15 October 2014

महिषासुर दिवस के मायने

दिलीप ख़ान
(जब जेएनयू में पहली या दूसरी बार महिषासुर दिवस मनाया गया था तो उस वक़्त ये टिप्पणी लिखी थी। मेल से निकालकर यहां पेस्ट कर रहा हूं। इसे सवर्णों से लड़ने के तौर-तरीके की भीतरी आलोचना के तौर पर लिखा गया है।) 

दुनिया और भारत के प्राचीन इतिहास को पढ़ते हुए कोई भी इतिहास का विद्यार्थी कभी किसी दुर्गा नाम के चरित्र से नहीं टकराया। इतिहास के मुताबिक़ ऐसा कोई चरित्र मानव सभ्यता के विकासक्रम में था ही नहीं। अगर होता तो यह अरब या यूरोप-अमेरिका के देशों में रहने वाले वहां के निवासियों के लिए परिचित चरित्र होता। यानी एक ख़ास भूगोल में रहने वाले ख़ास धर्म के भीतर ख़ास तबके ने अपने धर्म की गाथा फैलाने के उद्देश्य से इस चरित्र को गढ़ा। अनेक चरित्र गढ़े गए, जिनमें दुर्गा भी एक हैं। दुर्गा की कहानी अकेले पूरी नहीं हो सकती, तो महिषासुर के अलावा और भी चरित्र बने। अब इस चरित्र को लेकर मोटे तौर पर तीन वर्ग बंटे हैं। पहला, जो दुर्गा की मौजूदा कहानी को मान्यता देता है और उसके साथ है। दूसरा, जो दुर्गा की कहानियों को नए सिरे से डीकोड करके उसमें खलनायक के तौर पर प्रस्तुत किए गए पात्रों को मौजूदा दमित अस्मिता के साथ खड़ा करता है और दुर्गा को इस आधार पर चुनौती देता है। तीसरा, जो दुर्गा और महिषासुर को काल्पनिक चरित्र मानता है और इन दोनों को खारिज करता है। 

मिथक किसी भी समाज का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। धार्मिक दायरे के भीतर चरित्र जैसे ही घुसता है तो उसके होने-ना होने या फिर कितना होने और कैसा होने के सवाल का आम तौर पर लोप हो जाता है। क्योंकि धर्म के मसले पर सवाल से ज़्यादा महत्वपूर्ण होता है कि आप उसमें वर्णित प्रसंगों को कितना फॉलो करते हैं। जितना यक़ीन, उतने धार्मिक। उतने मिथक के करीब और उतने मिथक बनाने वाले की राजनीति के भी। मिथकों में मौजूद चरित्रों की कहानियों या फिर उनकी प्रस्तुति पर जैसे ही शक शुरू होता है मिथकों का क़िला भी ढहने लगता है। नई व्याख्याओं के ज़रिए हो सकता है कि मिथक के मुख्य (हीरो या हीरोइननुमा) चरित्र की सादगी, राजनीति, सच्चाई और ईमानदारी पर सवाल उठे और मिथक के भीतर उनकी मौजूदगी का लुभावना पक्ष सवालों के घेरे में आ जाए। व्याख्याओं के ज़रिए ऐसा होता है, चाहे वो कहानियों की हो, चाहे फ़िल्मों की। इसलिए व्याख्या अच्छी चीज़ है। समाज जब गतिशील होता है तो व्याख्याओं की संभावना लगातार बनी रहती है। मिथक में खलनायक के तौर पर पेश किए गए चरित्र को बिल्कुल नए सिरे से नायक भी बनाया जा सकता है और नायक/नायिका को खलनायक वाले खांचे में पहुंचाया जा सकता है। 

ऐसा करने का सबको बराबर हक़ है। ठीक उसी तरह जैसे प्रेमचंद, निराला या फिर जयशंकर प्रसाद के पात्रों की व्याख्या होती है और नए अर्थ खुलते हैं। व्याख्या करने का हक़ नहीं छीना जा सकता। ये बुनियादी लोकतांत्रिक अधिकार है। अगर किसी को दुर्गा स्थापना करने का हक़ है तो किसी को महिषासुर स्थापना का भी। एक कर रहा है तो दूसरा भी करे। मौजूदा वर्चस्वशाली धार्मिक आख्यान को चुनौती देने के लिए व्याख्याओं के ज़रिए जो प्रति-नायक खड़ा करने की बात है, एक अर्थ में है तो वो ठीक, लेकिन जैसे ही व्याख्याओं से आगे जाकर पूरा मामला उसी तरह श्रद्धा में टिक जाता है, तब मिथकीय घटना दोनों तरफ़ से सच्चाई के तौर पर स्थापित हो जाती है। यानी पूरा मामला ऐसा हो जाता है कि घटना तो घटी थी, मसला सिर्फ़ व्याख्या का है। यानी एक दुर्गा थी, एक महिषासुर थे। अपने समूचे अस्तित्व में वो इतिहास के किसी कालखंड में किसी जगह पर जन्में थे। पता नहीं किस काल में, लेकिन जन्में थे। हड़प्पा के बाद या फिर मौर्य काल में या फिर हद से हद दिल्ली सल्तनत के दौरान।

जब भक्ति का जवाब भक्ति से दिया जाने लगे तो बदले की कार्रवाई जैसा कुछ तो हो सकता है लेकिन एक वैज्ञानिक तर्कशील समाज की रचना की दिशा में बढाया गया कदम नहीं हो सकता। फ़र्ज कीजिए कि कल को 60 करोड़ लोग दुर्गी के बदले महिषासुर को पूजने लगे, क्या फ़र्क पड़ जाएगा? क्या पूजने से राजनीतिक मानस बदल जाएगा? इस देश में पूजा, भक्ति और राजनीति के बीच के बहुस्तरीय संबंध को देखने के बाद इस स्थापना को मान पाना बहुत मुश्किल है। एक वैज्ञानिक समाज बनाने के लिए बहुत ज़रूरी है कि श्रद्धा के ऐसे मामलों पर प्रमाण के लिए दबाव बनाया जाए। मसलन जैसे ही कोई बोले कि दुर्गा थी तो उनसे पूछा जाना चाहिए कि दुर्गा का जन्म किस ईस्वी में हुआ। ठीक इसी तरह महिषासुर को अगर सच्चाई के रूप में पेश किया जा रहा है तो उनके जन्म और मृत्यु का साल बताया जाना चाहिए। 

दलित-ओबीसी के वास्तविक राजनीतिक संघर्ष को प्रतीकों के ज़रिए श्रद्धा के सवाल पर टांगना चिंताजनक है। ज़रूरी ये है कि मिथक की व्याख्या तो हो, लेकिन व्याख्या के दौरान ये पूरी तरह स्पष्ट हो जाए कि मिथक काल्पनिक चीज़ है। एक डिसक्लेमर हो- इसके सभी पात्र काल्पनिक हैं।’ 

हिंदी की मुश्किलें कहां हैं

-दिलीप ख़ान

हिंदी दिवस और पखवाड़ा बीत चुका है। लिहाजा, हिंदी पर ‘बातचीत और चिंतन’ की इस सरकारी सक्रियता के बाद के वक़्त में इस पर बात करनी ज़रूरी लग रही है क्योंकि अब अगले सितंबर में ही इस भाषा की सुध लेने की कोशिश होगी। और, इस कोशिश के दरम्यान लाखों-करोड़ों रुपए ख़र्च कर चर्चा और जागरुकता अभियान जैसी कवायद के संकल्प के साथ इसे फिर अगले सितंबर में दोहराने को छोड़ दिया जाएगा। मैं इस बहस में नहीं पड़ रहा हूं कि हिंदी दिवस मनाए कि नहीं मनाए, कि दिवस अमूमन कमज़ोर चीज़ों का मनाया जाता है। मैत्रेयी पुष्पा ने 14 सितंबर को एक संगोष्ठी में इसी पसोपेश के साथ अपनी बातों की शुरुआत की थी। इशारा ये था कि सेठों, पुरुषों और अंग्रेज़ी का दिवस नहीं होता बल्कि इसकी बायनरी में खड़ी चीज़ों (मज़दूरों, स्त्रियों और हिंदी) का होता है। 

