13 July 2015

डांगावास के निहितार्थ

(राजस्थान में दलित उत्पीड़न की रपट)
बजरंग बिहारी तिवारी
दलितों के उत्पीड़न के मामले में हरियाणा इतना बदनाम है कि पड़ोसी राज्य राजस्थान को अक्सर शांत इलाका मान लिया जाता है. गाहे-बगाहे वहां से जातिवादी हिंसा की जो खबरें आती हैं वे हरियाणा की भीषण वारदातों के समक्ष उपेक्षित-सी रह जाती हैं. लेकिन, मई 2015 में वहां ऐसी बीभत्स घटना हुई कि उसने क्रूरता की सभी हदें पार कर दीं| इस घटना की तहकीकात करने पर मालूम हुआ कि वहां जाति आधारित हिंसा की एक सतत धारा बह रही है. नई सरकार की ताजपोशी ने इस धारा को उत्प्लावित कर दिया है. इसी का नतीजा डांगावास का दलित नरसंहार है.
नागौर जाट बहुल जिला है. इसे जाटलैंड भी कहते हैं. इस जिले के मेड़ता थाने के अंतर्गत एक गाँव है डांगावास. ‘डांग’ जाटों का एक गोत्र नाम है, इसी के आधार पर गाँव का नाम पड़ा है. डांगावास राष्ट्रीय राजमार्ग से सटकर बसा है. देखने से पुराना गाँव लगता है. इस गाँव में जाटों के 1500 घर हैं. इसके बाद संख्या में दलित मेघवाल का स्थान आता है. इनके सवा सौ परिवार हैं. रैगर के 50-60, वाल्मीकि के 100, कुम्हारों के 50 और ब्राह्मणों के 20 घर हैं. बनिया, सुनार, लुहार जैसी जातियां भी गाँव में हैं. संख्या बल के कारण और उससे ज्यादा भूस्वामी वर्ग होने के कारण गाँव में जाट दबंग हैं. जातिगत(जिसमें वर्गगत आधार समाहित है और असल में वही प्रमुख है) हिंसा की तमाम वारदातें इसी जाति से जुड़े लोगों द्वारा अंजाम दी जाती हैं. 14 मई 2015 की घटना में भी यही जाति थी. इस घटना की सूचना लगातार यात्रा पर होने के कारण मुझे देर से मिली. फिर, इंटरनेट पत्रिका ‘हस्तक्षेप’ में भंवर मेघवंशी की विस्तृत रपट ने पूरी घटना से अवगत कराया. जनवादी लेखक संघ (जलेस) के कार्यकारी मंडल की दिल्ली में 23 मई को हुई बैठक में मैं भी शामिल था. इसमें यह तय किया गया कि जलेस की एक टीम राजस्थान के साथी राजेंद्र साईवाल के नेतृत्व में घटनास्थल का दौरा करे और वस्तुस्थिति से अवगत कराए. दिल्ली से टीम ले जाने की जिम्मेदारी मुझे दी गई. अपने पूर्वनिर्धारित कार्यक्रमों के चलते मैं वहां 6 जून को निकल सका.टीम के अन्य साथियों में शंभु यादव, राम नरेश राम और अतुल थे. राजेंद्र साईवाल को जयपुर से ज्वाइन करना था मगर उस दिन वे उदयपुर में थे तब उनकी जगह जयपुर के कामरेड कामेश्वर त्रिपाठी हमारे साथ रहे. हम लोगों ने पहले अजमेर जाकर जवाहरलाल नेहरू चिकित्सालय में भर्ती घायलों से मुलाकात की फिर वहां से किराए की टैक्सी लेकर नागौर के डांगावास गाँव गए. मुख्यतः पीड़ितों से, भंवर मेघवंशी की रपट से और थोड़ा-बहुत पुलिस वालों से बात करके 14 मई वाली घटना की जो तस्वीर उभरी वह यों है-
रतनाराम मेघवाल को आशंका थी कि गाँव के जाट हमला कर सकते हैं. इसी के चलते उन्होंने 11 मई को मेड़ता थाने जाकर तहरीर दी थी और पुलिस से अपने परिवार की जान-माल की सुरक्षा की मांग की थी. पुलिस को अपने कर्तव्य से ज्यादा अपनी जात-बिरादरी की चिंता थी इसलिए उसने मेघवाल परिवार के गुहार पर कोई कार्यवाही नहीं की. 14 मई की सुबह भूस्वामी जाट डांगावास में इकट्ठे हुए और एक निर्णय लेकर मेघवाल परिवार पर हमला कर दिया. इस हमले में गृहस्वामी रतनाराम को बेहद क्रूरता से मार डाला गया और उन्हीं के साथ पोखरराम तथा पांचाराम को भी मौत के घाट उतार दिया गया. खेमाराम की अजमेर अस्पताल में मृत्यु हो गई. इस हत्याकांड में एक ऐसा व्यक्ति भी मारा गया जिसका इस वाकए से कोई लेना-देना नहीं था. इस व्यक्ति का नाम रामपाल गोसाईं था. इसकी मौत का आरोप मेघवालों पर लगा. मगर, कुछ बुनियादी प्रश्न अब तक अनुत्तरित हैं. यह कि रामपाल गोसाईं यहाँ क्यों आया? उसकी  मृत्यु गोली लगने से हुई मगर मेघवालों के पास बन्दूक ही नहीं है तो गोली चलाई किसने? रामपाल की हत्या का मुख्य आरोपी गोविंद मेघवाल को बनाया गया जबकि उस समय वह वहां पर था ही नहीं! रामपाल की लाश पुलिस ने कहाँ से बरामद की? उसकी पोस्टमार्टम रिपोर्ट क्या कहती है? एक क्षण के लिए आप यह मान भी लें कि गोसाईं को मेघवालों ने मारा तब सवाल इस हत्या के मकसद का है! गोसाईं को मारकर मेघवालों को क्या मिल सकता था? उससे कोई जाती दुश्मनी भी नहीं थी? कहीं ऐसा तो नहीं कि रामपाल गोसाईं को मारकर दबंगों ने दलितों को हत्याकांड में फंसाने की साजिश रची हो और इसमें पुलिस की भरपूर मिलीभगत हो? आखिर कुछ तो वजह होगी कि अधिकतम 5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित थाने के सिपाही मौका-ए-वारदात पर तब पहुंचते हैं जब समूचा हत्याकांड हो चुका होता है. महिलाओं के साथ घोर बदसलूकी होती है और सभी 11 दलितों के हाथ-पाँव तोड़कर उन्हें जिंदगी भर के लिए अपंग बना दिया जाता है. मोबाईल फोन के इस जमाने में पुलिस-प्रशासन को पल-पल की खबर न मिल रही हो, ऐसा कैसे हो सकता है! मृतक रतनाराम ने आसन्न संकट की सूचना लगातार दी, ऐसा परिवार के लोग कह रहे थे. फिर, इस हत्याकांड में पुलिस को एक पक्ष में शामिल क्यों न माना जाए? मेड़ताथाने के स्टाफ का मात्र ट्रांसफर करना क्या न्याय का मखौल उड़ाना नहीं है? यहप्रशासनिक मशीनरी की चूक नहीं है बल्कि उसकी हत्याकांड में स्पष्ट भागीदारी है. अगर इस हत्याकांड के सभी मुख्य अभियुक्त अभी भी गिरफ्तार नहीं किए जा सके हैं तो यह उसी पटकथा का हिस्सा है जिसे पुलिस की मदद से पहले ही लिख लिया गया था! हम लोगों को यह जानकर खासा अचरज हुआ कि अभी जो पुलिस मेघवाल मोहल्ले में तैनात है उसमें सबके सब पुलिसकर्मी मेघवाल जाति के हैं! यह कैम्प हत्याकांड के अगले दिन ही लग गया था. यही नहीं, अजमेर के सरकारी चिकित्सालय में भर्ती घायलों की सुरक्षा में भी इसी जाति के पुलिसकर्मियों को लगाया गया है. सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की यह जातिवादी व्यवस्था है. बिहार के रणबीर सेना की तर्ज़ पर. अब हर जाति की सुरक्षा के लिए उसी जाति के पुलिसकर्मियों की व्यवस्था की जाएगी! इस व्यवस्था के निहितार्थों पर गंभीरतापूर्वक सोचने की जरूरत है. मान लीजिए हमला किसी ऐसी जाति पर होता हैजिस जाति के पुलिसकर्मी पुलिस विभाग में हैं ही नहीं तब उस स्थिति में सरकार क्या करेगी? हो सकता है कि डांगावास के पीड़ितदलितों की ऐसी जाति आधारित पुलिस व्यवस्था से पूरी सहमति हो और उन्होंने ही मांग की हो कि उनकी जाति के पुलिसकर्मियों को उनकी सुरक्षा में लगाया जाए. सरकारया प्रशासन का ऐसी मांग मान लेना ही यह साबित करता है कि उसका पुलिसतंत्र भारतीय संविधान से नहीं, जाति के नियमों से संचालित होता है.
घटना की पृष्ठभूमि
