी के इस्लाम क़ुबूल करते ही ये हंगामा क्यों? इस्लाम क़ुबूल करते ही इंसान में ऐसा क्या बदल जाता है कि कट्टर हिन्दू समुदाय के भीतर खलबली मच जाती है, घरवापसी के लिए हंगामा होता है. इसे समझने की जरूरत है.
अगर आर्य ही मनु की संतानें हैं और आर्य अगर वेद लेकर धरती पर हिमालय से आये और “सनातन धर्म ही हिन्दू धर्म है. जो अपने मन, वचन, कर्म से हिंसा को दूर रखे, वह हिन्दू है. और जो कर्म अपने हितों के लिए दूसरों को कष्ट दे वह हिंसा है।“ अगर हिन्दू धर्म की यह परिभाषा है तो फिर सदियों से कट्टर हिन्दूवादियों ने दलित जातियों का शोषण क्यूँ किया. यहाँ तक कि वेदों में ‘जाति’ केवल एक ‘वर्ण’ न होकर रंग, कर्म और गुण पर आधारित थी. जबकि मनु का ‘मानव धर्मशास्त्र’ जिसे कहा गया वहां वर्ण-व्यवस्था में ‘जाति’ भेदभाव पूर्ण है. ये वैदिक धर्म और मनु के धर्मशास्त्र का कैसा विभेद है ? जिसके चलते मनुवादियों ने अपने ही आदिम देव मनु की संतानों को यानी आदिवासियों और अश्वेतों को कभी धार्मिक रूप से बनी सामाजिक व्यवस्था में कोई जगह नहीं दी. कभी सामाजिक सम्मान नहीं दिया और जहां तक संभव था हर तरह से दबाया कुचला गया.
हालाँकि यह सवाल मनुवादी, संघी और उनके राजनीतिक दल भाजपा के लोग अच्छी तरह समझते हैं. किन्तु हमेशा से सत्ता की राजनीति और मुख्यधारा में बने रहने के लिए क्या कुछ नहीं हुआ. सवाल तो और भी हैं. बौद्ध धर्म हिन्दू धर्म की प्राचीन शाखा किस तरह रही है? क्या वजह थी कि संघियों ने बौद्ध धर्म को बौद्ध-हिन्दू होने का गौरव दिया. गौतम बुद्ध हिन्दू राजघराने में पैदा हुए. इसलिए? बौद्ध हिन्दू कब से हो गये? हिन्दू संगठनों के पास इसका कोई प्रमाण नहीं है.
यदि आर्यों की ही एक शाखा ने दो हज़ार ईसा पूर्व यहूदी धर्म की स्थापना की. इसकी अन्य शाखाओं के रूप में  ५०० इसा पूर्व बौद्ध धर्म आया. दो हज़ार वर्ष पूर्व इसाई धर्म, १४०० वर्ष पूर्व इस्लाम आया तो फिर हिन्दुओं को आर्यों की अन्य शाखाओं से इतनी नफरत क्यों है? क्या हिन्दू स्वयम को आर्यों की संतान नहीं मानते? इसका एक ही कारण समझ में आता है. इन सभी शाखाओं का अस्तित्व में बने रहने के लिए सतत संघर्ष. यह संघर्ष हर शाखा के धर्माचार्य और उसके सम्प्रदाय के अस्तित्व को मुख्यधारा में लाने के लिए लड़ी जा रही साम्पदायिक, जातीय लड़ाई है. इसके लिए वह राजनैतिक आश्रय लेती है. धार्मिक सत्ता का राजसत्ता के शीर्ष पर आने के लिए युद्ध और छल-छद्म ही एकमात्र रास्ता है. इस सोच पर आधारित हर धार्मिक शाखा की अस्मितावादी लड़ाकू सेनायें बनीं. ऐसे में धार्मिक सेनाभर्ती के नागरिकों का खून बहना स्वाभाविक है. क्योंकि सत्ता धर्म की हो या राजनीति की, उसे बने रहने के लिए संघर्ष में धर्म की अन्य साम्प्रदायिक अस्मिताओं से युद्ध होता रहा है. सत्ता कभी भी केवल धर्म से हासिल नहीं की जा सकी. इसलिए धार्मिक सम्प्रदायों की हरेक अस्मिता को बचाने की लड़ाई अनवरत चलेगी. सत्ता हमेशा से ही तमाम सम्प्रदायों की लड़ाई के बीच किसी एक शाखा के बहुसंख्यक समुदाय का समर्थन लेकर ही ताकतवर बनी रही. सत्ता केवल धार्मिक अस्मिता के लिए शास्त्रार्थ से हासिल नहीं होती. शास्त्रार्थ केवल धर्म दर्शन के विस्तार के लिए उसकी ख्याति के लिए शास्त्रीय लड़ाई तक सीमित रहा है. अतः धर्म के सभी सम्प्रदायों का राजनीतिक दखल पहचान बचाने की खातिर बेहद जरूरी होता गया.
अगर हम ऐसे में धर्मांतरण की बात करें तो जब स्वेच्छा से कुछ लोग इस्लाम क़ुबूल करते है. या इसाइयत क़ुबूल करते हैं ज्यादातर मामलों में दबे कुचले लोगों का बहुसंख्यक तबका ही ऐसा करता है तो यह इस बात का सूचक है कि एक ही धार्मिक सम्प्रदाय में मेहनतकश तबका धर्म की जिस शाखा में रह रहा है वहां उसे बुनियादी अधिकारों से महरूम रखा गया है. उन्हें सत्तासीन लोगों द्वारा दबाया, कुचला जा रहा है. उसके मौलिक अधिकारों का हनन हो रहा है. उसे जीने के अधिकार से वंचित किया जा रहा है. मगर मनुवादी हैं कि जिद पर अड़े हैं चाहे कुछ भी हो हिन्दू शाखा की दलित शोषित जाति इस्लाम क़ुबूल नहीं कर सकती. धर्माचार्यों और हिन्दू सम्प्रदाय का ये कैसा भेदभावपूर्ण रवैया है ? जबकि अलग-अलग समुदायों और धर्म के लोग एक ही राजनीतिक दल में रहते हुए कभी भी अपना दल बदल सकते हैं. उनका शुद्धिकरण क्यों नहीं किया जाता. उनकी घरवापसी का सवाल कभी क्यों नहीं उठाया गया? मगर धर्म परिवर्तन करते ही मनुवादी सम्प्रदाय के लोग घरवापसी की जिद पर अड़ जाते हैं. धार्मिक दलों से ज्यादा लोकतांत्रिक प्रक्रिया तो राजनीतिक दलों की है. जिसमें अर्थ वैभव का दबदबा और लोकतांत्रिक पदों पर चयनित लोग हिन्दू हों या मुसलमान, दोनों ही हर राजनीतिक दल में पाए जाते हैं. यहाँ जातीय या धार्मिक तरीके से किया जाने वाला भेदभाव नहीं है. तो फिर धर्म की शाखाओं में भेदभाव पूर्ण रवैया क्यों ? क्या यह केवल धर्म की राजनीति करने वालों की धूर्तता है जिसमें आम नागरिक मरता है, सर फुटौवल होता है. हत्याएं होती हैं. एक ही देश की दो भौगोलिक सीमाएं, सनातन धर्म के दो सम्प्रदाय जिन्हें भारत (हिन्दू बाहुल्य) और पाकिस्तान (मुस्लिम बाहुल्य) के रूप में बांटा गया. उनके बीच युद्ध होते हैं. राष्ट्रवाद के नाम पर लाखों हत्याएं हुई हैं. कौन थे वे लोग जो मारे गये. और कौन थे वो लोग जिन्होंने हत्याएं की. दोनों ही धार्मिक समुदाय से सम्बंधित थे. किन्तु राजनीतिक दुश्मन. ये रंजिश जिसे भौगोलिक बंटवारे ने पैदा किया. धर्म के आधार पर जमीन का बंटवारा. धर्म जिसने पैदा की मानवता. धर्म जिसने रची सभ्यताएं. धर्म के नाम पर ये कैसी घिनौनी राजनीति हो रही है.
सत्ता और धर्म की ये कैसी जहरीली राजनीति है. जिसमें राजनीति और धर्म ध्वजारोही दिग्गज निजी हित साधे देश पर हत्याओं का कलंक चस्पा कर रहे हैं और जनता की जानें ले रहे हैं. नृशंस हत्याओं को राष्ट्र और धर्म के लिए वाजिब बताया जा रहा है.
ये लोग कैसे भूल सकते हैं कि इस्लाम (भौगोलिक परिप्रेक्ष्य में) हिन्दुस्थान और आर्यावर्त की आदिम सभ्यताओं में पैदा हुआ. फिर मनुवादियों को हिन्दू होने का गर्व इस्लाम के गर्वीले अस्तित्व से अधिक क्यों है? धर्म दर्शन की मानें तो दोनों धर्म आर्यावर्त में ही जन्मे. इनकी भौगोलिक स्थिति और सम्प्रदायों में शैलीगत अंतर था. चूंकि भौगोलिक अंतर होने के कारण समय के साथ-साथ दोनों सम्प्रदायों की मूल मान्यताओं में अंतर आता गया. मूल निवासी ‘पूर्वज’ दोनों समुदायों के एक ही थे. फिर इन दोनों के बीच कैसा धर्मांतरण और कैसी घरवापसी? इसलिए कि हिन्दुओं की एक शाखा की आबादी दूसरे सम्प्रदाय में शामिल हो रही है. और दूसरी कौम की बढ़ोतरी से हिन्दुओं को हर हाल में आगे रहना है. धर्म का अन्धानुकरण करने वाले मठाधीशों का यह चरित्र समझना जरूरी है.