हिंदी की तमाम उत्सवधर्मिता और रुदाली के तमाम आख्यानों से निकलकर ठोस ज़मीनी हालात पर बहस करने की ज़रूरत अब भी शेष है। चंद सवाल ऐसे हैं, जिन पर दशकों से चर्चा हो रही हैं और ऐसा लग रहा है कि दशकों ये चर्चा के केंद्र में रहेंगे। इनमें हिंदी का भविष्य क्या है, हिंदी ज्ञान की भाषा क्यों नहीं बन पा रही, हिंदी को दोयम दर्ज़े का बरताव हासिल है, हिंदी बाज़ार और करियर की भाषा बन पा रही है या नहीं आदि प्रमुख हैं। लेकिन इनसे आगे का सवाल ये है कि हिंदी की बेहतरी के लिए क्या किया जाए और हिंदी के नाम पर चल रहे आंदोलनों, प्रदर्शनों और संवेदनात्मक धरातल पर इससे उपजीं खीझ-खिसियाहट की राजनीतिक दिशा क्या हो?
हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की मांग या फिर कई दफ़ा राजभाषा और राष्ट्रभाषा में फर्क नहीं कर पाने की स्थिति में इसे सचमुच राष्ट्रभाषा के तौर पर रेलवे प्लेटफॉर्म सहित कई जगहों पर नीली-लाल स्याही से लिखने की रूमानियत से ना तो हिंदी की बेहतरी मुमकिन है और ना ही ये मज़बूत बनने वाली है। 

हिंदी क्यों राष्ट्रभाषा हो? क्या इसलिए कि ये देश में सबसे ज़्यादा लोगों द्वारा बोली-बरती जाती है? जब इतने लोग बोलते-बरतते हैं तो भाषा की उन्नति का आत्मविश्वास राष्ट्रभाषा जैसे जुमले में क्यों तलाशा जा रहा है? संख्या को आधार बनाए तो फिर समस्या का समाधान ही हो गया। फिर क्यों कम लोगों द्वारा बोले जाने वाली अंग्रेज़ी को आक्रामक भाषा के तौर पर हिंदी पट्टी और हिंदी को लेकर चिंतित लोग देख रहे हैं? जाहिर है कि अंग्रेज़ी को जिस तरह का सरकारी प्रश्रय मिला है और जिस तरह व्यवस्था में अंग्रेज़ी जानने वालों को सिर्फ़ इस आधार पर लाभ मिल रहा है कि वो अंग्रेज़ी में ख़ुद को संप्रेषित कर सकते हैं, वो चिंता का मूल मुद्दा है। यानी, भाषा के आधार पर किसी भी तरह के विभेद को ख़त्म करना हिंदी के भविष्य, चुनौतियों, बेहतरी आदि तमाम प्रश्नों के केंद्र में है।
मूल रूप से जनसत्ता में प्रकाशित

इसलिए इस विभेद को ख़त्म करके ‘राष्ट्रभाषा’ हिंदी का प्रभुत्व स्थापित करना हिंदी वालों के लिए लाभदायक, खुशफ़हम लेकिन राजनीतिक तौर पर प्रतिगामी कदम होगा। जब हिंदी के लोग ये अपेक्षा करते हैं कि तमिल, तेलुगू या मणिपुरी जानने वाले लोगों को हिंदी का ज्ञान होना चाहिए तो ये सवाल पलटकर भी पूछा जा सकता है कि कितने हिंदीभाषी अपनी सहूलियत को त्यागकर दूसरी भारतीय भाषा सीखने की कोशिश करते हैं? हिंदी को लेकर मोह अगर सिर्फ़ इसलिए है कि आप अंग्रेज़ी नहीं जानते और अंग्रेज़ी से मात खा रहे हैं तो इस मोह में भाषाई उन्नति की ईमानदार कोशिश कम और हिंदी में ही सीमित अपने ज्ञान को स्वीकार करवाने की मजबूरी ज़्यादा है।
हिंदी आंदोलन एक ख़ास भौगोलिक हितों की रक्षा के अंतर्निहित भाव का अगर आंदोलन बनता है तो निश्चित तौर पर आगे चलकर ये दूसरी अंग्रेज़ी बनकर रह जाएगी। लेकिन, हालात अभी इसके ठीक उलट हैं। अभी हिंदी और तमाम भारतीय भाषाओं के लोग ज्ञान की धरातल पर भाषा की दीवार को तोड़ने की कोशिश में हैं ताकि अंग्रेज़ी को सिर्फ़ अंग्रेज़ी होने का बेजा लाभ ना मिल सके। 

मसला ये है कि हिंदी की परवाह और चिंता करने वाले लोग कौन हैं? क्यों हिंदी भाषा पर बात करते समय हिंदी साहित्य को इसका पर्याय मान लिया जाता है? क्यों हिंदी के इतिहास की चर्चा में अमूमन साहित्य का ही ज़िक्र होता है? हिंदी की इस चिंतनपद्धति ने भाषा का सबसे ज़्यादा नुकसान किया है। सिर्फ़ साहित्य की पीठ पर सवार होकर कोई भाषा टिकाऊ नहीं बनी रह सकती। साहित्य बदलाव, रसास्वादन, इंक़लाब और समय काटने का ज़रिया एक साथ बन सकता है और किसी भाषा को टिकाए भी रख सकता है लेकिन उसे समाज की मांगों के अनुरूप इज़्ज़त और रुतबा नहीं दिला सकता। ये इज़्ज़त और बराबरी तब मिलेगी जब ज्ञान के बाक़ी अनुशासनों में हिंदी को व्यावहारिक समानता हासिल हो। 

अगर सरकार हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं को माध्यम के बतौर प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों में पढ़ाती है तो क्या कारण है कि वही सरकार नौकरियों में अंग्रेज़ी को प्राथमिकता देती नज़र आती है? अगर सरकार को अंग्रेज़ी की ज़रूरत मालूम पड़ती है तो फिर सरकारी स्कूलों में शिक्षा का माध्यम अंग्रेज़ी क्यों नहीं है? दरअसल ये व्यवस्था से जुड़ा बुनियादी सवाल है। ये एक साथ भाषा, वर्ग और गांव-शहर के बीच के फासलों से नत्थी सवाल है। लिहाजा ये सामाजिक न्याय का सवाल है। 

गांव में हिंदी माध्यम में पढ़ा कोई दलित-आदिवासी अगर उच्च शिक्षा के लिए देश के किसी अग्रणी विश्वविद्यालय में आरक्षण के अधिकार के बूते नामांकन पाता है, तो क्या कक्षा में अचानक दूसरी भाषा को माध्यम के बतौर अपनाने की हालत में वो सहजता हासिल कर सकेगा? हालांकि ये बात एक साथ आरक्षित-अनारक्षित किसी भी ग़ैर-अंग्रेज़ी भाषी लोगों पर लागू हो सकती है, लेकिन अलग-अलग सर्वेक्षणों के सामाजिक-आर्थिक आंकड़ें हमें बताते हैं कि सबसे ज़्यादा संख्या में दलित और आदिवासी ही अभी अपनी पढ़ाई के लिए सरकारी स्कूलों पर निर्भर हैं। 

हिंदी में उच्च शिक्षा नहीं होने के क्या कारण हैं? क्या हिंदी में शिक्षण सामग्री उपलब्ध नहीं है या फिर हिंदी में उच्च शिक्षा की शब्दावली विकसित नहीं हुई है? ये दो सवाल ऐसे हैं जिनका कोई आसान जवाब नहीं है और सबसे ज़्यादा इन्हीं मोर्चे पर काम करने की भी दरकार है। हिंदी में लोग पढ़ना नहीं चाहते, ये सवाल नितांत बेमानी है। सबसे ज़्यादा बिकने वाली हिंदी पत्रिकाओं की सूची पर नज़र दौड़ाइए तो इसमें प्रतियोगिता दर्पण शीर्ष पर हैं। यानी रोज़गार की सामग्री लेपेटे हिंदी अगर लोगों के बीच जा रही है तो लोग उसे अपना रहे हैं। जाहिर है जिस भाषा में रोज़गार नहीं मिलेगा उसमें बोल-चाल और हंसी-मज़ाक से ज़्यादा उन्नति वाले सिरे पर कोई व्यक्ति क्यों ज़ोर लगाएगा? सामाजिक विज्ञान से लेकर दूसरे अनुशासनों में हिंदी माध्यम की सामग्रियों में अल्प मात्रा में आए अनुवादों को छोड़ दें तो मूल लेखन कितने हुए हैं? 