इस घटना के बीज आधी सदी पहले पड़ गए थे. 1963 में दोलाराम मेघवाल के बेटे बस्ताराम की 23 बीघे 5 बिस्वा जमीन चिमनाराम जाट के कब्जे में चली गयी थी. इसका जो कारण ज्ञात हुआ वह यह कि बस्ताराम ने 1963 में चिमनाराम से डेढ़ हज़ार रूपया क़र्ज़ लिया था. जब मैंने इस परिवार के एक सदस्य गोविंद से इस क़र्ज़ की वजह पूछी तो उन्होंने (क़र्ज़ लेने के तात्कालिक कारण से) अनभिज्ञता जताई. इस क़र्ज़ के बदले बस्ताराम ने अपनी जमीन चिमनाराम के सुपुर्द कर दी. बस्ताराम को कोई औलाद नहीं थी तो उन्होंने अपने दो भाइयों- मीसाराम और शंकरराम के लड़कों में से शंकरराम के बड़े बेटे रतनाराम को गोद ले लिया.बस्ताराम अब नहीं हैं. 16-17 साल पहले जब वे बीमार पड़े थे तब उन्होंने चिमनाराम से अपनी जमीन वापस मांगी थी. चिमनाराम ने रेहन पर राखी जमीन वापस करने से इंकार कर दिया. रतनाराम ने दीवानी का मुकदमा दायर किया. 1997 में अदालत से इस बावत पहली नोटिस जारी हुई. मेघवाल मोहल्ले के बड़े बुजुर्गों ने बताया कि चिमनाराम जाट ने कभी दावा नहीं किया कि जमीन उनकी है.चिमनाराम के दो बेटे हैं- कानाराम और ओमाराम. ओमाराम को कोई संतान नहीं है जबकि कानाराम को एक बेटा है कालूराम. दीवानी का केस चल ही रहा था और साक्ष्यों को देखते हुए इसकी पूरी संभावना थी कि केस में फैसला रतनाराम के पक्ष में होगा. इससे जमीन पर काबिज जाट परिवार में बेचैनी फ़ैल गई. भंवर मेघवंशी की रपट के अनुसार अभी हाल में न्यायालय का निर्णय रतनाराम के हक में आया. रतनाराम ने तब उस जमीन पर एक पक्का और एक कच्चा मकान बनवा लिया और वहीं रहने भी लगे. यह खेत गाँव से थोड़ी दूर पर है. इस बीच अप्रैल 2015 में कानाराम ने उस जमीन पर अपना कब्ज़ा साबित करने के लिए जेसीबी मशीन से तालाब खुदवाना शुरू कर दिया. खेत के कुछ हरे पेड़ (खेझड़ी)भी कटवा लिए. चिंतित रतनाराम ने इसकी मेड़ता थाने में लिखित शिकायत की. जैसी आशंका थी, पुलिस ने कोई कार्यवाही नहीं की. तब पीड़ित पुलिस अधीक्षक, अजमेर के पास पहुंचे. उनकी दखल से 1 मई को एफआइआर दर्ज हुई. तालाब का खुदना रुक गया. 10 मई को जाट समुदाय के लोग गाँव में इकट्ठे हुए. इस पंचायतसे मेघवाल मोहल्ले में दहशत का माहौल बन गया. रतनाराम का परिवार खासतौर पर घबराया हुआ था. पंचायत के दिन रतनाराम किसी दूसरे गाँव गए हुए थे. तब चौधरी लोग किसनाराम, मुन्नाराम को ले गए. ‘पंचों’ने इन्हें यह कहते हुए वापस कर दिया कि वे अभी नासमझ हैं. पंचायत में सिर्फ बड़े ही आ सकते हैं. गाँव लौटने पर अगले दिन रतनाराम सरपंच के घर मिलने गए. गाँव के सरपंच का नाम रामकरण कमेड़िया (जाट) है. लोगों ने बताया कि कागज पर सरपंच के रूप में वैसे तो उनकी पुत्रबधू सुनीता का नाम है लेकिन सरपंची रामकरण करते हैं. सुनीता ओमप्रकाश की पत्नी हैं. रामकरण ने रतनाराम को बताया कि जो फैसला होना था हो चुका. पंचायत अब नहीं होगी. गांववालों से मेघवाल परिवार को खबर मिली कि पंचायत ने सात दिनों का समय दिया है. अगर रतनाराम ने जमीन नहीं खाली की तो दोबारा पंचायत बैठेगी. 11 मई को ही गाँव के जाट इकट्ठे होकर एसडीएम, डिप्टी एसपी, कलक्टर के पास गए. वहां उन्होंने क्या किया या कहा यह किसी को नहीं मालूम. 14 मई की सुबह दबंग अचानक गाँव में इकट्ठा हुए. यह पंचायत नहीं थी बल्कि हमले की योजना के लिए बुलाई गई बैठक थी. मेघवाल मोहल्ले में हमें बताया गया कि गाँव के दलितों की तकरीबन एक हज़ार बीघे जमीन इसी तरह जाटों के कब्जे में है. अपनी रपट में भंवर ने टिप्पणी की है कि रतनाराम परिवार को नष्ट करने का मतलब था कि शेष दलित समझ जाएं और अपनी जमीन वापस लेने का ख्वाब देखना बंद करें.
14 मई का घटना-क्रम
     राजस्थान में मई की झुलसा देने वाली गर्मी सुबह से ही शुरू हो जाती है. रतनाराम का परिवार यों तो आशंकाग्रस्त था और इस संदर्भ में औपचारिकता के लिए सही, प्रशासन को अवगत भी करा दिया था, (सूचनानुसार उस 14 मई की सुबह एसडीएम को हमले की आशंका की खबर दे दी गई थी) मगर आज की इस तरह की आसन्न आपदा का उन्हें अनुमान नहीं था. पंचायत की सात-आठ दिन वाली मोहलत की उड़ती अफवाह ने एक भिन्न मनःस्थिति भी बना दी थी. सुबह की अचानक बटोर के बाद जो तय हुआ उसके अनुरूप गाँव से 300-350 लोगों की भीड़ हमले के लिए तैयार होकर चल पड़ी. इस भीड़ में गाँव के जाट तो थे ही, उनके रिश्तेदार और कुछ दूसरे लोग भी शामिल हो गये थे. प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि हमलावरों के पास 4-5 ट्रैक्टर, 4-5 पिक-अप गाड़ियाँ, 2-3 बोलेरो, 30-40 मोटरसाइकिलेंथीं. उनके पास धारदार हथियार,कुल्हाड़ी, फर्शी, सरिया, लोहे की पाइप और बंदूक भी थी. जब हमलावर खेत पर पहुंचे उस समय वहां 16 लोग थे. खेत गाँव से दो किमी की दूरी पर है.गृहस्वामी रतनाराम मेघवाल (उम्र65 वर्ष) पर हमलावरों का गुस्सा सर्वाधिक था. इस गुस्से के शिकार पोखरराम भी बने. रतनाराम के दिवंगत बेटे नौरतराम के साले पोखरराम(45 वर्ष) अपने छोटे भाई गणपतराम (35 वर्ष) के साथ बेवाबहन पप्पूड़ीदेवी (32 वर्ष) से मिलने आए हुए थे. भंवर ने इन्हें मजदूर नेता बताया है. मेघवाल मोहल्ले में इस बावत पूछा तो लोगों ने अनभिज्ञता प्रकट की. ये दोनों भाई पुरोहितवासनी पाटुकला गाँव के हैं.रतनाराम पर पहले कुल्हाड़ी से वार किया गया फिर आँखों में जलती लकड़ियाँ डाल दी गईं. पोखरराम के ऊपर पहले तो ट्रैक्टर चलाया गया फिर उनकी आँखों में अंगारे डाल दिए गए. इनदोनो की मौके पर ही मौत हो गई. पांचाराम मेघवाल (55) को भी ट्रैक्टर से कुचला गया. फिर धारदार हथियार से उनका सिर फाड़ दिया गया. इनकी मौत अजमेर के अस्पताल में हुई. पोखरराम के भाई गणपतराम की आँखों में आक का दूध डाला गया. फिर उसे निर्ममता से कुचला गया. जान फिर भी बची रही. पहले मेड़ता फिर अजमेर के अस्पताल में जिंदगी और मौत से जूझते गणपतराम ने 23 मई को आखिरी सांस ली. भंवर की रिपोर्ट के अनुसार गणपतराम की लाश को लावारिस बता कर गुपचुप पोस्टमार्टम कर दिया गया. गणेशराम (21) की मौत 28 मई को अजमेर के अस्पताल में हुई. रामपाल गोसाई को भी जोड़ लें तो अब तक 6 लोग इस हत्याकांड की भेंट चढ़ चुके हैं. हमलावरों ने महिलाओं के साथ बहुत घिनौना सुलूक किया. ज्यादातर महिलाओं के हाथ-पाँव तोड़ दिए गए. उनके गहने लूट लिए गए और कुछ महिलाओं के गुप्तांगों में लकड़ियाँ घुसेड़ दी गईं. घर पर रखी 4 मोटरसाइकिलें जला दी गईं. ट्रैक्टर उठा ले गए और ट्राली को आग के हवाले कर दिया. हमलावरों ने खेत में बने दोनों नवनिर्मित कच्चे और पक्के मकान गिरा दिए. अब यह खेत पुलिस ने कुर्क कर लिया है. हमले के सबूत, घटनास्थल पर बिखरे हुए अवशेष और ढहाए गए मकान का मलबा पुलिस जाने कहाँ उठा ले गई है! ऐसी तत्परता शक के दायरे में आती है. फोरेंसिक साक्ष्य जितने कम होंगे, हमलावरों के बच निकलने की उतनी ही गुंजाइश रहेगी. राज्य पुलिस को अंदाज तो रहा ही होगा कि मामला देर-सबेर सीबीआई को सौंपा जा सकता है. प्राप्त सूचनानुसार मेड़ता थाने का लगभग पूरा स्टाफ, थानेदार (पूनाराम रूड़ी), सीआइ (नंगाराम चौधरी), पुलिस उपाधीक्षक, अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक सब हमलावरों की जाति के हैं. इसी बिरादरीवाद के बल पर हमलावरों ने पुलिस की मौजूदगी में मेड़ता अस्पताल में भर्ती घायलों पर 14 मई को ही फिर से हमला करदिया. पुलिस मूकदर्शक की भूमिका में रही. हस्तक्षेप.कॉम पर उपलब्ध भंवर मेघवंशी की रपट बताती है कि दलितों की ओर से जो एफ़आइआर दर्ज हुई वह बहुत लचर है और उसमें महिलाओं से बदसलूकी की बात शामिल ही नहीं की गई है, न ही रतनाराम, पोखरराम आदि की वीभत्स तरीके से की गई हत्या का विवरण है. दूसरी तरफ रामपाल गोस्वामी की मौत का पूरा इल्जाम दलितों पर डालते हुए सशक्त एफआइआर लिखी गई है. इसमें घायलों सहित कुल 16 लोगों को नामजद किया गया है. भुक्तभोगियों को सबक सिखाने का इससे अधिक अचूक तरीका और क्या हो सकता है? सीबीआइ के रास्ते आसान नहीं हैं. न्याय की आशा धुंधलके में कैद कर दी गई है.
घायल क्या कहते है?
अजमेर के जवाहरलाल नेहरू चिकित्सालय में भर्ती घायलों ने बताया कि जब हमें मेड़ता अस्पताल से 14 मई को यहाँ लाया गया तो उसी रात डाक्टरों ने पांच घायलों को डिस्चार्ज कर वापस घर जाने को कह दिया. अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष पी.एल.पुनिया के हस्तक्षेप से उन्हें पुनः एडमिट किया गया. अस्पताल में भर्तीघायलों के नाम इस प्रकार हैं- 1.खेमाराम(43) पुत्र शंकरराम, 2.मुन्नाराम (30) पुत्र रतनाराम, 3.अर्जुनराम (27) पुत्र रतनाराम, 4.पप्पूड़ी देवी (32) पत्नी नौरतराम, 5.बीदामी (60) पत्नी रतनाराम, 6.सोनकी देवी (55) पत्नीपांचाराम, 7.किसनाराम (23) पुत्र पांचाराम, 8.श्रवणराम (32) पुत्र रतनाराम (ये रतनाराम दूसरे हैं, खाड़की गाँव के), 9.जसोदा (30) पत्नी श्रवणराम, 10.भंवरी (27) पत्नी मुन्नाराम, और, 11.शोभादेवी (25) पत्नी गोविंदराम.