असल में सबसे बड़े देशद्रोही तो वो लोग हैं जो न्याय और समतामूलक जमीन पर धार्मिक राजनीति के लिए रणभूमि तैयार करने में लगे हैं. अलगाव की बारूदी बिसातें बिछा रहे हैं, धार्मिक युद्ध छेड़ने की तैयारी में हैं. जिनके मार्फत यह बड़ी चतुराई और कुटिलता से फैलाया गया कि जो हिन्दू नहीं हैं वह देशद्रोही है. हिन्दू क्या केवल मुख्यधारा में शामिल धर्मगुरुओं और सियासतदारों की सत्ता का नाम है. जो मुख्यधारा में नहीं है वह बहुसंख्यक आबादी तो दलित, मुसलमान और आदिवासी जनों की है. मगर ज्यादातर आबादी सत्ता की बोई जहरीली फसल काटने में मसरूफ है. जबकि अनुसूचित, जनजाति, अल्पसंख्यक समुदायों को संविधान में अथक संघर्षों के बाद जगह मिली. जिस हिन्दू या इस्लाम की बात करने वाले सियासतदार धर्म के अन्य सम्प्रदायों, शाखाओं को फलने फूलने की बजाय उनका सरेआम क़त्ल कर रहे हैं उसे न्यायोचित ठहरा रहे है. वे सचमुच कभी मानेंगे कि किसी भी सम्प्रदाय का धार्मिक होना कोई गुनाह नहीं, बल्कि व्यापक जीवन दर्शन का होना है. 