सच मानिए तो इन विधाओं में हिंदी में जिस तरह रवां-दवां तरीके से लेखन हो रहे हैं उसमें बौद्धिक स्तर का अभाव, सिद्धांतों-अवधारणाओं का लोप और सतहीपन ज़्यादातर मौक़ों पर साफ़ झलकता है। पुरानी कुछ किताबों को छोड़ दीजिए तो हाल में हिंदी की कितनी श्रेष्ठ किताबें इन विधाओं में लिखी गई हैं? हिंदी की बेहतरी की दिशा में कोशिश करने की बजाए लेखक बनने की छटपटाहट और किताब लिखने से विश्वविद्यालयों में सहायक प्राध्यापक बनने की दावेदारी के मज़बूत होने की कवायद ज़्यादा झलकती हैं। जो समाज वैज्ञानिक हिंदी-अंग्रेज़ी दोनों जानते हैं और हिंदी में लिख सकने के बावजूद अंग्रेज़ी में लिखते हैं वो हिंदी में रॉयल्टी की मात्रा से परिचित हैं लिहाजा अर्थशास्त्र के दृष्टिकोण से ये उनका ये फ़ैसला बिल्कुल मुफ़ीद है। 

हिंदी की राह में सबसे बड़ा रोड़ा उच्च शिक्षा और रोज़गार में इसके साथ बरते जाने वाला भेद-भाव है। वरना, हिंदी बाज़ार में फर्राटेदार दौड़ रही है। कटरीना कैफ़ सरीखी अभिनेत्री अगर पेशानियों पर ज़ोर डालकर हिंदी के संवाद याद करती हैं तो इसलिए कि बॉलीवुड में हिंदी को मथने से पैसा निकलता है। भारत (और पाकिस्तान भी) के बड़े हिस्से में पहुंच अंग्रेज़ी की बदौलत नहीं बनाई जा सकती। बॉलीवुड अपनी सुविधा, अपने मुनाफ़े के लिए हिंदी को पकड़े हुए है और इसमें कोई भी ऐसी क्रांतिकारी इच्छाशक्ति नहीं है कि वो हिंदी का प्रचार करे। फर्ज कीजिए कि किसी दिन अंग्रेज़ी ने हिंदी को अपदस्थ कर दिया, तो बॉलीवुड के लिए अंग्रेज़ी में स्विच करना बहुत देरी वाला काम नहीं होगा। हिंदी चिंतन और रोज़गार की भाषा जब तक नहीं बनेगी और जब तक एकाग्र होकर इस दिशा में ज़ोर नहीं लगाया जाता तब तक हिंदी के नाम पर तमाम चिंतन-मनन अधूरी और बेमानी रहेगा। 

इसे दुरुस्त करने के लिए दो प्रयासों के ज़िक्र को दोहराने में कोई गुरेज नहीं होना चाहिए। पहला, सरकार उच्च शिक्षा में इसे बराबरी का दर्ज़ा दे और दूसरा हिंदी के लिए चिंता करने की बजाए इस भाषा को जानने-समझने वाले लोग इसमें ज्ञान का सृजन करें। यह सृजनात्मकता अगर स्थगित रही तो बहुत मुमकिन है कि भविष्य में हिंदी का कोई भी बेहतर लेखन पाठकों को ये भरोसा दिलाने में नाकामयाब रहेगा कि वो सचमुच मौलिक और बौद्धिक स्तर पर उच्च मानदंड पर खरा उतरने वाला लेखन है। क्योंकि, इस दौरान हिंदी में इतनी लद्धड़ क़िस्म की किताबें इसी रफ़्तार से छपनी जारी रही तो सचमुच हिंदी में इन अनुशासनों को पढ़ने से विश्वास ही उठ जाएगा। 

विश्वविद्यालयी शिक्षा के दौरान जब पत्रकारिता के हिंदी माध्यमों की किताबों में नारद मुनि को आदि पत्रकार के मिसाल के बतौर हम पढ़ते थे तो हंसी, विस्मय, जुगुप्सा और अजीब सी उदासी हमें घेर लेती थी। हर साल इस तरह की किताबों में इजाफ़ा हो रहा है। लिहाजा, हिंदी को बाहर के साथ-साथ भीतरी चौहद्दी में भी लड़ने की ज़रूरत है। अगर ये लड़ाई नहीं लड़ी गई तो हिंदी में ज्ञान के नाम पर नकली चीज़ें परोसी जाती रहेंगी और दूसरी तरफ़ एक अच्छे सुबह रैपीडैक्स हिंदी को निगलकर डकार मारते हुए चलता बनेगा। 

11 September 2014

सरकारी विदेश दौरे और मीडिया

-दिलीप ख़ान


फोटो राज्य सभा टीवी से साभार
पिछले दिनों कुछ टेलीविज़न चैनलों पर एक साथ कई पत्रकारों ने इस बात को लेकर चिंता जाहिर की कि मौजूदा प्रधानमंत्री विदेश यात्रा पर पत्रकारों को साथ नहीं ले जा रहे। अलग-अलग मसलों पर शामिल स्टूडियो परिचर्चा में जो सूत्र इन पत्रकारों को जोड़ता है वो यही बात है। चिंता ये जताई गई कि इससे पत्रकारिता को नुकसान पहुंच रहा है और फर्स्ट हैंड ऑब्जर्वेशन के अभाव के चलते आधिकारिक बयानों का ही सहारा लेना पड़ रहा है। एक हद तक इस बात से सहमति जताई जा सकती है कि किसी इवेंट में पत्रकारों की मौजूदगी नहीं होने के चलते ख़बरों के संकलन पर इसका असर पड़ सकता है, लेकिन मीडिया उद्योग के लिए इस सवाल के सिरे को पलट कर देखना चाहिए।
क्या लगातार विस्तार पा रहा भारत का मीडिया उद्योग किसी इवेंट में शिरकत के लिए ख़ुद अपने बूते पत्रकार नहीं भेज सकता? क्या वजह है कि राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री सहित किसी भी मंत्री के साथ विदेश दौरे पर जाने के लिए मीडिया संस्थान उत्साही रवैया दिखाता है? क्या ये महज पत्रकारिता के लिए ख़बरों के संकलन तक सीमित मामला है या फिर इसके जरिए सैर-सपाटा, सत्ता के गलियारे में जान-पहचान और व्यावसायिक गुणा-गणित भी साधने की कोशिश होती है। इस बात को प्रमुखता से इसलिए भी कहा जा सकता है क्योंकि इन दौरों पर कई मौक़ों पर सक्रिय पत्रकार के बदले मीडिया संस्थान के मालिक ख़ुद शामिल हो जाते हैं।

जापान में मोदी. फोटो- Salon.com से साभार
अगर चिंता पत्रकारिता संबंधी है तो फिर पूरे साल नफ़ा-नुकसान की गणना करने वाले मालिक के मन में अचानक रिपोर्टिंग की भावना कैसे पनप जाती है? दूसरी बात ये कि अगर चिंता सचमुच पत्रकारिता और ख़बरों के संकलन की है तो मीडिया संस्थानों को सत्ता गलियारे की रिपोर्टिंग के अलावा देश-विदेश के बाक़ी मुद्दों की खोज-बीन पर साल भर ध्यान देना चाहिए। लेकिन देश के कथित राष्ट्रीय टीवी चैनलों का कोई भी स्थायी रिपोर्टर पड़ोस के किसी भी देश में नहीं है और ना ही देश के सभी राज्यों में। रिपोर्टिंग के ख़र्च को जिस तरह कतरब्यौंत किया जा रहा है उससे वो पत्रकार भी सहमत दिखते हैं जो विदेश यात्रा पर पत्रकारों को नहीं ले जाने को लेकर चिंताभाव प्रकट कर रहे हैं।