     हमारी टीम जब अजमेर अस्पताल घायलों से मिलने पहुंची तो उनकी सुरक्षा में तैनात पुलिसकर्मी हमें दिल्ली से आया जानकर संभ्रम में उठ खड़े हुए. मामला क्योंकि केंद्रीय जांच ब्यूरो को सौंप दिया गया है इसलिए शायद ऐसी प्रतिक्रिया हुई होगी. यह जानकर कि हम एक लेखक संगठन की तरफ से आए हैं, उन्होंने पूछताछ के उपरांत वापस चलते वक्त रजिस्टर में हमारा नाम-पता लिखवाया. हमारी बात मुख्य रूप से खेमाराम से हुई. खेमाराम पर भी ट्रैक्टर चलाया गया था. उनके दोनों पैर टूटे हुए है. पाँव के अंदर स्टील राड डालकर प्लास्टर किया हुआ है. बातचीत के क्रम में खेमाराम ने हमें बताया कि कल (5 मई) अस्पताल ने हम सबको डिस्चार्ज कर दिया है और गाँव जाने को बोल दिया है. हम अभी नहीं जा रहे क्योंकि हमें वहां खतरा है. निर्देश के बावजूद हम अस्पताल में हैं. हमारी मानसिक हालत समझी जानी चाहिए. “रामपाल गोसाईं की हत्या का आरोप हम पर लग रहा है मगर यह बताइए कि हम ऐसे व्यक्ति को क्यों मारेंगे जिससे न तो हमारी कोई अदावत है और न जिसके मरने से हमें किसी तरह का कोईफायदा पहुंचेगा. पुलिस हमें बताए कि गोसाईं की लाश उसे कहाँ मिली? जिस बंदूक से उसे मारा गया है वह कहाँ है? हम लोगों के पास तो कोई गोली-बंदूक है नहीं! जिसका इस केस से कोई ताल्लुक नहीं, वह थर्ड पार्टी घटनास्थल पर कैसे थी?” पीड़ितों में एक व्यक्ति ने अपना दुख साझा करते हुए कहा कि पुलिस प्रशासन तो उन्हीं का है फिर हमारी कौन सुनेगा. मेड़ता अस्पताल में जब हमपर हमला हुआ तो पुलिस वहीं पर होने के बावजूद खामोश क्यों रही? उसने क्यों नहीं हमलावरों को वहीं पर गिरफ्तार कर लिया?“हमले वाले दिन भी हमने सुबह पुलिस को सूचित कर दिया था तब हमारी रक्षा में वह क्यों नहीं आई? वह चाहती तो हमले के वक्त ही जाटों को गिरफ्तार कर लेती. मगर 10-15 मिनट का रास्ता इतना लंबा कैसे हो गया?” एक अन्य भुक्तभोगी ने बताया कि थाने से पुलिस समय पर निकली मगर उसने सीधे आने की बजाए दूर का चक्कर काटकर आना उचित समझा. घायल महिलाओं में हमने पप्पूड़ीदेवी सेबात की. उन्होंने बताया कि उनका पाँव लाठी से तोड़ा गया. “बहुत गलियाँ दीं. बदतमीजी की. धमकाया कि यहाँ से भग जाओ नहीं तो सबको मार डालेंगे. उन्होंने मेरे पेट के अंदर लकड़ियाँ डाल दीं. फिरमैं बेहोश हो गई. उसके बाद क्या हुआ पता नहीं.” बगल वाले बेड पर भंवरी हैं. उनके दोनों हाथ तोड़ दिए गए हैं. सिर पर घाव है. बायां पैर जख्मी है.“उन्होंने हमारे साथ जोर-जबरदस्ती की”, भंवरी ने बताया. सभी महिलाएं घूंघट में हैं. पर्दा प्रथा राजस्थान की पहचान बन गई है. शोभा का बेड भंवरी और पप्पूड़ी के बीच में है. शोभा का दाहिना हाथ और दाहिना पाँव लाठी से तोड़ा गया है. “मैं बेहोश हो गई थी”, भाव-शून्य आवाज में शोभा ने बताया. जसोदा के दोनों हाथ टूटे हुए हैं. गाँव की मारवाड़ी बोली में जसोदा ने कहा, “उन्होंने मेरे पैरों में मारा. कपड़े फाड़ दिए. जांघ में डंडा चलाया.” बुजुर्ग बादामी अपने बिस्तर पर. हिलना-डुलना मुश्किल. लाठी से उनके दोनों हाथ तोड़ दिए गए हैं. “वे गलियाँ बोल रहे थे.” “कैसी गलियाँ?” –शंभू यादव पूछते हैं. बादामी गिरी आवाज में गालियाँ गिनाते हुए कहती हैं- “साड़ी (साली), कुत्ती, रांडा (रांड़, बेवा), नीच, बेड़नियाँ, बामनी.” आखिरी छोर पर सोनकी का बेड है. सोनकी की पीठ में दो टाँके लगे हैं. दाहिना पाँव तोड़ दिया गया है. दोनों हाथ चोटिल. “मारते हुए वे लगातार गाली दे रहे थे.” –सोनकी बोलती हैं. “आपने हमलावरों में किसी को पहचाना?” “हम हमेशा पर्दा करते हैं. गाँव में किसी (आदमी) को नहीं पहचानते. फिर, बेहोश भी हो गए थे.” हमारे साथ खड़े महेश मेघवाल चाहते हैं कि उनके वाट्सएप्प पर आए संदेश देख लूँ. जाहिरा तौर पर यह संदेश दबंगों की ओर से जारी हुआ है. कई लंबे-लंबे धमकाऊ टेक्स्ट हैं. कुछ पंक्तियाँ बानगी के लिए- “एससी एक्ट का नाजायज फायदा उठाया जा रहा है.”, “हमने उन्हें रगड़-रगड़ कर मारा.”, “27 वीर जाटपुत्र नामजद हुए हैं.”, “आखिर ऊँट आ ही गया जाट के नीचे.”, “सरकार इन्हें कानूनी सरंक्षण देना बंद करे.”, “हमसे जो टकराएगा वह ऐसे ही मिट जाएगा.” “कहीं ऐसा न हो कि ये भी गुर्जरों की तरह विलुप्त प्रजाति बन जाए.” “जाट से भिड़ने का अंजाम मुजफ्फरनगर में दिखा था, अब डांगावास में दिखाई पड़ रहा है.” इन संदेशों की भाषा बीच-बीच में ठेठ स्थानीय है. महेश और दूसरे लोग उसका अर्थ समझाते हैं. शंभू को लगता है कि वर्चस्व का ताना-बाना समझने में इन संदेशों की भाषा से सहायता मिल सकती है. राम नरेश के पास रिकार्डर है और कैमरा भी. वे अपने काम मेंलगे हैं और पीड़ितों को ध्यान से सुनते हुए बड़े सटीक प्रश्न पूछते हैं. अतुल मेरी तरह नोटबुक में सबकी बातें लिख रहे हैं. कामरेड कामेश्वर के चेहरे पर लगातार गुस्सा है. राजस्थान में घोर सामंतवाद की मौजूदगी का वे बार-बार जिक्र करते हैं.
     हमले का राजनीतिक आयाम पीड़ित ही खोलते हैं. “हम लोग कांग्रेस के वोटर हैं. हमला करने वाले सब बीजेपी के थे. पास के गाँव नेतड़ियाँ का ही विधायक है सुक्खाराम. हमारी ही जाति का है, मेघवाल. वह गाँव के सरपंच का साथ दे रहा है. एक बार भी मिलने, हाल जानने नहीं आया.” पुलिस ने उस खेत की कुर्की कर दी जिसमें हमारा मकान बना था, “मगर जिन्होंने हम पर हमला किया और फरार हैं उनके मकानों की कुर्की नहीं हुई.” “कायदे से तो उन्हीं फरार अभियुक्तों के घर की कुर्की होनी चाहिए थी”, डांगावास में हमारे साथ मोहल्ले के तमाम लोगों के बीच में बैठा राजस्थान पुलिस का एक वरिष्ठ सदस्य कहता है. वहीं गबरूराम मेघवाल भी बैठे हैं. इनके बेटे मदनलाल को 9-10 महीने पहले जाट लड़कों ने निशाना बनाया था. “रात तीन बजे वे आए और हॉकी से मदन के पैर तोड़ दिए.” “क्यों मारा?” मेरा प्रश्न है. “वजह कुछ नहीं थी.पिछली रात जाट लड़के शराब पीकर हल्ला कर रहे थे. मदन ने बस इतना कहा कि हल्ला न करो. यह बात उन्हें लग गई.” “आपने पुलिस में रिपोर्ट किया?” “हाँ, नामजद रिपोर्ट लिखाई. पप्पूराम खदाव, दीपूराम डांगा के नाम थे.” “पुलिस ने क्या कार्यवाही की?” गबरूराम थोड़ी देर चुप रहे फिर बोले- “कुछ नहीं किया. उलटे हमें डरा-धमका कर गांववालों ने सुलह समझौता करवा दिया. कोई मददगार नहीं हमारा.”
     हमलोग कोर कमेटी के सदस्यों से मिलना चाहते थे. यह कमेटी डांगावास के पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए बनी है. कोर कमेटी में चार सदस्य हैं- रेणु मेघवंशी, डॉ.अशोक मेघवाल, गोपालदास वाल्मीकि और क्षेत्रमणि टेपण (खटीक समाज के अध्यक्ष). कमेटी के सदस्य अजमेर में रहते हैं. हम रात हुए डांगावास से लौटे. मिलने या फोन करने का वक्त नहीं था. मैंने दिल्ली आकर रिपोर्ट तैयार करने से पहले कोर कमेटी की सर्वाधिक सक्रिय मेंबर रेणु को फोन किया. विस्तार से बात हुई. रेणु ने बताया कि कमेटी ने 18 सूत्री मांग पेश की है. जो मुआवजा दिया गया है वह सामान्य परिस्थितियों का है. “डांगावास के मृतक जहर खाकर नहीं मरे. उन्होंने अपने हाथ-पाँव खुद नहीं तोड़े. उन पर ट्रैक्टर चलाकर मारा गया है. मृतकों के आश्रितों को जो पांच लाख बासठ हज़ार और पांच सौ का चेक दिया गया है, हम मांग कर रहे हैं कि उन्हें कम से कम पचीस लाख का मुआवजा मिले. इसके साथ एक आश्रित को नौकरी दी जाए. जो जमीन अभी दबंगों के कब्जे में है उसे वास्तविक हकदारों के अधिकार में लाया जाए. दलितों की जान-माल की सुरक्षा का पुख्ता इंतजाम किया जाए...”
     रतनाराम का परिवार तो अब शायद ही कभी संभल सके. लेकिन क्या इस परिवार को न्याय मिल पाएगा? क्या अपराधी दंडविधान के दायरे में लाए जाएंगे? क्या नागौर में दलितों का उत्पीड़न रुकेगा? क्या देश में संविधान का शासन चलेगा?
संपर्क: 204, दूसरी मंजिल, T-134/1, बेगमपुर, नई दिल्ली-110017 