03 February 2015

दिल्ली में कांग्रेस यानी डूबने-उबरने का आख्यान


-दिलीप ख़ान

(24 जनवरी को ये लेख मासिक 'सबलोग' के लिए लिखा गया। दिल्ली की राजनीति में कांग्रेस की हालत की पड़ताल इसमें की गई है।)

माकन के सर पर हिमालय-सा बोझ
पिछले दिल्ली चुनाव में अब तक का सबसे ख़राब प्रदर्शन करने वाली कांग्रेस के लिए उसके बाद लगातार झटके मिलते रहे हैं। लोक सभा चुनाव में 44 सीटों पर सिमटने के बाद केंद्र में सत्ता का तक़रीबन पर्याय बन चुकी इस पार्टी के पूरे तौर-तरीके में ज़बर्दस्त मायूसी पसरी हुई दिख रही है। दिल्ली में पिछले एक साल से प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अरविंदर सिंह लवली लगातार अलग-अलग मुद्दों पर प्रदर्शन करते हुए अपनी पार्टी के लिए खोया हुआ जनाधार जुटाने की कोशिश करते तो दिखे, लेकिन जैसे ही चुनाव की घोषणा हुई प्रचार के मोर्चे पर बीजेपी और आम आदमी पार्टी की तुलना में कांग्रेस कहीं नहीं दिख रही। आख़िर वजह क्या है? क्या 2004 का लोक सभा चुनाव लड़ने के बाद दिल्ली की स्थानीय राजनीति से ऊपर उठ चुके अजय माकन का अचानक पूरे परिदृश्य में उतरने के बाद नई शैली को आजमाने का इरादा पार्टी ने बनाया? सवाल और भी हैं। 

पिछले चुनाव में जब कांग्रेस को 8 सीटों पर सिमटना पड़ा था तो उस सत्ता विरोधी लहर में भी 30 हज़ार से ज़्यादा वोटों से जीतने वाले कांग्रेस के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष अरविंदर सिंह लवली को टिकट देने की बजाय उनके हाथों प्रचार का ज़िम्मा सौंपकर क्या कांग्रेस अपनी पूरी मरम्मत करना चाहती है? 8 में से उन 5 सीटों पर पिछली बार कांग्रेस को जीत मिली जहां अल्पसंख्यकों की तादाद ज़्यादा हैं। क्या इस बार अल्पसंख्यकों का भरोसा पार्टी जीत पाएगी?

दिल्ली में इस वक़्त (लेख लिखे जाने तक) जो हालात हैं उसमें आम आदमी पार्टी और बीजेपी के बीच सीधी टक्कर दिख रही है और किसी भी चमत्कार की उम्मीद को दरकिनार करते हुए ये माना जा रहा है कि कांग्रेस तीसरे स्थान से बेहतर प्रदर्शन करने की हालत में नहीं है। फिर भी, चांदनी चौक लोक सभा के दायरे में आने वाली मटियामहल विधान सभा सीट पर पिछला चुनाव जनता दल (यूनाइटेड) के टिकट से जीतने वाले शोएब इक़बाल ने कांग्रेस का दामन थाम लिया है। बिल्कुल चुनावी सीज़न में। जदयू से कांग्रेस में ना सिर्फ़ इक़बाल शामिल हुए बल्कि मुंडका से निर्दलीय जीतने वाले रामबीर शौकीन भी कांग्रेस में आ गए हैं। इन सब समीकरणों का कांग्रेस के लिहाज से क्या मायने हैं?

शीला दीक्षित को घोषणापत्र बनाने में भी जगह नहीं दी गई
प्रचार समिति के अध्यक्ष बनने के बाद कांग्रेस की तरफ़ से अजय माकन इस चुनाव में पार्टी के आधिकारिक चेहरे हैं। शीला दीक्षित को सिर्फ़ प्रचार का ज़िम्मा दिया गया है। घोषणापत्र बनाने में भी दीक्षित को नहीं रखा गया। ए के वालिया को इसकी ज़िम्मेदारी मिली। शीला दीक्षित पर पिछले चुनाव में आक्रामक तेवर अख़्तियार करने वाले अरविंद केजरीवाल को दोबारा ये मौक़ा नहीं देने के उद्देश्य से उन्हें मुख्य भूमिका नहीं दी गई या फिर कांग्रेस यहां नया नेतृत्व खड़ा करना चाहती है?नेतृत्व का सवाल इसलिए अहम है क्योंकि ये सिर्फ़ मौजूदा चुनाव भर का मामला नहीं है बल्कि जिस तरह दिल्ली की राजनीति में आम आदमी पार्टी का आगमन हुआ उसके बाद चुनावी मैदान में बाइनरी मुक़ाबले का दौर भी ख़त्म हो गया, जिसमें कांग्रेस के सामने सिर्फ़ बीजेपी थी। केंद्रीय राजनीति में सबसे बुरी हार देखने वाली कांग्रेस के कई नेताओं ने धीरे-धीरे पार्टी का हाथ छोड़ कर दिया और कुछ छोड़ने के संकेत दे रहे हैं। लेकिन इसी दौर में क्या कांग्रेस के कुछ कद्दावर नेता केंद्रीय सत्ता से दूर होने के बाद स्थानीय ज़मीन पकड़कर अपनी टिकाऊ राजनीति करना चाहते हैं?

अजय माकन को लोक सभा चुनाव में नई दिल्ली सीट पर तीसरे स्थान से संतोष करना पड़ा था। पार्टी में अब भी वो कई मामलों में निर्णायक भूमिका में हैं, लेकिन अगर उनकी अगुवाई में कांग्रेस ज़रा भी अपने पुराने नतीजे में सुधार कर पाई तो नीतिगत मामलों में वो अगली पांत में खड़े हो जाएंगे। कांग्रेस के इतिहास की जानकारी जिन नेताओं के पास है वो जानते हैं कि डूबते-डूबते ये पार्टी कई बार फिर से अमरबेल की तरह पनपी है क्योंकि पुराने भरोसे और कई प्रदेशों में विकल्पहीनता की स्थिति में लोगों ने अंतत: कांग्रेस पर भरोसा जताया। शोएब इक़बाल और रामबीर शौकीन के कांग्रेस में शामिल होने को इसी नज़रिए से देखा जाना चाहिए। शोएब इक़बाल पांच बार सांसद रहे हैं और वो प्रदेश की राजनीति को लंबे समय से जानते हैं। जनता दल, जनता दल (एस) और जदयू के प्रतिनिधि के तौर पर वो लगातार विधान सभा तो पहुंचते रहे, लेकिन दिल्ली के भीतर इस पार्टी के भविष्य को देखते हुए इक़बाल के पास बहुत कुछ हासिल होने की उम्मीद नहीं थी। 