पिछले 5-6 साल में भारत का मीडिया उद्योग लगभग दोगुना विस्तार पा चुका है। केपीएमजी और फ़िक्की के आंकड़ों के मुताबिक़ 2008 में मीडिया का कुल बाज़ार 58,000 करोड़ रुपए का था, जो 2013 में बढ़कर 91,800 करोड़ तक पहुंच गया। अनुमान है कि 2018 में यह बाज़ार 1,78,600 करोड़ तक पहुंच जाएगा। अगर बाज़ार इतना विस्तार पा रहा है तो पत्रकारिता के सिमटते दायरे का सवाल इस धंधे में लगे मालिकों के सामने उछाला जाना चाहिए। विश्व कप फुटबॉल कवर करने अगर कोई मीडिया संस्थान दो-तीन रिपोर्टर भेज सकता है तो इराक़-सीरिया कवर करने एक अदना रिपोर्टर क्यों नहीं भेज सकता? अगर विदेशों की रिपोर्टिंग प्रधानमंत्री दौरे के इंतज़ार में स्थगित रहती है तो ये मीडिया उद्योग में घटते पेशेवर रवैये पर सवाल है। दूसरी बात ये कि मीडिया संस्थान अगर अपने ख़र्च से पत्रकारों को इन दौरों की रिपोर्टिंग के लिए भेजते हैं तो उसकी वस्तुनिष्ठता कहीं अलहदा क़िस्म की होगी। लिहाजा सवाल करने और असंतोष प्रकट से पहले ये बेहद ज़रूरी है कि वो वाक़ई ईमानदार क़िस्म की हो और जिस उद्योग की तरफ़ से सवाल उठाए जा रहे हैं उसके भीतर भी सवाल उठे।
                   [राज्य सभा टीवी से साभार]

03 September 2014

मीडिया ओनरशिप के मसले और मौजूदा हालात

-    दिलीप ख़ान
ट्राई ने 12 अगस्त को मीडिया ओनरशिप पर लंबी-चौड़ी रिपोर्ट दी
जिस पर मीडिया में चर्चा नहीं हुई। फोटो- मिंट से साभार

भारत में मीडिया को लेकर हाल के वर्षों में जो चिंता जताई गई है उस पर मीडिया के बाहर और भीतर लगातार चर्चा हुई, लेकिन उसे दुरुस्त करने की दिशा में कदम ना के बराबर उठे। पिछले पांच-छह वर्षों में बड़े निगमों ने जिस स्तर पर मीडिया में निवेश किया है उसकी वजह से इसका चरित्र भी तेज़ी से बदला है। बिल्कुल नई क़िस्म की चुनौतियां इसके सामने खड़ी हुईं जो पहले या तो नहीं थीं, या फिर थीं भी तो सतह पर नहीं दिखती थीं। लेकिन इसके सूक्ष्म चारित्रिक बदलाव को अगर छोड़ भी दें तो तीन-चार ऐसे विचलन हैं जो असल में मीडिया की संरचना के साथ सीधे तौर पर जुड़े हुए हैं। इनमें मीडिया के मालिकाने में आया बदलाव, निजी संधियां और पेड न्यूज़ सबसे अहम हैं। इन तीन समस्याओं के इर्द-गिर्द ही बाक़ी मुश्किलों की झोपड़ियां बसती हैं। इन तीनों के संबंध को भी अगर आपस में तलाशा जाए तो मीडिया ओनरशिप सबसे अहम चुनौती के तौर पर दिखता है। अब सवाल ये है कि जब मीडिया में इन बदलावों को साफ़ तौर पर चौतरफ़ा नोटिस किया जा रहा है तो इस पर लगाम कसने की कोई ठोस रणनीति क्यों नहीं बन पा रही? क्या सरकार और संसद की तरफ़ से कोताही बरती जा रही है या फिर मीडिया नाम के उद्योग की संरचना को लेकर ये पसोपेश कायम है कि इसे बाक़ी उद्योगों से अलग किस रूप में अलगाया जाए? ज़्यादा पीछे ना जाए तो पिछले 6 साल में संसद, सरकार और इसके अलावा कुछ अन्य महत्वपूर्ण संस्थाओं ने मीडिया को लेकर दर्ज़न भर से ज़्यादा रिपोर्ट्स जारी की हैं, पचासों टिप्पणियां की हैं और सैंकड़ों बार चिंता जताई हैं।
 
अभी हाल में 12 अगस्त को भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (ट्राई) ने मीडिया ओनरशिप पर अपनी सिफ़ारिश सूचना और प्रसारण मंत्रालय को सौंप दी। इस मसले पर ट्राई का ये तीसरा अध्ययन है। सबसे पहले साल 2008 में मंत्रालय ने ट्राई को मीडिया ओनरशिप के पैटर्न का अध्यन करने के बाद सुझाव देने को कहा था। 25 फ़रवरी 2009 को प्राधिकरण ने मीडिया पर चंद लोगों के नियंत्रण से उपजे हालात और क्रॉस मीडिया ओनरशिप पर अपने सुझाव सौंप दिए। इसमें ख़ास तौर पर क्रॉस मीडिया ओनरशिप के ख़तरों से मंत्रालय को अवगत कराया गया था और बताया गया था कि देश के भीतर इसके चलते ख़बरों और विचारों की बहुलता किस तरह प्रभावित हो रही है। साथ ही विदेशों में इस पर बने नियम-क़ायदों से भी मंत्रालय को अवगत कराया गया था। 16 मई 2012 को मंत्रालय ने ट्राई को अपने इन सुझावों का पुनर्वालोकन करने को कहा जिसमें कुछ तकनीकी मसलों पर विस्तार देने की बात अंतर्निहित थी।
 
मूल रूप से जनसत्ता में प्रकाशित
मिसाल के लिए होरिजोंटल ओनरशिप और वर्टिकल ओनरशिप। होरिजोंटल क्रॉस मीडिया ओनरशिप का मतलब हैं एक ही समूह का प्रसारण के अलग-अलग माध्यमों पर कब्जा होना। यानी अख़बार, टीवी, रेडियो और पत्रिका अगर एक ही मालिक निकाल रहा हो तो ये होरिजोंटल ओनरशिप है। इसी तरह वर्टिकल ओनरशिप उसको कहेंगे जिसमें प्रसारण और वितरण के अलग-अलग व्यवसाय एक ही मालिक के कब्जे में हो। यानी अगर एक ही समूह का टीवी चैनल भी है और उसके वितरण के लिए डीटीएच और केबल प्रसारण भी तो ये वर्टिकल ओनरशिप है। इन दोनों मसलों की तहकीकात करते हुए 15 फ़रवरी 2013 को ट्राई ने मंत्रालय को एक परामर्श पत्र सौंपा जिसमें कुछ अंतिम टिप्पणियां की गईं थी। परामर्श पत्र सौंपने के बाद 22 अप्रैल से लेकर 29 अप्रैल 2013 तक प्राधिकरण ने मीडिया मालिकों के अलग-अलग पक्षों से पूरे मामले पर टिप्पणियां मांगी। 33 पक्ष में और 6 विपक्ष में आईं दलीलें थीं जो ट्राई की वेबसाइट पर चस्पां कर दी गईं। यही नहीं, इसके बाद देश के अलग-अलग पांच शहरों में खुली बहस भी कराई गईं। इसमें ट्राई के नज़रिए से अहमति जताते हुए जो तर्क आए उनमें सबसे प्रमुख ध्वनि ये थी कि भारत दुनिया के अन्य मुल्क़ों से कुछ महत्वपूर्ण अर्थों में भिन्न है। यहां पर जितनी भाषाओं में और जितनी तादादा में अख़बार और टीवी चैनल हैं उतने कहीं और मुमकिन नहीं, लिहाजा विचारों और ख़बरों की बहुलता यहां प्रभावित नहीं हो रही है। लेकिन ट्राई ने इस 12 अगस्त को जो अंतिम सिफ़ारिश सौंपी है उसमें ऐसे तमाम तर्कों के जवाब दिए गए हैं।
 