06 June 2015

वे कुछ सिल रहे हैं, उनका जीवन उधड़ रहा है

रिपोर्ट

TAILOR-MADE LIVES: Accidents and Discontent among the Garment Industry Workers in Udyog Vihar, Haryana

12 फरवरी 2015 को उद्योग विहार, गुड़गांव में कपड़ा फैक्ट्रियों के सैंकड़ों मज़दूर सड़कों पर आ उतरे और कुछ फैक्ट्रियों की बिल्डिंगों पर पत्थर फैंके | उन्होंने अफ़वाह सुनी थी की उनके एक साथी मज़दूर समी चंद की मौत हो गई है | बाद में पता चला कि समी चंद की मौत नहीं हुई थी, पर दो दिन पहले उसके साथ बुरी तरह मार पीट की गई थी | वह गौरव इंटरनाश्नल (प्लाट संख्या 236, उद्योग विहार, फेज़ 1) में काम करता था और 10 फरवरी को काम पर देरी से पहुँचने पर कम्पनी के अफसरों और कर्मचारियों ने उसे मिलकर पीटा था | इस घटना की खबर सभी अखबारों में छपी थी | पी.यू.डी.आर. और पर्सपेक्टिव्स ने तय किया की वह इस घटना की एक जॉइंट फैक्ट-फाइंडिंग (सम्मिलित जांच) करेंगे | टीम सामी चंद, उसकी पत्नी और भाई से मिली | साथ ही टीम सूबे सिंह (एस.एच.ओ., उद्योग विहार थाना), अमरदीप डागर (जनरल मेनेजर - ह्यूमन रिसोर्सेस और एडमिनिस्ट्रेशन, रिचा एंड कंपनी), गिरफ्तार हुए मज़दूरों में से एक के वकील, और कापसहेड़ा में रह रहे कुछ मज़दूरों से भी मिली |
फैक्ट-फाइंडिंग के दौरान, टीम को उद्योग विहार के कपड़ा उद्योग में काम कर रहे मज़दूरों के जीवन के बारे में जानने का मौका मिला | टीम ने उनके काम और रहने की परिस्थितियों को जाना | और यह जानने की कोशिश की कि इस इलाके में बार-बार हो रही हमले और हादसे की घटनाओं का इन परिस्थितियों से कोई नाता है या नहीं |
टीम की रिपोर्ट निम्नलिखित बातों को उजागर करती है -
1. 10 फरवरी की घटना में दो प्राथिमिकियाँ दर्ज़ हुई हैं - एक समी चंद और दूसरी मैनेजमेंट द्वारा | परिणामस्वरूप, गौरव इंटरनेशनल के 9 कर्मचारी गिरफ्तार हुए जो की अब बेल पर बाहर हैं | दूसरी तरफ 4 मज़दूर गिरफ्तार हुए हैं, जिनमें से 2 की बेल की अर्ज़ी नामंज़ूर कर दी गई हैं | समी चंद, जिसके साथ मार पीट की गई थी, और उसकी पत्नी और भाई को प्राथिमिकी में अफ़वाह फैलाने के लिए नामजद किया गया है |
2. 10 फरवरी की घटना कपड़ा उद्योग में घट रही अनेकों घटनाओं एवं हादसों में से एक थी | ये घटनाएं यहाँ के मज़दूरों के बीच पनप रही असंतुष्टि और काम की खराब परिस्थितियों को प्रतिबिम्बित करती हैं |
3. भारत के विभिन्न क्षेत्रों में वैश्विक ब्रैंड्स के लिए कपड़े बनाए जाते हैं | उद्योग विहार इलाके की कपड़ा यूनिट्स इनमें से एक हैं | कम से कम 1990 के दशक से मज़दूरों को 'चेन सिस्टम' या असेम्बली लाइन में काम करवाया जा रहा है जिसमें हर मज़दूर एक छोटे कार्य के लिए ज़िम्मेदार होता है, जैसे कमीज़ का कॉलर या एक बाजू सिलना आदि |
4. अधिकाँश मज़दूर उत्तर प्रदेश या बिहार से आए प्रवासी मज़दूर हैं, जिनमें अधिकतर मुसलमान हैं | 15-20 साल इस इलाके में काम करने और रहने के बावजूद इनके पास न तो राशन कार्ड हैं, और न ही वोटर कार्ड |
5. हालांकि मज़दूरों को हरियाणा सरकार की अधिसूचना के अनुसार न्यूनतम मज़दूरी मिलती है, पर इनकी तनख्वाह की क्रय-शक्ति में लगातार गिरावट हो रही है | इसका मतलब वे उस तनख्वाह से पहले से कम खरीददारी कर सकते हैं | सब दर्जियों में से सबसे विशेषाधिकृत दर्जी का भी मूल मासिक वेतन केवल 6203 रुपय है | और यह 2015 में हुए आखिरी बढ़त के बाद की स्थिति है |
6. कम वेतन की वजह से ओवरटाइम आम बात हो गया है | कईं मज़दूर हर महीने 100 घंटे तक ओवरटाइम करते हैं (जबकि कानूनी तौर पर हर तीन महीने में केवल 50 घंटे के ओवरटाइम की अनुमति है) | गौरतलब है की हाल में केंद्र द्वारा फैक्ट्रीज एक्ट (1948) में प्रस्तावित संशोधन ओवरटाइम की इस स्वीकृत सीमा को दुगना (तीन महीने में 100 घंटे) करने की बात करता है [अनुच्छेद 64 का प्रस्तावित संशोधन] |
7. फैक्ट्रियों द्वारा लगातार अलग-अलग तरीकों के प्रयोग से कार्य की तीव्रता और गति को बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है | इसके कारण कई बार सुरक्षा उपायों का पालन नहीं हो पाता है क्योंकि वे काम की गति को धीमा करते हैं | ऐसे में हादसे अक्सर होते हैं |
कपड़ा उद्योग में हादसे और मज़दूरों के क्रोध को दर्शाती घटनाएं, उनके असुरक्षित और संकटपूर्ण जीवन का प्रमाण हैं | ध्यान देने योग्य है की ये ही असुरक्षित मज़दूर भारतीय अर्थव्यवस्था के एक महत्वपूर्ण सेक्टर का हिस्सा हैं |
रिपोर्ट की प्रति इस लिंक पर उपलब्ध हैं | हार्ड कॉपी के लिए सचिव को संपर्क करें |

18 May 2015

सलवा-जुड़ुम -2 सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की अवहेलना

फोटो: साभार बीबीसी
यूपीए ने जिस सलवा-जुडुम की शुरुआत छत्तीसगढ़ राज्य सरकार के साथ मिलकर की थी. अब उसे क्रमांक में लिखने की जरूरत आन पड़ी है. उसे सलवा जुड़ुम-1 कहा जाएगा. क्योंकि बीजेपी शासन की मदद से सलवा-जुड़ुम -2 की शुरुआत करने की घोषणा स्थानीय नेताओं द्वारा कर दी गई है. इन घोषणाओं से यह भ्रम पैदा होता है कि सलवा-जुड़ुम -१ ख़त्म हो गया था. शायद उसे महेन्द्र कर्मा की मौत के बाद ख़्त्म हुआ मान लिया गया हो या यह 5 जुलाई 2011 को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति सुदर्शन रेड्डी और एसएस निज्जर द्वारा जो आदेश दिया गया था उसके बाद खत्म मान लिया गया रहा हो. आदेश में इसे पूरी तरह से बंद करने को कहा गया था और सरकार को जनसंहारो में संलिप्त बताया गया था. सलवा-जुडुम पर यह फैसला इसके शुरू होने के लगभग 6 साल बाद आया था. इन 6 सालों में हत्या, बलात्कार और आगजनी की जाने कितनी घटनाएं घटी. छः लाख लोग अस्त-व्यस्त हो गए और कई अपने गांव फिर कभी लौटकर नहीं आए. राज्य के इस अभियान के खिलाफ उनमें से कई आदिवासी माओवादियों के साथ भी जुड़े, वे लड़कियां भी जिनके भाई सलवा-जुड़ुम में शामिल थे. और उन्होंने एक मजबूत विरोध जताया. क्या फिर से सलवा-जुडुम-2 का शुरू होना इन घटनाओं का दुहराव होगा. क्या इतिहास खुद को दुहराता है. क्या यह सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की अवहेलना नहीं है. निश्चय ही यह सब सवाल जब तक हल किए जाएंगे. जब तक इन पर नागरिक समाज से आवाज़ें उठनी शुरू होंगी कई कत्लेआम कर दिए जाएंगे. जबकि यह सच है कि सलवा-जुडुम के बंद करने के आदेश के बाद यह कभी बंद नहीं हुआ था. सरकार और विपक्ष के राजनेता इस पर पूरी तरह से खामोश हैं. क्योंकि आदिवासियों के साथ होने वाले सुलूक में संसद का पक्ष-विपक्ष एक साथ खड़ा है. भाकपा माओवादी ने इस पर अपनी प्रेस विज्ञप्ति जारी की है जिसे यहां देखा जा सकता है.  विज्ञप्ति: हिन्दी अंग्रेजी       