मटियामहल से इस बार कांग्रेस से अगर वो जीतते हैं तो इसका कई मोर्चों पर वो फ़ायदा उठाने की स्थिति में होंगे। अपने अनुभव के दम पर कांग्रेस के भीतर उन्हें बेहतर ज़िम्मेदारी मिल सकती है जो जदयू में मुमकिन नहीं था। दूसरा, मटियामहल इकलौती सीट है जहां बीजेपी को भी मुस्लिम उम्मीदवार उतारना पड़ा। अल्पसंख्यकों के भीतर इस बार वोट का बड़ा हिस्सा आम आदमी पार्टी की तरफ़ मुड़ जाने की बात कई जानकार बता रहे हैं। लिहाजा, कांग्रेस और ‘आप’ के बीच की टक्कर में अगर शोएब ने कांग्रेस खेमे में जाकर अपनी पुरानी जान-पहचान को वोट में तब्दील किया तो कांग्रेस उनके लिए बेहतर प्लेटफॉर्म बन जाएगी।

दिल्ली के चुनाव में कांग्रेस के लिए यही दोहरी स्थिति पनप रही है। पार्टी मुक़ाबले में है भी नहीं और कुछ लोग इस बुरे दौर में कांग्रेस को प्लेटफॉर्म मानकर भविष्य की मज़बूती देख रहे हैं। लेकिन असल सवाल तो ये हैं कि मोटे तौर पर इस चुनाव में कांग्रेस कहां खड़ी है और उसकी क्या रणनीति है? क्या कांग्रेस की राजनीति के तौर-तरीक़ों में पहले के मुक़ाबले बदलाव आया है? अजय माकन जिस दिन नामांकन भरने जा रहे थे तो उन्होंने जनसभा की। जनसभा में भाषणों और उनके बयानों से ज़्यादा जिस चीज़ पर ग़ौर किया जाना चाहिए था वो थी उनके सिर पर हाथ छाप और कांग्रेस लिखी टोपी। ये पारंपरिक ‘कांग्रेसी टोपी’ से अलग थी। ये आम आदमी पार्टी की शैली वाली टोपी थी। यानी कांग्रेस अपने वोट का दायरा जिन वर्गों के बीच देख रही है उसमें इसे असल टक्कर ‘आप’ से ही मिलती दिख रही है। बीजेपी को जिन तबकों का वोट मिलता रहा है उसको हथियाने में कांग्रेस फ़िलहाल तो असफ़ल मालूम पड़ती है क्योंकि नरेन्द्र मोदी की छवि के पीछे मध्य वर्ग का बड़ा तबका जिस तरह अभी भी लहालोट है वैसे में कांग्रेस वापस अवैध कॉलोनियों, बिजली, पानी और ठेका-मज़दूरी के प्रश्न पर टिक गई है।

चुनाव लड़ने के बदले प्रचार का ज़िम्मा
पिछली बार की तुलना में कांग्रेस ने तरीके तो बदले हैं लेकिन पूरी भाव-भंगिमा ऐसी है जैसे हारने का नतीजा पार्टी को पहले से पता हो। ना प्रचार में चुस्ती, ना पुरानी आक्रामकता और ना ही नेताओं में आत्मविश्वास। राहुल गांधी और सोनिया गांधी के साथ-साथ 100 से ज़्यादा प्रचारकों की सूची तो माकन ने बना ली, लेकिन जनवरी के लगभग आख़िर तक गांधियों की कोई चुनावी सभा और रैली नहीं हो पाई। पिछली बार जिस तरह ख़ाली कुर्सियों के सामने राहुल गांधी को भाषण देना पड़ा था उस लिहाज से पार्टी शायद भविष्य के लिए उन्हें बचा लेना चाहती है। अरविंदर सिंह लवली जैसे नेताओं को चुनाव ना लड़ाकर प्रचार के मैदान में उतारना शायद इसी रणनीति का हिस्सा है। 

हालांकि इस बार लवली की तरह बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष सतीश उपाध्याय भी चुनाव नहीं लड़ रहे और दोनों पार्टियों का दावा है कि उनके अध्यक्ष सभी 70 सीटों पर निगरानी रख रहे हैं। लेकिन, इसके बावजूद मौजूदगी दर्ज कराने के लिए दोनों के समर्थकों ने टिकट ना मिलने के चलते ‘नाराजगी’जताते हुए पार्टी दफ़्तरों पर विरोध प्रदर्शन किया। लवली का एक समर्थक तो बिजली के टावर पर चढ़कर कूदने की धमकी भी दे रहा था। क्या टावर पर चढ़ा वो आदमी दिल्ली के भीतर कांग्रेस की पतली होती हालत का रूपक है?

ज़मीनी प्रचार में भले ही कांग्रेस पिछड़ती रही, लेकिन घोषणापत्र सबसे पहले जारी कर एक बढ़त बनाने की कोशिश की गई। दिलचस्प ये है कि कांग्रेस के घोषणापत्र का आधा हिस्सा आम आदमी पार्टी और आधा हिस्सा बीजेपी जैसा लग रहा था। मिसाल के लिए 200 यूनिट तक बिजली के दाम 1.50 रुपए करने से लेकर मुफ़्त सीवर देने जैसे कांग्रेस से वादों के बाद आम आदमी पार्टी के संजय सिंह ने बाक़ायदा प्रेस कांफ्रेस करके ये कह दिया कि ये मुद्दा उनकी पार्टी है जिसको कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में जगह दी है, लेकिन जनता आम आदमी पार्टी में ही भरोसा जताएगी। मेट्रो से लेकर अस्पताल जैसे जो मुद्दे कांग्रेस के घोषणापत्र में हैं वो मध्य या उच्च मध्य वर्ग को लुभाने वाले हैं। तो क्या कांग्रेस बीजेपी और ‘आप’ के बीच संतुलन बनाते हुए सत्ता के लिए बीच का रास्ता पकड़ना चाहती है? 