देश में अख़बारों, टीवी चैनलों और रेडियो स्टेशनों की बड़ी तादाद के बावजूद ये महसूस किया गया है कि असर और प्रसार के मामले में सब बराबर नहीं हैं। प्राधिकरण ने भी अपनी रिपोर्ट में इस बात का ज़िक्र किया है। रिपोर्ट में दिल्ली से निकलने वाले अख़बारों के उदाहरण से बताया गया है कि भले ही यहां दर्जन भर से ज़्यादा अख़बार निकलते हो, लेकिन दो-तीन अख़बार यहां के बाज़ार पर वर्चस्व बनाए हुए है, इसलिए उसकी तुलना छोटे-मझोले अख़बारों से करना ख़बरों की विविधता के अर्थ में बेमानी है। विविधता के मसले और कॉरपोरेट ओनरशिप के साथ-साथ धार्मिक व्यक्तियों और संस्थाओं तथा राजनीतिक ओनरशिप पर विस्तार से टिप्पणी की गई है। ये बात देश में अब शिद्दत से महसूस की जा रही है कि यदि किसी ख़ास राजनीतिक पार्टी से जुड़े किसी व्यक्ति के हाथ में मीडिया हो तो वो उसका इस्तेमाल अपनी छवि चमकाने या फिर विरोधी पार्टी के ख़िलाफ़ प्रोपेगैंडा के लिए करता है। आंध्र प्रदेश में दो-तीन महीने पहले टीवी चैनलों और केबल प्रसारण पर राजनीतिक पार्टियों के बीच तकरार इतना तेज़ हो गया था कि तेलंगाना और आंध्र के कुछ इलाकों में हिंसक झड़पों के साथ-साथ ये मसला संसद में भी उठा। राजनीतिक मालिकाने को आम तौर पर दक्षिण भारत और उत्तर पूर्व के साथ लोग जोड़कर देखते हैं, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में ये अख़िल भारतीय चलन के तौर पर उभरा है।
रिलायंस का 'इंडिपेंडेंट मीडिया ट्रस्ट' क्रॉस मीडिया ओनरशिप
की बड़ी मिसाल है। फोटो- इंडिया टुडे से साभार
 
पार्टी मुखपत्र को लोग उसी राजनीतिक दायरे और पार्टी लाइन का मानते हुए पढ़ते हैं, लिहाजा मुखपत्र में छपी बातों पर वो अपने तर्कों के ज़रिए राजनीतिक विभेद ढूंढ लेते हैं, लेकिन सामान्य समाचार मीडिया ने जो अपनी साख स्थापित की है, उसमें सेंधमारी के ज़रिए अगर कोई राजनेता ख़बरों को मरोड़ता है तो एक दर्शक/पाठक के लिए उसको नकार पाना बहुत मुश्किल होता है। लेकिन ये सब ना सिर्फ़ जारी है, बल्कि इसे लगातार विस्तार दिया जा रहा है। ट्राई की सिफ़ारिश में इसको तत्काल प्रभाव से बंद करने की बात कही गई है और बताया गया है कि अगर पहले से कोई ऐसा मीडिया चालू हालात में है तो उसे बंद करने के रास्ते निकाले जाए।
 
रिपोर्ट में होरिजोंटल और वर्टिकल क्रॉस मीडिया ओनरशिप पर भी एक हद तक पाबंदी की बात कही गई है। इसमें दो-तीन फॉर्मूलों के जरिए नियंत्रण की बात कही गई है और सुझाया गया है कि अगर प्रसारण और वितरण दोनों में किसी समूह का 32 प्रतिशत से ज़्यादा शेयर है तो किसी एक में उसे घटाकर 20 प्रतिशत के स्तर तक लाना होगा। इसी तरह अगर एक से अधिक मीडिया में उसका निवेश है तो उसे ‘प्रासंगिक बाज़ार में उसके असर’ को देखते हुए कतरा जाना चाहिए। प्रासंगिक बाज़ार की परिभाषा इस तरह की है कि अगर कोई मीडिया तेलुगू माध्यम का है तो ग़ैर-तेलुगू लोगों के लिए उसका कोई महत्व नहीं है, क्योंकि वो मीडिया ग़ैर-तेलुगू भाषी लोगों को प्रभावित नहीं कर सकता। इसलिए भाषावार और क्षेत्रवार ऐसे प्रासंगिक बाज़ार तलाशे गए हैं। इसमें हिंदी बाज़ार के दायरे में 10 राज्यों को रखा गया है। लेकिन मुश्किल ये है कि प्राधिकरण की इस सिफ़ारिश से छोटे बाज़ार में सक्रिय मीडिया उद्यमियों पर तो लगाम लग जाएगा, लेकिन जो बड़े समूह है और जिनका एक साथ हिंदी, अंग्रेज़ी से लेकर दो-तीन भाषाओं के बाज़ार में दख़ल है उसके लिए मुश्किल उतनी बड़ी नहीं होगी क्योंकि उनके लिए हर बाज़ार में अलग-अलग हिस्सा तय होगा। 
 
मीडिया में जिस तरह गुपचुप तरीके से निवेश का चलन बढ़ा है उससे कई दफ़ा असली मालिक का पता लगाना मुश्किल हो जाता है। इसको देखते हुए भारतीय प्रतियोगिता आयोग ने रिलायंस के मीडिया समूह इंडिपेंडेंट मीडिया ट्रस्ट का उदाहरण देते हुए दो साल पहले ये कहा था कि मीडिया उद्योग में ‘नियंत्रण’ को भी ओनरशिप की तरह देखा जाना चाहिए। अगर अध्ययनों का ही ज़िक्र किया जाए तो भारतीय प्रेस परिषद की 2009 में आई पेड न्यूज़ की रिपोर्ट के बाद संसद की स्थायी समिति ने पिछले साल इसी मसले पर लंबी-चौड़ी रिपोर्ट सौंपी। विधि आयोग ने मई 2014 में इस पर एक परामर्श पत्र दिया। एडमिनिस्ट्रेटिव स्टाफ कॉलेज ऑफ इंडिया ने अपने अध्ययन के ज़रिए इस पर रोशनी डाली। भारतीय प्रतियोगिता आयोग ने इस चलन पर नए क़िस्म के तौर-तरीके अपनाने की वकालत की।
 
एक ही मालिक के हाथ में सारे मीडिया होने के चलते
विचारों की बहुलता ख़त्म हो रही
लेकिन इन तमाम अध्ययनों के बावजूद कोई ठोस रूप-रेखा अब तक तैयार नहीं हो पाई। ट्राई ने जो हाल में सूचना प्रसारण मंत्रालय को अपनी सिफ़ारिशें सौंपी है, उसके बाद दो तथ्यों को देखते हुए उम्मीद जगती है। पहला, जब पहली दफ़ा मीडिया ओनरशिप पर ट्राई  ने 2008 में सुझाव दिए थे तो उस वक़्त इसके अध्यक्ष नृपेन्द्र मिश्रा थे, जो अब मोदी सरकार में प्रमुख सचिव हैं। दूसरा, संसद की स्थाई समिति ने पिछले साल जो पेड न्यूज़ पर रिपोर्ट दी थी उसके तत्कालीन अध्यक्ष राव इंद्रजीत सिंह अब कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में शामिल हो चुके हैं और अब सत्ताधारी पार्टी के हिस्सा हैं। लेकिन मीडिया पर किसी भी तरह की कार्यवाही ना करने के पिछले कई साल के रिकॉर्ड को देखते हुए यही लग रहा है कि ये सरकार भी बिल्ली के गले में घंटी बांधने का काम आगे के लिए टाल देगी। टीवी में आत्म नियमन के तमाम निकाय बुरी तरह असफ़ल रहे हैं और प्रिंट के लिए भारतीय प्रेस परिषद कितना कारगर है ये मीडिया से जुड़ा हर व्यक्ति अच्छी तरह जानता है। ट्राई ने अपनी सिफ़ारिश अब सरकार को सौंप दी है। गेंद अब सरकार के पाले में है। लिहाजा देखना दिलचस्प होगा कि क्या उस गेंद पर शॉट भी लगाए जाते हैं या फिर पाले में आई हुई गेंद रखे-रखे पुरानी हो जाएगी।
 
                                


26 June 2014

बसपा का शीराजा क्यों बिखरा: आनंद तेलतुंबड़े

आनंद तेलतुंबड़े ने अपने इस लेख में बसपा की पराजय का आकलन करते हुए एक तरफ मौजूदा व्यवस्था के जनविरोधी चेहरे और दूसरी तरफ उत्पीड़ित जनता के लिए पहचान की राजनीति के खतरों के बारे में बात की है. अनुवाद: रेयाज उल हक