05 May 2015

सोन का पानी लाल है...भाग-3

अकलू चेरो की गवाही
(आंबेडकर जयन्‍ती पर कनहर में हुए गोलीकांड का अविकल विवरण)


अभिषेक श्रीवास्‍तव । सोनभद्र से लौटकर

''... उस दिन हम लोग तीन साढ़े तीन सौ रहा होगा... महिला और पुरुष। पहले धरना में जुट के न हम लोग यहां आए थे। उसके बाद जब वहां आए तो कोई फोन के माध्‍यम से कह दिया। अब नाम नहीं बता पाएंगे... सब लगे हैं जासूसी में... उनको कमीशन मिल रहा है न भाई। तो कोई फोन के माध्‍यम से कह दिया उनको। अब गाड़ी आ के खड़ा हो गयी तुरंत पुलिस की... जहां बाउंड्री किया है। हम कहे देखो अब नहीं सपोर्ट कर पाओगे... गाड़ी आ गयी। पहिला गाड़ी आया, दूसरा आया, फिर तीसरा आया। तीन गाड़ी आया। इतना कहते हुए सारे लोग चले गए धरनास्‍थल से। जब आए हैं तो हम जो हैं मोर्चा पर रहे। हम सोचा कि मोर्चा पर नहीं रहेंगे तो कोई संभाल नहीं पाएगा। मोर्चा पर रहने के वजह से यह घटना मेरे साथ घटी। वहां से जब चले हैं, यहां आते तक पुलिस वगैरह भी, पीएसी के लोग भी भाई, कोई अभी लाइट्रिन-बाथरूम नहीं नाश्‍ता पानी नहीं... छह बजे क बाते रहा। तब तक से वहां रोकना शुरू... हम कहे कोई मत मानना, एकदम चलते रहना, हम हैं न! भाई बात होगा तो बात हम करेंगे... आप लोग सुनना, पास करना- हां, ठीक कह रहे हैं... ऐसे करना। तब से वहां से रोकने का समय ही नहीं मिला उन लोगों को। तब फिर पूछते हुए गाड़ी से उतर गए। फिर कुछ लोग गाड़ी स्‍टार्ट किए, बीच में आ गए। हम कहे अगर बीच में गाड़ी अगर हॉर्न मारेगा तो तुम लोग चक्‍का जाम करे रहना, रुकना नहीं, जाने नहीं देना। ऐसा ही किया लोग। आगे-आगे हम और महिला-पुरुष चलते रहे।

अब जो है डीएम साहब उधर से चले। हमको मौका नहीं दिए। उतर के चले हैं डंडा पटकते से चले हैं। इसके बाद गाली-गलौज देने लगे, एकाध महिलाओं पर डंडा चला दिए। डीएम रहे, कोतवाल रहे, इंस्‍पेक्‍टर साहब रहे... मोर्चे पर। मौके से रहे डीएम साहब, दरोगा रहे कपिल यादव, कोतवाल रहे। इसके बाद में जो है... जब उन लोग गोली चलाया हमारे ऊपर... अचानक से... ऊ लोग जान रहे थे कि रस्‍ता हम लोग देबे नहीं करेंगे। माइक'वाइक का कहां समय था उन लोग के पास... वो लोग बोले, जाना नहीं है, चलो... लाउडस्‍पीकर पर कोई चेतावनी नहीं दिए। ओरिजिनल गोली मार दिया... ऐसा हमको मालूम होता न कि गोली मारेंगे तो ऐसा घटना होबे नहीं करता... हमको मारकर के अपने हाथे में गोली मार लिए हैं और कह दिए कि ये मारे हैं... बताइए... ई कपिलदेव। इन लोग का जो पीएसी गाड़ी है... जो बस वाली, बीचे में रोक दिया। ऊ लोग सोचे कि बीच में बसवे लगा दो त कइसे जनता क्रास करेगा। त जनता जब पहिले से सतर्क है न... कुछ उधर से पत्‍थरबाजी पीएसी की ओर से तो कुछ इधरो से चलने लगा। गडि़यो पर मार दिया, सिसवा सब फूट फाट गया। उन लोग कहे कि ये प्राइवेट बस पर क्‍यों मार दिया। हम कहे आपे लोग क गडि़या है... अंदाजा है... बात कर रहे हैं। उस समय लगभग पचास-पचपन के आसपास पुलिस रहे होंगे। कोई आदेश नहीं था ऊपर से... कुच्‍छ नहीं, सब अपना मनमानी किया।

वो तो हमको निगाह चढ़ाया था 23 मार्च को भगत सिंह के दिवस पर... हम लोग हर साल मनाते हैं। उसी दिन हमको निगाह चढ़ाया था। हम भी समझ गए थे। त हम लोग कहे कि हम लोग का जलूस उठेगा... पूरा मार्केट बाजार होते हुए जलूस उठेगा और धरने स्‍थल पर भगत सिंह क चित्र टांग टूंग के हम लोग अगरबत्‍ती जलाएंगे, फिर जनता घर जाएगी। 

करीब 250 जनता त एकदम चलते रहा... 100 जनता करीब पीछे रहा, त फुटने लगा। देखा पीछे जब त एतना जलता फुटने लगा। गोली लगने के बावजूद हम कहा कि ठीक कर रहा है तुम लोग न, भाग जाओ। फिर कोई कहा कि भगो मत, जो हुआ होना था, हो गया। फिर सब वापस आ गया। वो जो अपने को गोली लगाए हैं न... तो हम लोग त पीछे हैं, वो लोग क रस्‍ता अइसे है। हम लोग के आने से पहले ऊ लोग यहां आकर के हास्पिटल में दुद्धी दवा-इलाज कराना शुरू कर दिए। ये त हम लोग फोन किए, तब मीडिया वाला अखबार लत्‍ता पहुंचे। दो साथी हमको ले जाने को तैयार हो गए- एक लक्ष्‍मण और अशर्फी।*** ऊ लोग चल दिए। गाड़ी आया। उसमें हमको बैठाए हैं। उसके बाद दुद्धी आए। उसके बाद महेशानंद क लड़का गौरव... उनको पता चल गया। ऊ दौड़कर आए हैं। फिर तुरंत कराए... फिर लिखने-पढ़ने का काम, दवा करने का काम कराए। कहा कि पानी बोतल सब कर देते हैं लेकिन इनको हम यहां इनको भर्ती नहीं कर पाएंगे क्‍योंकि गोली लगा है... सरकारी अस्‍पताल में। त वहां से रेफर होके आ गए रॉबर्ट्सगंज। तो अशर्फी और लक्ष्‍मण जो बोले हैं, ऊ लोग भी साथ आए। मीडिया वाला को पता चल गया होगा, तो वहां ऊ लोग भी आए। बातचीत किए। फिर इहों से रेफर हुआ... बोला यहां भी नहीं होगा। लास्‍ट में यहां बीएचयू पहुंचे हैं बनारस में।

जब यहां बस खड़ा हुई है तो ये हुआ कि हम लोग चलेंगे घर इनको भर्ती करा के... त कौन कौन रहेगा- अशर्फी और लक्ष्‍मण। अब देखिए इनकी धोखा। हमारा आदमी जो रेगुलर रहने वाला, उनको चाय के नाम पर लेकर ऊ चले गए। ऊ लोग दूनो लापता हैं। हमको भी नहीं पता कहां हैं। वहां से आदेश है इन लोग को दिक्‍कत नहीं होना चाहिए। बताइए, जो हमारा दवाई, इलाज, पानी करता, उसको उठा ले गया। दूनों गायब हैं। कोई हमको कहा कि होटल में हैं। गांव नहीं पहुंचे। उसी दिन से गायब हैं... मंगलवार को।

इंस्‍पेक्‍टर साहब आएंगे अभी। कल से यहां पुलिस भी दो आ रहे हैं। इंस्‍पेक्‍टर साहब आए थे, पूछे कि दवा ठीक हो रहा है। वो अनाप-शनाप नहीं बोलते। कोई धमकी नहीं दिए हैं। सुन्‍दरी के हाल बहुत गंभीर है अभी... हमको बहुत अखर रहा है। अभी हम होते वहां तो... उस दिन 20 या 15 लोग घायल हुए थे। तुरंते दुद्धिए में उन लोग का दवाई हुआ। महिला लोग थे। डॉक्‍टर साहब हमसे पूछे कि ठीक हैं तो हम बोले कि थोड़ा प्रॉब्‍लम है। वो बोले कि जब कहोगे तब छोड़ देंगे।

कल से जैसे पुलिस आ रहा है, तो हमारे दिमाग में आ रहा है कि शायद पुलिस सोचता होगा कि हमको जइसे छोड़ेंगे तो वो पकड़ लेंगे। ऐसा हमको लग रहा है। हमको डरने की बात नहीं है।'' 

(19 अप्रैल, सुबह साढ़े आठ बजे)



***(सोनभद्र के पुलिस अधीक्षक शिवशंकर यादव ने 20 अप्रैल को बताया कि लक्ष्‍मण और अशर्फी को गिरफ्तार कर के मिर्जापुर की जेल में रखा गया है और उनके ऊपर सरकारी काम में बाधा डालने, बलवा करने और पुलिस पर हमला करने के आरोप हैं। उन्‍हें कहां से और कब उठाया गया, इसकी जानकारी नहीं दी गयी।) 