क्या इस देश की राजनीति में सबसे लंबी सक्रियता के बावजूद कांग्रेस अपनी मज़बूत लकीर खींच पाने में अक्षम हो चली है? दिल्ली के भीतर बीजेपी और आप को लेकर कांग्रेस तीखी भी रही। दोनों पर हवाई वायदे करने के आरोप कांग्रेस ने लगातार लगाए और ये भी कहा कि कांग्रेस ही इक़लौती पार्टी है जो ऐसे वायदे कर रही है जिसे डेलिवर करना मुमकिन है। हालांकि कांग्रेस के पास बयानों में ये आक्रामकता जताने के अलावा और कोई विकल्प भी नहीं है क्योंकि इस बार खोने के लिए पार्टी के पास ज़्यादा है नहीं। अल्पसंख्यकों के वोट में आम आदमी पार्टी ने सेंधमारी कर ली और पार्टी का एक दलित चेहरा कृष्णा तीरथ अचानक खेमा बदल कर पटेल नगर से बीजेपी की उम्मीदवार बन गई। ये वो तबके हैं जो बीजेपी की बजाय कांग्रेस में भरोसा जताते आए हैं, लेकिन कांग्रेस ये जानती है कि अगर दिल्ली में इस बार पिछले परिणाम को भी बचाने में असफ़ल रही तो अगले कई वर्षों तक दिल्ली में भी वही हालात बन जाएंगे जैसा बिहार या उत्तर प्रदेश में बने।

केजरीवाल फेनोमिना को जिस तरह पिछले चुनाव में कांग्रेस ने नज़रअंदाज़ करने की कोशिश की उसके नुकसान का आकलन पता नहीं पार्टी ने किया या नहीं, लेकिन इस बार चुनाव आयोग के सामने केजरीवाल को लेकर शिकायतों में कांग्रेस ने सबसे ज़्यादा तत्परता दिखाई। यानी कांग्रेस अरविंद केजरीवाल को लेकर ज़्यादा चिंतित है और उसकी चिंता का असल कारण यही है कि दिल्ली के परिदृश्य में यही वो पार्टी है जिसने कांग्रेस के वोट का मोटा हिस्सा ‘चुरा’ लिया। बीजेपी पहले भी थी और अब भी है। तो लड़ाई में पैनापन बीजेपी के ख़िलाफ़ लाए या आम आदमी पार्टी के ख़िलाफ़, ये कांग्रेस के लिए चुनावी रणनीति का बड़ा सवाल है। 

लेकिन, आलम ये है कि ऐसी रणनीतियों पर विचार करने में ही कांग्रेस के हाथों प्रचार का ज़्यादातर वक़्त फ़िसल गया और मैदान में मौजूदगी से ज़्यादा रणनीति बनाने में ही पार्टी लगी रह गई। चेहरे के चुनाव में तब्दील हुआ दिल्ली का ये चुनाव हाल के वर्षों का पहला चुनाव है जिसमें सभी तीनों पार्टियों ने अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव की तर्ज पर अपने-अपने मुख्यमंत्रियों के दावेदारों को सामने कर दिया। लोकसभा चुनाव में सिर्फ़ बीजेपी के पास मोदी थे, लेकिन यहां आम आदमी पार्टी के पास केजरीवाल, बीजेपी के पास पहले मोदी फिर बेदी और कांग्रेस के पास अजय माकन हैं। 

लेकिन, पिछले दो साल में दिल्ली की राजनीति जिस धुरी पर घूमती रही है वो अन्ना हज़ारे के बाद का शुरू हुआ भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन और उससे उपजे अरविंद केजरीवाल हैं। लिहाजा चेहरे की दावेदारी ‘आप’ के पास भी है और उसी आंदोलन की जड़ से निकली किरण बेदी के रूप में बीजेपी के पास भी, लेकिन अजय माकन की लंबी राजनीतिक यात्रा के बावजूद फ़ौरी मसलों पर दिल्ली की राजनीति के साथ जनता उनको कितना कनेक्ट करेगी ये फ़रवरी महीने में ही सबको मालूम पड़ सकेगा।

24 January 2015

जेटली जी विज्ञापन को छुट्टा रखेंगे

-दिलीप ख़ान

अभी टीवी मीडिया में विज्ञापन की सीमा को लेकर भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण के प्रस्ताव को दो साल भी नहीं हुए थे कि नए सूचना और प्रसारण मंत्री अरुण जेटली ने इसको लागू करने पर अनचाहापन जाहिर किया। जेटली के मुताबिक़ ऐसा करना अभिव्यक्ति की आज़ादी के साथ धोखा होगा। पहला जे एस वर्मा स्मृति संबोधन देते हुए उन्होंने कहा कि टीवी न्यूज़ मीडिया के लिए प्रति घंटे अधिकतम 12 मिनट विज्ञापन दिखाने की बाध्यता अंतत: संविधान के अनुच्छेद 19(1) के साथ मेल नहीं खाती। ट्राई ने 2013 के मार्च महीने में सारे टीवी न्यूज़ चैनलों को एक एक नोटिस दिया था कि अक्टूबर 2013 से प्रति घंटे 12 मिनट से ज़्यादा विज्ञापन नहीं दिखाए जा सकते। उस वक़्त ब्रॉडकास्टरों ने अपने राजस्व में कमतरी का तर्क देते हुए कहा था कि इतनी कम समयावधि में अगर इसे लागू किया गया तो सारे न्यूज़ चैनल घाटे में चले जाएंगे। 
मूल रूप से राष्ट्रीय सहारा में छपा लेख