पिछले आम चुनाव हैरानी से भरे हुए रहे, हालांकि पहले से यह अंदाजा लगाया गया था कि कांग्रेस के नतृत्व वाला संप्रग हारेगा और भाजपा के नेतृत्व वाला राजग सत्ता में आने वाला है. वैसे तो चुनावों से पहले और बाद के सभी सर्वेक्षणों ने भी इसी से मिलते जुलते राष्ट्रीय मिजाज की पुष्टि की थी, तब भी नतीजे आने के पहले तक भाजपा द्वारा इतने आराम से 272 का जादुई आंकड़ा पार करने और संप्रग की सीटें 300 के पार चली जाने की अपेक्षा बहुत कम लोगों ने ही की होगी. खैर, भाजपा ने 282 सीटें हासिल कीं और संप्रग को 336 सीटें. महाराष्ट्र में शरद पवार, उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह, बिहार में नीतीश कुमार जैसे अनेक क्षेत्रीय क्षत्रप मुंह के बल गिरे. लेकिन अब तक चुनाव नतीजों का सबसे बड़ा धक्का यह रहा कि बहुजन समाज पार्टी का उत्तर प्रदेश की अपनी जमीन पर ही पूरी तरह सफाया हो गया. लोग तो यह कल्पना कर रहे थे, और बसपा के नेता इस पर यकीन भी कर रहे थे, कि अगर संप्रग 272 सीटें हासिल करने नाकाम रहा तो इसके नतीजे में पैदा होने वाली राजनीतिक उथल-पुथल में मायावती हैरानी में डालते हुए देश की प्रधानमंत्री तक बन सकती हैं. इस कल्पना को मद्देनजर रखें तो बसपा का सफाया स्तब्ध कर देने वाला है. आखिर हुआ क्या?

नतीजे आने के बाद एक संवाददाता सम्मेलन में मायावती ने दावा किया कि दलितों और निचली जातियों में उनका जनाधार बरकरार है और चुनावों में खराब प्रदर्शन की वजह भाजपा द्वारा किया गया सांप्रदायिक ध्रुवीकरण है. उन्होंने कहा कि जबकि ऊंची जातियों और पिछड़ी जातियों को भाजपा ने अपनी तरफ खींच लिया और मुसलमान समाजवादी पार्टी की वजह से बिखर गए. बहरहाल उन्होंने इसके बारे में कोई व्याख्या नहीं दी कि ये चुनावी खेल अनुचित कैसे थे. मतों के प्रतिशत के लिहाज से यह सच है कि बसपा उत्तर प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर पर तीसरी सबसे बड़ी पार्टी है. राष्ट्रीय स्तर पर इसे 2.29 करोड़ वोट मिले जो कुल मतों का 4.1 फीसदी है. 31.0 फीसदी मतों के साथ भाजपा और 19.3 फीसदी मतों के साथ इससे आगे हैं और 3.8 फीसदी मतों के साथ सापेक्षिक रूप से एक नई पार्टी ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस इससे पीछे है. 15वीं लोकसभा में बसपा की 21 सीटें थीं जिनमें से 20 अकेले उत्तर प्रदेश से थीं. बसपा से कम मत प्रतिशत वाली अनेक पार्टियों ने इससे कहीं ज्यादा सीटें जीती हैं. मिसाल के लिए तृणमूल कांग्रेस को मिले 3.8 फीसदी मतों ने उसे 34 सीटें दिलाई हैं और ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कषगम को इससे भी कम 3.3 फीसदी मतों पर तृणमूल से भी ज्यादा, 37 सीटें मिली हैं. यहां तक कि आम आदमी पार्टी (आप) महज 2.0 फीसदी मतों के साथ चार सीटें जीतने में कामयाब रही. उत्तर प्रदेश में बसपा को 19.6 फीसदी मत मिले हैं जो भाजपा के 42.3 फीसदी और सपा के 22.2 फीसदी के बाद तीसरी सबसे बड़ी हिस्सेदारी है. इसमें भी एक खास बात है: चुनाव आयोग के आंकड़े दिखाते हैं कि बसपा इस विशाल राज्य की 80 सीटों में 33 पर दूसरे स्थान पर रही.

लेकिन देश में तीसरी सबसे ज्यादा वोट पाने वाली पार्टी का संसद में कोई वजूद नहीं होने की सबसे बड़ी वजह हमारी चुनावी व्यवस्था है, जिसके बारे में बसपा कभी भी कोई शिकायत नहीं करेगी. सबसे ज्यादा वोट पाने वाले उम्मीदवार को विजेता घोषित करने वाली यह चुनावी व्यवस्था (एफपीटीपी) हमें हमेशा ही हैरान करती रही है, इस बार इसने कुछ ज्यादा ही हैरान किया. भाजपा कुल डाले गए वोटों में से महज 31.0 फीसदी के साथ कुल सीटों का 52 फीसदी यानी 282 सीटें जीत सकी. चुनाव आयोग के आंकड़े के मुताबिक कुल 66.36 फीसदी वोट डाले गए, इसका मतलब है कि भाजपा को जितने वोट मिले उनमें कुल मतदाताओं के महज पांचवें हिस्से (20.5 फीसदी) ने भाजपा को वोट दिया. इसके बावजूद भाजपा का आधी से ज्यादा सीटों पर कब्जा है. इसके उलट, हालांकि बसपा तीसरे स्थान पर आई लेकिन उसके पास एक भी सीट नहीं है. जैसा कि मैं हमेशा से कहता आया हूं, एफपीटीपी को चुनने के पीछे हमारे देश के शासक वर्ग की बहुत सोची समझी साजिश रही है. तबके ब्रिटिश साम्राज्य के ज्यादातर उपनिवेशों ने इसी चुनाव व्यवस्था को अपनाया. लेकिन एक ऐसे देश में जो निराशाजनक तरीके से जातियों, समुदायों, नस्लों, भाषाओं, इलाकों और धर्मों वगैरह में ऊपर से नीचे तक ऊंच-नीच के क्रम के साथ बंटा हुआ है, राजनीति में दबदबे को किसी दूसरी चुनावी पद्धति के जरिए यकीनी नहीं बनाया जा सकता था. एफपीटीपी हमेशा इस दबदबे को बनाए रखने में धांधली की गुंजाइश लेकर आती है. इस बात के व्यावहारिक नतीजे के रूप में राष्ट्रीय राजनीति में कांग्रेस या भाजपा का दबदबा इसका सबूत है. अगर मिसाल के लिए आनुपातिक प्रतिनिधित्व (पीआर) व्यवस्था अपनाई गई होती, जो प्रातिनिधिक लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं द्वारा चुनावों के लिए अपनाई गई अधिक लोकप्रिय और अधिक कारगर व्यवस्था है, तो सभी छोटे समूहों को अपना ‘स्वतंत्र’ प्रतिनिधित्व मिला होता जो इस दबदबे के लिए हमेशा एक खतरा बना रहता. दलितों के संदर्भ में, इसने आरक्षण कहे जाने वाले सामाजिक न्याय के बहुप्रशंसित औजार की जरूरत को भी खत्म कर दिया होता, जिसने सिर्फ उनके अस्तित्व के अपमानजनक मुहावरे का ही काम किया है. कोई भी दलित पार्टी एफपीटीपी व्यवस्था के खिलाफ आवाज नहीं उठाएगी. बसपा तो और भी नहीं. क्योंकि यह उन सबके नेताओं को अपने फायदे के लिए धांधली करने में उसी तरह सक्षम बनाती है, जैसा यह शासक वर्गीय पार्टियों को बनाती आई है.