सोन का पानी लाल है...भाग-2

अभिषेक श्रीवास्‍तव । सोनभद्र से लौटकर

कनहर बांध के मामले में कुछ तो है जो छुपाया जा रहा है। कुछ है जो उजागर तो हो गया है लेकिन शीशे की तरह साफ़ नहीं है। एक सच उनका है जिनके घर डूब जाएंगे। इन्‍हें बदले में क्‍या मिलेगा, इस पर सवाल है। यह सवाल हमेशा से रहा है। भाखड़ा-नंगल से लेकर रिहंद तक एक से ज्‍यादा बार विस्‍थापित होने वाले परिवारों को साठ साल में कायदे से उचित मुआवज़ा नहीं मिला। नर्मदा की लड़ाई तीस साल से हमारे सामने है। बहरहाल, दूसरा सच उनका है जिनके घर नहीं डूबेंगे। जिनके घर डूब रहे हैं, वह आदिवासी ग्रामीण है। जिनके नहीं डूब रहे, वह मोटे तौर पर गैर-आदिवासी और शहरी है। चूंकि इस तबके को बांध बनने से कोई नुकसान नहीं है, लिहाज़ा इस तबके को बांध बनने तक कुछ न कुछ फायदा ज़रूर है। जब 2800 करोड़ का एक बांध बनता है तो उसमें बहुत सी चीज़ों की ज़रूरत होती है। किसी का डम्‍पर चलता है। कोई ट्रक चलवाता है। कोई रोड़ी देता है। कोई बालू और कंक्रीट देता है। कोई मजदूर सप्‍लाई करता है। किसी का गेस्‍ट हाउस चमक जाता है। एक बांध के इर्द-गिर्द एक समूची परजीवी अर्थव्‍यवस्‍था खड़ी हो सकती है। इसका मतलब कि बांध से नुकसान झेलने वाले और उससे लाभ उठाने वाले वर्ग वास्‍तव में परस्‍पर शत्रुवत स्थिति में होते हैं। इन दोनों से इतर एक तीसरा पक्ष भी है। इसका अपना सच है। यह सच उन लोगों से जुड़ा है जो कनहर बांध के खिलाफ़ आंदोलन का नेतृत्‍व कर रहे हैं। ये वे लोग हैं जिनका बांध बनने से कोई निजी नुकसान तो नहीं हो रहा, लेकिन फिर भी वे बांध के खिलाफ और आदिवासी ग्रामीणों के साथ खड़े माने जाते हैं। रोमा इसी पक्ष की नुमाइंदगी करती हैं, लेकिन कनहर बांध के संबंध में उनकी सक्रियता बहुत पुरानी नहीं मानी जाती है।

बताते हैं कि कनहर नदी को बचाने के लिए बांध के विरोध में आंदोलन का आरंभ गांधीवादी कार्यकर्ता महेशानंद ने आज से पंद्रह साल पहले किया था। उनके लोग आज भी गांवों में आदिवासियों के बीच सक्रिय हैं लेकिन महेशानंद समूचे परिदृश्‍य से नदारद हैं। दिलचस्‍प बात यह है कि बांध-विरोधी ग्रामीणों से लेकर बांधप्रेमी प्रशासन तक महेशानंद के बारे में एक ही राय रखते हैं जो अकसर एक ही जैसे वाक्‍य में भी ज़ाहिर होती है, ''वो तो भाग गया।'' 18 अप्रैल की सुबह जब सोते हुए ग्रामीणों पर लाठियां बरसायी गयीं, उसके कुछ देर बाद सुन्‍दरी गांव में आंदोलन का महिला नेतृत्‍व मानी जाने वाली सुकालो ने फोन पर बताया था, ''यहां कोई लीडर मौजूद नहीं था। महेशानंद तो भाग गया है। कहीं छुपा हुआ है।'' भीसुर गांव के नौजवान शिक्षक उमेश प्रसाद कहते हैं, ''सब लीडर फ़रार हैं। गम्‍भीरा, शिवप्रसाद, फणीश्‍वर, चंद्रमणि, विश्‍वनाथ- सब फ़रार हैं। इसीलिए जनता परेशान है। पहले ये लोग महेशानंद के ग्रुप के थे, बाद में इसमें रोमा घुस गयीं।'' य‍ह पूछने पर कि यहां के लोग अपने आंदोलन का नेता किसे मानते हैं, उन्‍होंने कहा, ''यहां के लोग तो गम्‍भीराजी को ही अपना नेता मानते हैं, लेकिन उनको फरार मानकर ही चलिए। जब से आंदोलन बदरंग हुआ, रामप्रताप यादव जैसे कुछ लोग बीच में आकर समझौता कर लिए। महेशानंद भी समझौते में चले गए हैं। रोमाजी तो यहां हइये नहीं हैं, बाकी आंदोलन तो उन्‍हीं का है। उन्‍हीं के लोग यहां लाठी खा रहे हैं।''

आंदोलन के नेतृत्‍व के बारे में सवाल पूछने पर पुलिस अधीक्षक शिवशंकर यादव कहते हैं, ''महेशानंद आंदोलन छोड़कर भाग गए हैं। उन्‍होंने मान लिया है कि उनके हाथ में अब कुछ भी नहीं है। उनका कहना है कि बस उनके खिलाफ मुकदमा नहीं होना चाहिए। उनके जाने के बाद रोमाजी ने कब्‍ज़ा कर लिया है।'' आंदोलन पर ''कब्‍ज़े'' वाली बात इसलिए नहीं जमती क्‍योंकि लोग अब भी इसे रोमा का आंदोलन मानते हैं। ऐसा लगता है कि प्रशासन को दिक्‍कत दूसरी वजहों से है। यादव कहते हैं, ''महेशानंद बांध क्षेत्र से बाहर के इलाके में शांतिपूर्ण आंदोलन चलाते थे। इससे हमें कोई दिक्‍कत नहीं थी।'' प्रशासन को दिक्‍कत रोमा के आने से हुई। जिलाधिकारी संजय कुमार कहते हैं, ''रोमाजी बहुत अडि़यल हैं।'' वे इसके लिए ''पिग-हेडेड'' शब्‍द का इस्‍तेमाल करते हैं। वे कहते हैं, ''वे कहती हैं कि हमें बात करनी ही नहीं है... आप हमें गोली मार दीजिए, हम बांध नहीं बनने देंगे। उन्‍होंने संवाद की कोई जगह छोड़ी ही नहीं है। आखिर हम कहां जाएं?''

माना जाता है कि रोमा का यह समझौता नहीं करने वाला रवैया ही जनता को और महेशानंद के पुराने लोगों को उनके पाले में खींच लाया है। इसके अलावा महेशानंद के आंदोलन से हट जाने का लाभ कुछ दूसरे किस्‍म के समूहों ने भी उठाया है। मसलन, पीयूसीएल की राज्‍य इकाई से लेकर भाकपा(माले)-लिबरेशन और आज़ादी बचाओ आंदोलन के लोग भी अचानक इस आंदोलन में सक्रिय हो गए हैं। पड़ोस के सिंगरौली में महान के जंगल और नदी को बचाने के लिए अंतरराष्‍ट्रीय संस्‍था ग्रीनपीस के सहयोग से जिस महान संघर्ष समिति का गठन हुआ था, वह भी अब सोनभद्र के आंदोलन में जुड़ गयी है। ये सभी धड़े रोमा को आंदोलन का असली नेता मानते हैं। सबसे बड़ी विडंबना यह रही कि 14 और 18 अप्रैल को जब कनहर के आदिवासियों पर पुलिस का कहर टूटा, तब और उसके बाद भी रोमा वहां नहीं मौजूद रहीं क्‍योंकि उनके आते ही उन्‍हें गिरफ्तार कर लिया जाता। लोग इस बात को भी समझते हैं।

बांध के विरोध में अलग-अलग संगठनों का इतना बड़ा गठजोड़ बनने के जवाब में बांध समर्थक लोगों ने भी आंदोलन खड़ा कर दिया है। इस आंदोलन का नाम है ''बांध बनाओ, हरियाली लाओ''। दिलचस्‍प है कि इस आंदोलन में भाकपा(माले) के कुछ पुराने लोग शामिल हैं जिनमें अधिवक्‍ता प्रभु सिंह प्रमुख हैं। भीसुर गांव के रामप्रकाश कहते हैं, ''माले वाले भी हक के लिए ही लगे हुए हैं, लेकिन इनमें से कुछ लोग हैं जो बिचौलिये का काम कर रहे हैं। वे इधर भी हैं और उधर भी हैं।'' माले के एक स्‍थानीय नेता कहते हैं, ''हम लोग यहां स्थिति को ब‍हुत संभालने की कोशिश किए। रोमा तो हम लोगों के बाद आयीं और बने-बनाए आंदोलन में घुस गयीं।''

इस मामले में सबसे दिलचस्‍प पहलू यहां की विधायक रूबी प्रसाद से जुड़ा है। स्थानीय प्रशासन ने विधायक रूबी प्रसाद की अध्यक्षता में पुनर्वास एवं पुनर्स्थापना के मसले पर 16 जून 2014 को ग्रामीणों की एक सभा बुलायी। तहलका में प्रकाशित ''कनहर कथा'' में अंशु मालवीय लिखते हैं, ''इस सभा में हजारों लोग मौजूद थे। मंच पर आकर सभी ग्रामीण आदिवासियों ने कनहर बांध के विरोध में बात रखी। यहां वक्ताओं में वे ग्राम प्रधान भी मौजूद थे जिन्होंने बांध के विरोध में प्रस्ताव पारित कर रखा है। अंत में मुख्यमंत्री को संबोधित एक ज्ञापन भी प्रशासन को सौंपा गया, लेकिन जब इस सभा की कार्यवाही की रपट प्रधानों के पास पहुंची तो वे चकित रह गए। इसमें सिर्फ सरकारी अधिकारी एवं विधायक के वक्तव्य थे। जनता के विरोध को उसमें जगह ही नहीं दी गई थी। इससे पता चलता है कि प्रशासन एवं सरकार एक कृत्रिम सहमति बनाने की कोशिश कर रही है।''