मंत्रालय ने इसके लिए दिसंबर 2014 तक के लिए समय सीमा बढ़ाई जब तक डिज़िटाइजेशन की प्रक्रिया पूरा करने का मंत्रालय ने लक्ष्य रखा था। डिज़िटाइजेशन के साथ इसको लागू करने का तर्क ये था कि एक बार अगर ये प्रक्रिया पूरी होती है तो राजस्व का जो हिस्सा चैनलों को विज्ञापन से हासिल होता है उसका बड़ा टुकड़ा सब्सक्रिप्शन पर शिफ्ट हो जाएगा। यानी सेट टॉप बॉक्स और सब्सक्रिप्शन के ज़रिए चैनलों को होने वाली मात्र 10 फ़ीसदी की आमदनी बढ़कर 30-40 फ़ीसदी के स्तर तक पहुंच जाएगी। लेकिन ना ये पूरा हुआ और ना ही विज्ञापन की समय सीमा निर्धारित हो पाई। सब्सक्रिप्शन के चलते ग्राहकों पर तो बोझ बढ़ गया लेकिन ना ही उनके सामने टीवी स्क्रीन पर विज्ञापन कम हुए ना ही पुरानी दर में न्यूज़ देखा मुमकिन हो पाया।

पूरे मीडिया उद्योग में ये अफ़वाहें तैरती रही कि ट्राई का ये नियम 'नया' और प्रतिकामी है। हक़ीकत ये है कि केबल टेलीविज़न नेटवर्क्स रूल्स 1994 के तहत ही उसने चैनलों को ये हिदायत दी थी। इस सरकारी क़ानून को मंत्रालय ने जब मंजूर किया है तो फिर मंत्रालय इसको लागू कराने के प्रति गंभीरता क्यों नहीं दिखा रहा? अगर नियम में कोई पेंच है तो उसमें संशोधन होना चाहिए या पूरे क़ानून को निरस्त कर देना चाहिए फिर नियम लागू होना चाहिए। लेकिन हो ये रहा है कि क़ानून भी है क़ानून का पालन भी नहीं हो रहा। उसी अधिनियम में एडवर्टाइज़मेंट कोड ऑफ़ टीवी नेटवर्क (विनियमन) रूल 1994 के तहत ये भी चर्चा की गई है कि टीवी में दिखाए जाने वाले विज्ञापन इस तरह के होंगे ताकि वो उसके मुख्य विषय सामग्री से अलग दिखे। क्या टीवी में इस नियम को फॉलो किया जाता रहा है? 

अगर नहीं, तो इस पर मंत्रालय ने क्या कार्रवाई की? निर्मल बाबा का प्रायोजित शो (विज्ञापन) जब चैनलों के लिए झमाझम टीआरपी का ज़रिया बना तो एक के बाद एक चैनलों पर उसका प्रसारण शुरू हुआ। उसमें स्क्रीन पर बेहद छोटे अक्षर में चालाकी बरतते हुए एडीवीटी (Advt.) लिखा होता था जिसे किसी दर्शक के लिए देख पाना मुश्किल था। तमाम आलोचनाओं के बाद इस शो को कुछ चैनलों ने बंद कर दिया और जो चलाते रहे उन्होंने एडीवीटी का फोंट बढ़ा दिया।

विज्ञापन के मोर्चे पर नियम-क़ायदे को लागू करने का मामला अभिव्यक्ति की आज़ादी से टकराव का मामला नहीं है। किसी भी टीवी न्यूज़ चैनल को जब मंत्रालय लायसेंस देता है तो वो न्यूज़ नाम की सामग्री के प्रसारण के लिए होता है। विज्ञापन उसकी आमदनी का ज़रिया है ताकि ख़बर को चलाए रखने लायक राजस्व चैनल बना पाए। इस तरह ये पूरा मामला मीडिया के पत्रकारिता वाले पक्ष का नहीं बल्कि उद्योग वाले पक्ष का है। उद्योग के लिए नियम लागू करना कहीं से भी अभिव्यक्ति की आज़ादी पर ना तो चोट है ना ही किसी भी तरह का अंकुश। दूसरी बात, क्या विज्ञापन का जो मौजूदा स्लैब है जिसमें चैनल मनमाना तरीके से 20-22 मिनट तक विज्ञापन दिखाते रहते हैं, इसमें छोटे-मझोले चैनलों के लिए प्रतियोगिता में टिके रहने का कोई स्कोप है? 

अगर विज्ञापन पर बने नियम को हम अभिव्यक्ति की आज़ादी से जोड़ भी दें तो इसमें लोकतांत्रिक रवैया कहां है? बड़े चैनलों और बड़े समूहों के पास ज़्यादा विज्ञापन झटकने के सौ तरीके हैं और छोटे चैनल इस पूरे परिदृश्य में टिक नहीं पाते। भारतीय प्रतियोगिता आयोग ने भी चैनलों के रवैये पर दो-तीन बार गंभीर टिप्पणी की है। विज्ञापन लाने का जो प्रमुख जरिया चैनलों के पास है वो है टीआरपी। लिहाजा विज्ञापन को लुभाने के लिए चैनल टीआरपी को लुभाते हैं और टीआरपी को लुभाने के लिए कई दफ़ा विषय सामग्री में गंभीरता की बजाए सनसनी और हल्केपन की चाशनी लपेट देते हैं। यानी ज़्यादा से ज़्यादा विज्ञापन जुटाने का संबंध सीधे तौर पर कंटेंट से भी जुड़ा है। चैनलों की ज़िम्मेदारी सुनिश्चित करने के लिए इस तरह का कोई आयोग नहीं है जो उन्हें दिशा-निर्देश दे सके। चैनलों के स्व-नियमन की कुछ संस्थाएं पिछले कुछ वर्षों में इतने मौक़ों पर असफ़ल साबित होते रहे हैं कि ऐसे किसी भी संस्था का वजूद सतह पर मालूम ही नहीं पड़ता।