दूसरी वजह पहचान की राजनीति का संकट है, जिसने इस बार पहचान की राजनीति करने वाली बसपा से इसकी एक भारी कीमत वसूली है. बसपा की पूरी कामयाबी उत्तर प्रदेश में दलितों की अनोखी जनसांख्यिकीय उपस्थिति पर निर्भर रही है, जिसमें एक अकेली दलित जाति जाटव-चमार कुल दलित आबादी का 57 फीसदी है. इसके बाद पासी दलित जाति का नंबर आता है, जिसकी आबादी 16 फीसदी है. यह दूसरे राज्यों के उलट है, जहां पहली दो या तीन दलित जातियों की आबादी के बीच इतना भारी फर्क नहीं होता है. इससे वे प्रतिद्वंद्वी बन जाते हैं, जिनमें से एक आंबेडकर के साथ खुद को जोड़ता है तो दूसरा जगजीवन राम या किसी और के साथ. लेकिन उत्तर प्रदेश में जाटवों और पासियों के बीच में इतने बड़े फर्क के साथ इस तरह की कोई प्रतिद्वंद्विता नहीं है और वे एक साझे जातीय हित के साथ राजनीतिक रूप से एकजुट हो सकते हैं. इसके बाद की तीन दलित जातियों – धोबी, कोरी और वाल्मीकि – को भी उनके साथ मिला दें तो वे कुल दलित आबादी का 87.5 फीसदी बनते हैं, जो राज्य की कुल आबादी की 18.9 फीसदी आबादी है. कुल मतदाताओं में भी इन पांचों जातियों का मिला जुला प्रतिशत भी इसी के आसपास होगा. यह बसपा का मुख्य जनाधार है. इन चुनावी नतीजों में कुल वोटों में बसपा का 19.6 फीसदी वोट हासिल करना दिखाता है कि बसपा का मुख्य जनाधार कमोबेश बरकरार रहा होगा.

दूसरे राज्यों के दलितों के उलट जाटव-चमार बाबासाहेब आंबेडकर के दिनों से ही आर्थिक रूप से अच्छे और राजनीतिक रूप से अधिक संगठित रहे हैं. 1957 में आरपीआई के गठन के बाद, आरपीआई के पास महाराष्ट्र के बाद उत्तर प्रदेश में सबसे मजबूत इलाके रहे हैं, कई बार तो महाराष्ट्र से भी ज्यादा. यह स्थिति आरपीआई के टूटने तक रही. महाराष्ट्र में आरपीआई के नेताओं की गलत कारगुजारियों के नक्शेकदम पर चलते हुए उत्तर प्रदेश में आरपीआई के दिग्गजों बुद्ध प्रिय मौर्य और संघ प्रिय गौतम भी क्रमश: कांग्रेस और भाजपा के साथ गए. इस तरह जब कांशीराम ने उत्तर प्रदेश में कदम रखे तो एक दशक या उससे भी अधिक समय से वहां नेतृत्व का अभाव था. उनकी रणनीतिक सूझ बूझ ने उनकी बहुजन राजनीति की संभावनाओं को फौरन भांप लिया. उन्होंने और मायावती ने दलितों को फिर से एकजुट करने और पिछड़ों और मुसलमानों के गरीब तबकों को आकर्षित करने के लिए भारी मेहनत की. जब वे असल में अपनी इस रणनीति की कामयाबी को दिखा पाए, तो उन्होंने पहले से अच्छी तरह स्थापित दलों को एक कड़ी टक्कर दी और उसके बाद सीटें जीतने में कामयाब रहे. इससे राजनीतिक रूप से अब तक किनारे पर रहे सामाजिक समूह भी बसपा के जुलूस में शामिल हो गए. मायावती ने यहां से शुरुआत की और उस खेल को उन्होंने समझदारी के साथ खेला, जो उनके अनुभवी सलाहकार ने उन्हें सिखाया था. जब वे भाजपा के समर्थन के साथ मुख्यमंत्री बनीं, तो इससे बसपा और अधिक मजबूत हुई. ताकत के इस रुतबे पर मायावतीं अपने फायदे के लिए दूसरे राजनीतिक दलों के साथ बातचीत करने लगीं.

कुछ समझदार दलित बुद्धिजीवियों ने इस पर अफसोस जाहिर किया है कि बसपा ने दलितों के उत्थान के लिए कुछ नहीं किया है. लेकिन इस मामले की असल बात यह है कि इस खेल का तर्क बसपा को ऐसा करने की इजाजत नहीं देता है. जैसे कि शासक वर्गीय दलों के लिए यह बेहद जरूरी है कि वे जनसमुदाय को पिछड़ेपन और गरीबी में बनाए रखें, मायावती ने यही तरीका अख्तियार करते हुए उत्तर प्रदेश में दलितों को असुरक्षित स्थिति में बनाए रखा. वे भव्य स्मारक बना सकती थीं, दलित नायकों की प्रतिमाएं लगवा सकती थीं, चीजों के नाम उन नायकों के नाम पर रख सकती थीं और दलितों में अपनी पहचान पर गर्व करने का जहर भर सकती थीं लेकिन वे उनकी भौतिक हालत को बेहतर नहीं बना सकती थीं वरना ऐसे कदम से पैदा होने वाले अंतर्विरोध जाति की सोची-समझी बुनियाद को तहस नहस कर सकते थे. स्मारक वगैरह बसपा की जीत में योगदान करते रहे औऱ इस तरह उनकी घटक जातियों तथा समुदायों द्वारा हिचक के साथ वे कबूल कर लिए गए. लेकिन भेद पैदा करने वाला भौतिक लाभ समाज में ऐसी न पाटी जा सकने वाली खाई पैदा करता, जिसे राजनीतिक रूप से काबू में नहीं किया सकता. इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि एक दलित या गरीब परस्त एजेंडा नहीं बनाया जा सकता था. राजनीतिक सीमाओं के बावजूद वे दिखा सकती थीं कि एक ‘दलित की बेटी’ गरीब जनता के लिए क्या कर सकती है. लेकिन उन्होंने न केवल अवसरों को गंवाया बल्कि उन्होंने लोगों के भरोसे और समर्थन का अपने फायदे के लिए इस्तेमाल किया.

बाद में उनकी बढ़ी हुई महत्वाकांक्षाएं उन्हें बहुजन से सर्वजन तक ले गईं, जिसमें उन्होंने अपना रुख पलटते दिया और उनमें दलितों के लिए जो भी थोड़ा बहुत सरोकार बचा था, उसे और खत्म कर दिया. तब अनेक विश्लेषकों ने यह अंदाजा लगाया था कि दलित मतदाता बसपा से अलग हो जाएंगे, लेकिन दलित उन्हें हैरानी में डालते हुए मायावती के साथ पहले के मुकाबले अधिक मजबूती से खड़े हुए और उन्हें 2007 की अभूतपूर्व सफलता दिलाई. इसने केवल दलितों की असुरक्षा को ही उजागर किया. वे बसपा से दूर नहीं जा सकते, भले ही इसकी मुखिया चाहे जो कहें या करें, क्योंकि उन्हें डर था कि बसपा के सुरक्षात्मक कवच के बगैर उन्हें गांवों में सपा समर्थकों के हमले का सामना करना पड़ेगा. अगर मायावती इस पर गर्व करती हैं कि उनके दलित मतदाता अभी भी उनके प्रति आस्थावान हैं तो इसका श्रेय मायावती को ही जाता है कि उन्हें दलितों को इतना असुरक्षित बना दिया है कि वे इसके अलावा और कोई रास्ता नहीं अपना सकते. निश्चित रूप से इस बार भाजपा ने कुछ दलित जातियों को लुभाया है और वे संभवत: गोंड, धानुक, खटिक, रावत, बहेलिया, खरवार, कोल आदि हाशिए की जातियां होंगी जो दलित आबादी का 9.5 फीसदी हिस्सा हैं. मुसलमान भी ऐसे ही एक और असुरक्षित समुदाय हैं जिन्हें हमेशा अपने बचाव कवच के बारे में सोचना पड़ता है. इस बार बढ़ रही मोदी लहर और घटती हुई बसपा की संभावनाओं को देखते हुए वे सपा के इर्द-गिर्द जमा हुए थे उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ा. 2007 के चुनावों में उत्तर प्रदेश की सियासी दुनिया में फिर से दावेदारी जताने को बेकरार ब्राह्मणों समेत ये सभी जातियां बसपा की पीठ पर सवार हुईं और उन्होंने बसपा को एक भारी जीत दिलाई थी, लेकिन बसपा उनकी उम्मीदों पर खरी नहीं उतर सकी. तब वे उससे दूर जाने लगे जिसका नतीजा दो बरसों के भीतर, 2009 के आम चुनावों में दिखा जब बसपा की कुल वोटों में हिस्सेदारी 2007 के 30.46 फीसदी से गिरकर 2009 में 27.42 फीसदी रह गई. इस तरह 3.02 फीसदी वोटों का उसे नुकसान उठाना पड़ा. तीन बरसों में यह नुकसान 1.52 फीसदी और बढ़ा और 2012 के विधानसभा चुनावों में कुल वोटों की हिस्सेदारी गिरकर 25.90 पर आ गई. और अब 2014 में यह 19.60 फीसदी रह गई है जो कि 6.30 फीसदी की गिरावट है. यह साफ साफ दिखाता है कि दूसरी जातियां और अल्पसंख्यक तेजी से बसपा का साथ छोड़ रहे हैं और यह आने वाले दिनों की सूचना दे रहा है जब धीरे धीरे दलित भी उन्हीं के नक्शेकदम पर चलेंगे. असल में मायावती की आंखें इसी बात से खुल जानी चाहिए कि उनका राष्ट्रीय वोट प्रतिशत 2009 के 6.17 से गिर कर इस बार सिर्फ 4.1 फीसदी रह गया है.