रूबी प्रसाद की सभा में उठी ग्रामीणों की बांध के विरोध में आवाज़ों के चलते कई लोगों को यह भ्रम हुआ था कि विधायक खुद बांध के विरोध में हैं। पुलिस अधीक्षक यादव इसे साफ़ करते हुए कहते हैं कि रूबी प्रसाद तो बांध के समर्थन में हैं। लोगों को भ्रम है। विधायक ने खुद यादव से कहा था कि ''अगर आप खाली नहीं करवा पा रहे (बांध स्‍थल को प्रदर्शनकारियों से) तो कहिए हम करवा दें।'' यादव दावा करते हैं, ''सभी पार्टियों के लोग बांध के समर्थन में हैं। एक सौ एक परसेंट लोग चाहते हैं कि बांध बने।''

एक सौ एक परसेंट लोगों से यादव का आशय उन लोगों से है जिन्‍हें बांध के बनने से कोई नुकसान नहीं हो रहा। इसमें सरकार, प्रशासन, गैर-आदिवासी शहरी वर्ग और हर राजनीतिक दल शामिल है। ये सब बांध के समर्थन में एकजुट हैं, लिहाजा आदिवासी ग्रामीण बिलकुल अकेले पड़ गए हैं। कुल 22000 के आसपास इन आदिवासियों को कोई भी मनुष्‍यों के बीच नहीं गिन रहा। यह संख्‍या सिर्फ उनकी है जो उत्‍तर प्रदेश की सीमा में रहते हैं। कनहर की डूब में आने वाले छत्‍तीसगढ़ और झारखण्‍ड के गांवों को भी गिन लिया जाए तो 101 परसेंट का बर्बर चेहरा और साफ हो जाएगा। गोलीकांड के बाद कनहर के आदिवासियों की आखिरी उम्‍मीद रोमा, स्‍थानीय नेता गम्‍भीरा और शिवप्रसाद पर टिकी थी। रोमा मौके पर पहुंच पाने में असमर्थ हैं क्‍योंकि उन्‍हें जिला बदर कर दिया गया है जबकि गम्‍भीरा को 20 अप्रैल की रात इलाहाबाद से गिरफ्तार कर लिया गया जब वे पीयूसीएल के वकील रविकिरण जैन के घर गए हुए थे। गम्‍भीरा को वहां से सोनभद्र लाकर पूछताछ की गई और बाद में जेल भेज दिया गया।

बांध विरोधी आंदोलन में सक्रिय भीसुर के एक नौजवान दुखी मन से कहते हैं, ''आंदोलन की दिशा टूटने के कगार पर जा चुकी है। जनता बहुत चोटिल हो चुकी है। आधे लोग धरने से उठकर चले गए थे। उन्‍हें किसी तरह वापस लाया गया है। पूरा इलाका धारा 144 लगाकर सील कर दिया गया है। जैसे ही लोग जमा होते हैं, कोई न कोई पुलिस की मुखबिरी कर देता है।''

इस शहर में मुखबिरों की कमी नहीं है। हर आदमी एक संभावित मुखबिर है। सोनभद्र का शहरी समाज बिलकुल सिंगरौली की तर्ज पर विकसित हो रहा है जहां हर आदमी हर दूसरे आदमी को मुखबिर मानता है, हर कोई हर किसी पर अविश्‍वास करता है और छोटी-छोटी टुच्‍ची आकांक्षाओं व हितों का नतीजा अंतत: पुलिस की लाठी और गोली के रूप में दिखायी देता है जिसे ''लॉ ऑफ दि लैंड'' कह कर जायज़ ठहराया जाता है। ऐसा समाज बनाने में स्‍थानीय मीडिया की भूमिका सबसे ज्‍यादा नज़र आती है। सोनभद्र के प्रमुख अख़बारों में खबरों का प्रमुख स्रोत पुलिस और प्रशासन हैं। पत्रकार सच्‍चाई को सामने नहीं लाने के लिए कटिबद्ध हैं क्‍योंकि उनके अपने हित झूठ के कारोबार के साथ जुड़े हुए हैं। यही कारण है कि 14 और 18 अप्रैल की घटना के बाद आदिवासी ग्रामीणों के साथ हुई नाइंसाफी की ख़बर को इस कदर दबाया गया कि उसे सामने लाने के लिए दिल्‍ली से एक तथ्‍यान्‍वेषी दल को यहां आना पड़ा, जिसमें यह लेखक भी शामिल था।

इस तथ्‍यान्‍वेषी दल में कुल छह लोग थे- भाकपा(माले)-लिबरेशन की कविता कृष्‍णन, ग्रीनपीस की प्रिया पिल्‍लई, स्‍वतंत्र स्‍त्री अध्रिकार कार्यकर्ता पूर्णिमा गुप्‍ता, स्‍वतंत्र पत्रकार रजनीश, विंध्‍य बचाओ अभियान से देबोदित्‍य सिन्‍हा और यह लेखक। साथ में बनारस से पत्रकार सिद्धांत मोहन भी जुड़ गए थे। गोलकांड की सच्‍चाई को दबाने के लिए स्‍थानीय प्रशासन किस हद तक जा सकता है, उसका पता इस दल के सामने खड़ी की गयी मुश्किलों और इसके उत्‍पीड़न से लगता है। इस दल ने 19 अप्रैल की सुबह बनारस में भर्ती अकलू चेरो से मुलाकात कर के उसका बयान दर्ज किया, जिसके सीने में 14 को गोली लगी थी। इसके बाद शुरू हुआ पुलिसिया निगरानी का सिलसिला, जो अगले दिन वापसी तक लगातार जारी रहा।

बनारस से रॉबर्ट्सगंज के बीच 19 अप्रैल को कड़ा पहरा था। हमारी गाड़ी को रास्‍ते में तीन बार रोकर जांचा गया। किसी तरह सूरज ढलते-ढलते दुद्धी के गांवों में जब दल ने प्रवेश किया, तो उसे बिलकुल अंदाज़ा नहीं था कि आगे क्‍या होने वाला है। कोरची से कुछ दूरी पर बघाड़ू नाम का एक गांव है। यह गांव आधा डूब में आता है। यहीं पर शाम सात बजे के आसपास दल के सदस्‍य एक चाय की दुकान के बाहर बैठकर सुस्‍ता रहे थे कि जंगल के घुप्‍प अंधेरे में अचानक पुलिस की कुछ गाडि़यां आकर रुकीं। अचानक कुछ पुलिसवाले एक सादे कपड़े वाले अफसर के नेतृत्‍व में नीचे उतरे और उन्‍होंने पूछताछ शुरू कर दी। सादे कपड़े वाले अफसर ने अपना परिचय नहीं बताया, अलबत्‍ता उसकी गाड़ी पर उपजिला मजिस्‍ट्रेट अवश्‍य लिखा हुआ था। पहले पूछा गया कि आप यहां क्‍या कर रहे हैं। फिर कहा गया कि यह नक्‍सली इलाका है और वे हमारी सुरक्षा करने आए हैं। उसके बाद कविता कृष्‍णन पर मोबाइल से रिकॉर्डिंग करने का आरोप लगाते हुए सादे कपड़े वाले अफसर ने कहा, ''ज्‍यादा होशियारी मत दिखाइए वरना बेइज्‍जत हो जाएंगी।'' ऐसा कहते हुए उसने कविता औश्र दल की महिला सदस्‍यों के साथ बदतमीज़ी की और मोबाइल छीनने की कोशिश की। दल के सदस्‍य देबोदित्‍य सिन्‍हा ने जब इस कार्रवाई पर आपत्ति जतायी तो अफसर ने कहा, ''यही नक्‍सली है। इसे अंदर करो।'' कुछ हस्‍तक्षेप के बाद जब यह मामला ठंडा हुआ तो पुलिस ने दल के ड्राइवर को पकड़कर उसे धमकाना शुरू किया। बड़ी मुश्किल से उसे छुड़ाया गया तो कथित मजिस्‍ट्रेट ने सामान की तलाशी के आदेश दे डाले। एसडीएम की मौजूदगी में पुलिसवालों ने एक-एक कर के सबका सामान जांचना शुरू किया। जब दल की महिलाओं ने पुरुषों द्वारा महिलाओं के सामान की जांच पर आपत्ति जतायी, तब महिला सिपाहियों को बुलाने के लिए वायरलेस करने की बात कही गयी लेकिन अंत तक कोई नहीं आया।

छत्तीसगढ़ की सीमा से महज कुछ किलोमीटर की दूरी पर अंधेरे जंगल में पुलिस का व्‍यवहार ऐसा था जैसे आतंकवादियों के साथ किया जाता है। तकरीबन एक घंटे तक पुलिस ने दल को हिरासत में रखा। कथित मजिस्‍ट्रेट का आग्रह था कि दल को दुद्धी थाने ले जाकर पूछताछ की जाए। जब दल ने जिलाधिकारी को भेजे पत्र की प्रति दिखायी, तब अचानक खुद को मजिस्‍ट्रेट कह रहा सादे कपड़ों वाला शख्‍स कहीं गायब हो गया और एक सभ्‍य पुलिस इंस्‍पेक्‍टर जाने कहां से आ गया। इस दौरान घटना की सूचना बड़े पैमाने पर फोन और एसएमएस से फैलायी जा चुकी थी। कुछ पत्रकारों ने सोनभद्र के डीएम को फोन भी कर दिया था। इस दबाव में इंस्‍पेक्‍टर ने माना कि प्रशासनिक स्‍तर पर दल के आने की सूचना को निचले अधिकारियों तक नहीं भेजा गया था और यह एक चूक है। इसके बावजूद दल को गांव में रुकने से मना किया गया और नक्‍सलियों सुरक्षा के नाम पर खदेड़ कर दुद्धी तहसील तक ले आया गया।

बाज़ार में पुलिस की गाडि़यां नदारद हो गयीं और अचानक खुद को एसडीएम बताने वाले एक और अधेड़ शख्‍स सादे कपड़ों में अवतरित हुए। आखिर जंगल में मिला खुद को मजिस्‍ट्रेट कहने वाला वह शख्‍स कौन था? इसका पता अब तक नहीं चल सका है। बार-बार कहने पर जिलाधिकारी ने भी उसकी पहचान उजागर नहीं की। बहरहाल, रात में दुद्धी के जिस डीआर पैलेस नामक होटल में कमरा देखा गया, उसने भोजन के बाद कमरा देने से इनकार कर दिया। उसके ऊपर संभवत: कोई दबाव था, जिसका उद्घाटन सवेरे हुआ। रात में खुद को होटल का मालिक बताने वाले मनोज जायसवाल नाम के व्‍यक्ति से बातचीत कर के रुकने का इंतज़ाम हुआ लेकिन रात भर होटल की गश्‍त लगने की आवाज़ें आती रहीं। सवेरे पता चला कि रात में होटल में मौजूद कर्मचारी के पास थाने से दो बार फोन आए थे और पुलिसवाले भी वहां पहुंचे थे।