प्रिंट मीडिया के लिए समाचार और विज्ञापन का अनुपात बहुत पहले से निश्चित है। टीवी इससे बाहर क्यों रहे? लेकिन टीवी मीडिया ने इतनी आक्रामकता से अपनी मौजूदगी दर्ज की है कि इसको लेकर नियम-क़ायदे बनाने के लिए सरकार के पास कोई समय मिलता ही नहीं दिख रहा। 2013 में ही 'पेड न्यूज़' पर संसद की स्थाई समिति की लंबी चौड़ी-रिपोर्ट में भी विज्ञापन को लेकर कई चिंताएं जताई गईं। पेड न्यूज़ ख़ुद में विज्ञापन का ही रूप है। क्या नई सरकार उस रिपोर्ट को लागू कराने के पक्ष में है? अगर विज्ञापन को लेकर खुली छूट जारी रही और एडवर्टाइज़मेंट स्टैंडर्ड काउंसिल ऑफ़ इंडिया के हाथ में मौजूद शक्ति असल में विज्ञापनदाताओं को ताक़तवर बनाने को लेकर झुकी रही तो टीवी की ख़बरों की गुणवत्ता पर सवाल उठते रहेंगे। 

09 January 2015

शार्ली एब्दो प्रकरण विवाद

-दिलीप ख़ान
[फ़ेसबुक पर टुकड़ों में  बात करने के बदले एक साथ ही यहां अपना पक्ष लिख दे रहा हूं।]

शार्ली एब्दो पत्रिका के दफ़्तर पर हुए ख़ूनी हमले के बाद अभिव्यक्ति की आज़ादी का पुराना विमर्श फिर से सामने आ गया है। पूरे मामले पर सोशल मीडिया पर जिस तरह की बहस चल रही है उसको मोटे तौर पर तीन-चार खांचों में बांटा जा सकता है। पहला तबका ऐसे लोगों का है जो ऐसे किसी भी हमले के ख़िलाफ़ हैं और पत्रिका में छपे कार्टूनों से जिन्हें कोई परेशानी नहीं है। दूसरा तबका ऐसे लोगों का है जो हमले के ख़िलाफ़ हैं, लेकिन कार्टून्स के भी ख़िलाफ़ हैं। तीसरा तबका वो है जो कार्टून्स के कारण हमले तक के पक्ष में दबी ज़ुबान हामी भर रहे हैं।

पहले खांचे में वो लोग भी शामिल हैं जो हाल-हाल तक ‘पीके’ पर प्रतिबंध लगाने की बात करते थे। अचानक धार्मिक दायरा बदलने से वो शार्ली एब्दो की अभिव्यक्ति की आज़ादी के समर्थक हो गए। ऐसे लोग, एक ही मसले पर अपने धर्म पर अलग और दूसरे धर्म पर अलग स्टैंड लेने वाले ढुलमुल प्रजाति के होते हैं। 

दूसरे और तीसरे खांचे के लोगों में से तीन-चार तर्क ज़ोरों से दिए जा रहे हैं। पहला, पैग़ंबर की कोई आकृति नहीं है तो फिर उनपर कार्टून बनाना धार्मिक भावना को आहत करने वाला कदम है। दूसरा, शार्ली एब्दो पत्रिका लगातार धर्म पर चोट करने के चलते विवादों से घिरी रही है। तीसरा, वो ना सिर्फ़ इस्लाम बल्कि कैथोलिक और यहूदियों को भी समय-समय पर नाराज़ करती रही है। कुल जमा मतलब ये कि उस पत्रिका के कंटेंट ने धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने का काम लगातार किया है। तर्कों को खींचकर उस समूची पत्रिका को ही अश्लील, हल्की और फसाद पैदा करने का कारखाना बताया जा रहा है। 

विवादित कार्टून्स

2006 में इस साप्ताहिक पत्रिका ने पैगंबर मोहम्मद पर एक कार्टून छापा और इसके चलते बड़ा विवाद हुआ। इसके बाद सीरीज़ में इस्लाम पर इस पत्रिका ने अंक निकाले। सर्वाधिक विवादित कार्टूनों में से एक में पैगंबर मोहम्मद कह रहे हैं कि “कट्टरपंथियों की हरक़त से पैगंबर खुश हुआ है”। इस व्यंग्य में अगर इस्लामिक चरमपंथियों के नकार के बजाए पैगंबर का कैरीकेचर ध्यान खींचता है तो कार्टून नाम की पुरानी विधा के अब-तक के सफ़र पर समाज की कूपमंडूकता का झटके में भारी पड़ना तय हो जाता है। अगर पैगंबर के नाम पर ही मार-काट मचाने वाले कुछ चरमपंथी अपनी राजनीति को समाज में पैबस्त करने पर जुटे हुए हैं तो एक कैरीकेचर वाली पत्रिका के सामने कोई विकल्प नहीं बचता कि वो यह बात सीधे पैगंबर के मुंह से कहलवाए कि उनके नाम के आधार पर ये तमाम हमले बंद होने चाहिए। 

इस अंक का फ्रांस सहित दुनिया के कई मुल्क़ों में विरोध हुआ। तत्कालीन फ्रांसीसी राष्ट्रपति यॉक शिरॉक ने इसे भड़काऊ बताया था और अंतत: पत्रिका को लंबी क़ानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी। फ्रांस में अदालती लड़ाई जीतने के बाद पत्रिका में साप्ताहिक प्रकाशन जारी रहा, जिनमें अलग-अलग सामाजिक, राजनीतिक मसले (सिर्फ़ धार्मिक नहीं) शामिल थे। बाद के दिनों में निकोलस सरकोज़ी और फ्रांस्वा ओलांद ने “फ्रांस की पुरानी व्यंग्य परंपरा” का हवाला देते हुए पत्रिका का बचाव किया। 2011 में एक बार फिर पत्रिका को लेकर विवाद हुआ। पत्रिका ने एक अंक में पैगंबर मोहम्मद को अतिथि संपादक बना दिया और उस अंक में पत्रिका के मॉस्टहेड के नीचे एक उपशीर्षक दिया और अंक का नाम रखा ‘शरिया एब्दो’। ये शरिया क़ानून पर चोट करने वाला अंक था। 
क्या शार्ली रेसिस्ट पत्रिका है?