जबकि जाटव-चमार वोट उनके साथ बने हुए दिख रहे हैं, तो यह सवाल पैदा होता है कि वे कब तक उनके साथ बने रहेंगे. मायावती उनकी असुरक्षा को बेधड़क इस्तेमाल कर रही हैं. न केवल वे बसपा के टिकट ऊंची बोली लगाने वालों को बेचती रही हैं, बल्कि उन्होंने एक ऐसा अहंकार भी विकसित कर लिया है कि वे दलित वोटों को किसी को भी हस्तांतरित कर सकती हैं. उन्होंने आंबेडकरी आंदोलन की विरासत को छोड़ कर 2002 के बाद के चुनावों में मोदी के लिए प्रचार किया जब पूरी दुनिया मुसलमानों के जनसंहार के लिए उन्हें गुनहगार ठहरा रही थी. उन्होंने अपने राजनीतिक गुरु कांशीराम के ‘तिलक तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार’ जैसे नारों को भी छोड़ दिया और मौकापरस्त तरीके से ‘हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा विष्णु महेश है’ जैसे नारे चलाए. लोगों को कुछ समय के लिए पहचान का जहर पिलाया जा सकता है लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वे बेवकूफ हैं. लोगों को मायावती की खोखली राजनीति का अहसास होने लगा है और वे धीरे धीरे बसपा से दूर जाने लगे हैं. उन्होंने मायावती को चार बार उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया लेकिन उन्होंने जनता को सिर्फ पिछड़ा बनाए रखने का काम किया और अपने शासनकालों में उन्हें और असुरक्षित बना कर रख दिया. उत्तर प्रदेश के दलित विकास के मानकों पर दूसरे राज्यों के दलितों से कहीं अधिक पिछड़े बने हुए हैं, बस बिहार, उड़ीसा, मध्य प्रदेश और राजस्थान के दलित ही उनसे ज्यादा पिछड़े हैं. मायावती ने भ्रष्टाचार और पतनशील सामंती संस्कृति को बढ़ाना देने में नए मुकाम हासिल किए हैं, जो कि बाबासाहेब आंबेडकर की राजनीति के उल्टा है जिनके नाम पर उन्होंने अपना पूरा कारोबार खड़ा किया है. उत्तर प्रदेश दलितों पर उत्पीड़न के मामले में नंबर एक राज्य बना हुआ है. यह मायावती ही थीं, जिनमें यह बेहद गैर कानूनी निर्देश जारी करने का अविवेक था कि बिना जिलाधिकारी की इजाजत के दलितों पर उत्पीड़न का कोई भी मामला उत्पीड़न अधिनियम के तहत दर्ज नहीं किया जाए. ऐसा करने वाली वे पहली मुख्यमंत्री थीं.

जातीय राजनीति की कामयाबी ने बसपा को इस कदर अंधा कर दिया था कि वह समाज में हो रहे भारी बदलावों को महसूस नहीं कर पाई. नई पीढ़ी उस संकट की आग को महसूस कर ही है जिसे नवउदारवादी आर्थिक नीतियों ने उनके लिए पैदा की हैं. देश में बिना रोजगार पैदा किए वृद्धि हो रही है, और सेवा क्षेत्र में जो भी थोड़े बहुत रोजगार पैदा हो रहा है उन्हें बहुत कम वेतन वाले अनौपचारिक क्षेत्र में धकेल दिया जा रहा है. सार्वजनिक और सरकारी क्षेत्रों के सिकुड़ने से आरक्षण दिनों दिन अप्रासंगिक होते जा रहे हैं. दूसरी तरफ सूचनाओं में तेजी से हो रहे इजाफे के कारण नई पीढ़ी की उम्मीदें बढ़ती जा रही हैं. उन्हें जातिगत भेदभाव की वैसी आग नहीं झेलनी पड़ी है जैसी उनके मां-बाप ने झेली थी. इसलिए वे ऊंची जातियों के बारे में पेश की जाने वाली बुरी छवि को अपने अनुभवों के साथ जोड़ पाने में नाकाम रहते हैं. उनमें से अनेक बिना दिक्कत के ऊंची जातियों के अपने दोस्तों के साथ घुलमिल रहे हैं. हालांकि वे अपने समाज से रिश्ता नहीं तोड़ेंगे लेकिन जब कोई विकास के बारे में बात करेगा तो यह उन्हें अपनी तरफ खींचेगा. और यह खिंचाव पहचान संबंधी उन बातों से कहीं ज्यादा असरदार होगा जिसे वे सुनते आए हैं. दलित नौजवान उदारवादी संस्कृति से बचे नहीं रह सकते हैं, बल्कि उन्हें व्यक्तिवाद, उपभोक्तावाद, उपयोगवाद वगैरह उन पर असर डाल रहे हैं, इनकी गति हो सकता है कि धीमी हो. यहां तक कि गांवों में भीतर ही भीतर आए बदलावों ने निर्वाचन क्षेत्रों की जटिलता को बदल दिया है, जिसे हालिया अभियानों में भाजपा ने बड़ी महारत से इस्तेमाल किया जबकि बसपा और सपा अपनी पुरानी शैली की जातीय और सामुदायिक लफ्फाजी में फंसे रहे. बसपा का उत्तर प्रदेश के नौजवान दलित मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित नहीं कर पाना साफ साफ दिखाता है कि दलित वोटों में 1.61 करोड़ के कुल इजाफे में से केवल 9 लाख ने ही बसपा को वोट दिया.

भाजपा और आरएसएस ने मिल कर दलित और पिछड़ी जातियों के वोटों को हथियाने की जो आक्रामक रणनीति अपनाई, उसका असर भी बसपा के प्रदर्शन पर दिखा है. उत्तर प्रदेश में भाजपा के अभियान के संयोजक अमित शाह ने आरएसएस के कैडरों के साथ मिल कर विभिन्न जातीय नेताओं और संघों के साथ व्यापक बातचीत की कवायद की. शाह ने मुजफ्फरनगर सांप्रदायिक हमले का इस्तेमाल पिछड़ी जातियों को अपने पक्ष में लुभाने के लिए किया. उसने मोदी की जाति का इस्तेमाल ओबीसी वोटों को उत्साहित करने के लिए किया कि उनमें से ही एक इंसान भारत का प्रधानमंत्री बनने जा रहा है. इस रणनीति ने उन इलाकों की पिछड़ी जातियों में सपा की अपील को कमजोर किया, जो सपा का गढ़ मानी जाती थीं. इस रणनीति का एक हिस्सा बसपा के दलित आधार में से गैर-जाटव जातियों को अलग करना भी था. भाजपा ने जिस तरह से विकास पर जोर दिया और अपनी सुनियोजित प्रचार रणनीति के तहत बसपा की मौकापरस्त जातीय राजनीति को उजागर किया, उसने भी बसपा की हार में एक असरदार भूमिका अदा की. लेकिन किसी भी चीज से ज्यादा, बसपा की अपनी कारगुजारियां ही इसकी बदतरी की जिम्मेदार हैं. यह उम्मीद की जा सकती है कि इससे पहले कि बहुत देर हो जाए बसपा आत्मविश्लेषण करेगी और खुद में सुधार करेगी.