सवाल ये है कि क्या शार्ली एब्दो सिर्फ़ इस्लाम पर कार्टून्स छापकर उस एकमात्र धर्म को निशाने पर अब तक रखती आई है या फिर क्या ये पत्रिका सिर्फ़ धार्मिक मामलों पर ही कार्टून्स और व्यंग्य छापती है?  मौजूदा परिप्रेक्ष्य में ये दोनों सवाल काफी अहम हैं। शार्ली एब्दो में व्यंग्य, कार्टून और कैरीकेचर ही प्रमुख सामग्री है और हफ़्तेवार प्रकाशन में विवाद का मामला सिर्फ़ धर्म को लेकर ही बार-बार आया। इसलिए पत्रिका के बारे में पढ़ने पर ऐसा लगता है गोया पत्रिका हर अंक में धार्मिक मामलों पर विवादित कार्टून प्रकाशित करती रही हो। जबकि ऐसा है नहीं। जिस दूसरे कार्टून पर ज़्यादा विवाद है वो है- पोप का कंडोम पहनना। ये तब की ख़बर है जब ख़बर आई थी कि पोप चर्च के भीतर सेक्स करते हैं। हालांकि अब तो ब्रूसेल्स मे एक पोप पर बाल तस्करी, बलात्कार सहित कई मामले अदालत में साबित हुए। इसलिए पोप पर चोट करने पर हैरानी नहीं होनी चाहिए, लेकिन हैरानी सिर्फ़ इसलिए होती है क्योंकि पोप को आलोचना से परे कर दिया गया है। 

ठीक पराशक्ति अल्लाह या ईश्वर की तरह। अगर पोप के सेक्स करने के तथ्य को कार्टून का रूप दे दिया गया तो धार्मिक असहिष्णुता का मामला कैसे हो गया? तथ्य, तथ्य है। चर्च के भीतर सेक्स पर पाबंदियों पर व्यंग्य करते हुए किसी कार्टून में अगर नन को हस्तमैथुन करते दिखाया गया है तो ये व्यक्तिगत और निजी मामला नहीं है। किसी ख़ास नन के बारे में नहीं है, बल्कि उस ट्रेंड पर बात करता हुआ ये कार्टून है जिसमें नन की सैक्सुअल ज़रूरत को पूरा करने के तरीके को रेखांकित किया गया है। क्या सेक्स पर बात करना या सेक्स पर कार्टून छापना अश्लील है? या, धार्मिक लोगों के सेक्स पर बात करना अश्लील और नाक़ाबिल-ए-बर्दाश्त है? या, धार्मिक मान्यताओं को चुनौती देते हुए राजनीतिक यथार्थ को बयां करने के लिए पैगंबर मोहम्मद का कार्टून बना देना दुनिया के लिए ख़तरनाक है?  अभिव्यक्ति के टूल हर दफ़े अगर समाज के हर तबके से पूछकर तलाशे जाए तो शायद कार्टून और कैरीकेचर में दर्ज़ होने वाले कैरेक्टरों की संख्या मुट्ठी भर रह जाएगी। 

राजनीतिक मामलों को लेकर प्रतिबंध

1970 के दशक में प्राकृतिक आपदा को लेकर निकाले गए एक अंक के बाद इस पत्रिका को प्रतिबंधित कर दिया गया था। तब तक ये दूसरे नाम से निकलता था। प्रतिबंध के दायरे से बाहर निकलने के लिए इसका नाम शार्ली एब्दो रखा गया। हालांकि इस पत्रिका में कई बार ये आरोप भी लगे हैं कि इसके कुछ कार्टून्स नस्लवादी रहे हैं। लेकिन, नस्लीयता का मामला जहां भी रहा शार्ली एब्दो के भीतर भी विरोध हुए। कोई भी पत्रिका ग़लती करती है, शार्ली ने भी की। कुछ लोग निकलकर नई पत्रिका भी निकाले। लेकिन नस्लीयता के जितने इल्ज़ाम है, उनमें से ज़्यादातर धार्मिक संगठनों ने ही लगाए। लिस्ट उठाकर चेक कर लीजिए।  मैं फ्रेंच नहीं जानता, इसलिए ये दावा नहीं कर सकता कि मैंने पत्रिका पढ़ी है। 

लेकिन, इस पत्रिका पर हमले के बाद इंटरनेट सहित समाचार एजेंसियों पर जितनी सामग्रियां थीं, उनमें से ज़्यादातर को पढ़ा क्योंकि अगले दिन आधे घंटे को प्रोग्राम बनाना था इस पर। कुल जमा इस नतीजे पर हूं कि असहमत हैं तो असहमति जताइए लेकिन जो सहमत हैं उनपर क्यों पिल पड़ रहे हैं? आपकी असहमति किसी कार्टून पर ठीक वैसे ही हो सकती है जिस तरह आपकी किसी बात पर किसी और की असहमति। आपकी असहमति के चलते कोई बात करना बंद नहीं कर देगा। आप आहत हैं तो आहत होना मुबारक़। कार्टून और कैरीकेचर के नाम पर ज़रा-ज़रा सी बात पर आहत होने के चलन को जिस तरह सिद्धांत के तौर पर पेश करने की कोशिश की जा रही है वो अंतत: बहुत संकुचित दिशा की तरफ़ लेकर हमें बढ़ेगा।