अगले दिन सुबह होटल से बाहर निकलते ही दल को पुलिस ने घेर लिया। डीएस यादव नाम के पुलिसकर्मी ने दल के ऊपर लौट जाने का भारी दबाव बनाया। यह दल जब घायलों से मिलने अस्‍पताल पहुंचा तो वहां पुलिस ने भीतर जाने से रोकते हुए धारा 144 का हवाला दिया। डीएम से फोन पर बातचीत के बाद भीतर जाने की अनुमति तो मिली, लेकिन असली दृश्‍य अभी बाकी था। थोड़ी देर बाद एक दो सितारा पुलिसकर्मी देवेश मौर्य एक उत्‍तेजित भीड़ को लेकर विजयी भाव में अस्‍पताल पहुंचे। यह भीड़ भड़काऊ नारे लगा रही थी और किसी तरह दल को बाहर निकालने पर आमादा थी। ''एनजीओ वापस जाओ'', ''विकास विरोधी मुर्दाबाद'', ''आइएसआइ एजेंट वापस जाओ'', ''मारो जुत्‍ता तान के'', आदि नारे लगाने वाले करीब डेढ़ सौ लोग थे जिन्‍होंने अस्‍पताल को घेर लिया था। पुलिस वालों में इस भीड़ में दोगुनप उत्‍साह आ गया था। संदीप कुमार राय नाम के एक पुलिसकर्मी ने पत्रकार सिद्धांत मोहन से चुटकी लेते हुए कहा, ''सबका समय आता है। कल तक आपका था, आज हमारा समय है।'' यह भीड़ पूरी तरह पुलिस की ओर से प्रायोजित थी जिसमें बाज़ार के लोग, व्‍यापारी, वकील और ठेकेदार शामिल थे जो बांध समर्थक हैं।

एक बार फिर डीएम के हस्‍तक्षेप के बाद पुलिस ने उग्र भीड़ को पीछे धकेला और तकरीबन दो घंटे तक दल को अस्‍पताल में बंधक बनाए रखने के बाद उसकी गाड़ी तक पुलिस संरक्षा में छोड़ा गया। इसके बावजूद एसडीएम की जिस गाड़ी में दल के सदस्‍यों को उनके होटल तक ले जाया गया, उस पर पीछे से जूते और चप्‍पल फेंके गए। दो बजे रॉबर्ट्सगंज में डीएम से बैठक थी। वहां जाते वक्‍त हाथीनाला पर एक बार फिर दल को पुलिस ने रोका और सबके नाम लिखवाए। डीएम से इन घटनाओं की बाबत पूछे जाने पर संक्षिप्‍त-सा जवाब मिला, ''अगर अभद्रता हुई है तो आइ फील सॉरी फॉर इट।''

पुलिस अधीक्षक का कहना था कि ''आपको इलाके में चुपके-चुपके नहीं जाना चाहिए था।'' जब ईमेल से भेजे गए पत्र का हवाला दिया गया तो यादव बोले, ''ईमेल की क्‍या विश्‍वसनीयता है?'' जांच दल की महिलाओं के साथ हुए दुर्व्‍यवहार पर यादव ने कहा, ''अगर आपने बता दिया होता कि पत्रकार हैं तो कोई दिक्‍कत नहीं होती।'' यह पूछे जाने पर कि क्‍या इसका मतलब यह माना जाए कि आपको सामाजिक कार्यकर्ताओं से दिक्‍कत है, तो यादव ने सामाजिक कार्यकर्ताओं के प्रति खुले तौर पर अपना विद्वेष जाहिर किया। बाद में निजी बातचीत में यादव ने कहा, ''हमें गुप्‍तचर विभाग से सूचना मिली थी कि दिल्‍ली से जो टीम आ रही है, वह गांवों में जाकर लोगों को संगठित करने का काम करेगी।''
जांच दल से मुलाकात के बाद 20 अप्रैल की देर शाम जिलाधिकारी संजय कुमार ने एक प्रेस नोट जारी किया। उसमें लिखा है:
''वाकई 'कनहर सिंचाई परियोजना' के विस्थापितों को सभी अनुमन्य सुविधाएं दी जाएंगी। किसी विस्थापित को विस्थापन राशि के लिए भटकना नहीं होगा। डूब क्षेत्र के सुन्दरी, भीसुर, कोरकी, कुदरी, बड़खोरा आदि गांवों में कैम्प लगाकर दस दिनों के अन्दर चेक वितरण का कार्य किया जाएगा।'' उक्त बातें जिलाधिकारी श्री संजय कुमार ने कनहर सिंचाई परियोजना के डूब के गांव सुन्दरी के प्राथमिक विद्यालय प्रांगण में वरिष्‍ठ सपा नेता इस्तयाक अहमद की पहल पर कनहर विस्थापितों के साथ खुली बातचीत/बैठक में कहीं।
''जिलाधिकारी श्री कुमार ने मौके पर मौजूद राबर्ट्सगंजजिलाध्यक्ष समाजवादी पार्टी अविनाश कुशवाहा, जिला महासचिव विजय यादव, विधानसभा अध्यक्ष दुद्धी श्री अवध नारायण यादव, जुबैर आलम, डा. लवकुश प्रजापति, तकरार अहमद, नूरूल हक सदर, चन्द्रमणि, ग्राम प्रधान कुदरी इस्लाउद्दीन, ग्राम प्रधान सुन्दरी राम प्रसाद, प्रधान कोरची रमेश कुमार, प्रधान भीसुर परमेश्‍वर यादव के सार्थक प्रयासों की तारीफ करते हुए सारा श्रेय ग्रामीणों/विस्थापितों को दिया।''

अगले दिन इस प्रेस नोट को सारे स्‍थानीय अखबारों ने प्रमुखता से छापा, लेकिन किसी ने भी यह सवाल पूछने की ज़हमत नहीं उठायी कि जिलाधिकारी की इस बैठक में समाजवादी पार्टी के वे तमाम नेता क्‍यों मौजूद थे जो उसी सुबह दुद्धी अस्‍पताल के बाहर जांच दल के खिलाफ नारा लगाते और गाली देते पाए गए थे। 22 अप्रैल के अखबारों में यह ख़बर तो छपी कि सुन्‍दरी गांव में सर्वे का काम शुरू हो गया है, लेकिन किसी ने भी यह सूचना मिलने के बावजूद छापने की ज़हमत नहीं उठायी कि अकलू के साथी लक्ष्‍मण और अशर्फी जिन्‍हें 14 के बाद से लापता बताया जा रहा था, वे मिर्जापुर जेल में हैं। अलबत्‍ता जो खबरें छापी गयीं उनका शीर्षक कुछ ऐसे था:

1. कनहर बांध के निर्माण ने अब पकड़ी रफ्तार (हिन्‍दुस्‍तान)
2. कनहर परियोजना मार्च 2018 तक होगी पूरी (हिन्‍दुस्‍तान)
3. पुलिस पर हमले का मुख्‍य आरोपी गिरफ्तार (दैनिक जागरण, गम्‍भीरा प्रसाद की खबर)
4. सुंदरी गांव में शुरू हुआ सर्वे (दैनिक जागरण)
5. एसडीएम, कोतवाल का हमलावर बंदी (अमर उजाला, गम्‍भीरा प्रसाद की खबर)

इनके अलावा एक अप्रत्‍याशित खबर सभी अखबारों के सोनभद्र संस्‍करण में 22 अप्रैल को प्रकाशित हुई:
 ''खनन हादसे में दो खान अफसरों समेत आठ फंसे''
 यह खबर 27 फरवरी 2012 को बिल्‍ली-मारकुंडी खनन क्षेत्र में हुए एक हादसे की मजिस्‍ट्रेटी जांच से जुड़ी है जिसमें 11 मजदूर मारे गए थे। लंबे समय से इाकी जांच चल रही थी लेकिन अचानक इस जांच को पूरा कर के जिलाधिकारी संजय कुमार ने रिपोर्ट पेश कर दी जिसमें दो खन अधिकारी, एक डीएफओ और आठ लोगों को दोषी बना दिया गया है। स्‍थानीय अखबार ''वनांचल एक्‍सप्रेस'' के संपादक शिवदास का कहना है, ''यह रिपोर्ट इसलिए लायी गयी है ताकि कनहर में हुए गोलीकांड पर परदा डाला जा सके और प्रशासन की साफ-सुथरी छवि को सामने लाकर आदिवासियों के दमन पर उठी ताज़ा बहस को कमजोर किया जा सके।''

कनहर की जटिल कहानी यहीं रुकने वाली नहीं है। बांध पर लगातार काम जारी है। इलाके में पुलिस बल बढ़ा दिया गया है। जांच दल के आने से जो खबरें और तस्‍वीरें बाहर निकल पायी हैं, उनसे प्रशासन बहुत चिंतित है क्‍योंकि मामला सिर्फ एक अवैधानिक बांध बनाने का नहीं बल्कि पैसों की भारी लूट और बंटवारे का भी है जिसके सामने आने का डर अब पैदा हो गया है। इसके अलावा जांच दल की वापसी के बाद कनहर की ओर राष्‍ट्रीय मीडिया ने भी अपना रुख़ कर लिया है। एनडीटीवी ने छोटी ही सही लेकिन एक अहम खबर आदिवासियों के दमन पर 21 अप्रैल को प्रसारित की है। जांच दल से दुर्व्‍यवहार की खबरें अंग्रेज़ी के अखबारों में आने के बाद उम्‍मीद बंधी है कि कि शायद यह मामला आने वाले दिनों में राष्‍ट्रीय फ़लक पर उठ सकेगा।

इस दौरान कनहर के आदिवासियों के लिए सोशल मीडिया पर अच्‍छा-खासा समर्थन जुटा है। वरिष्‍ठ पत्रकार पंकज श्रीवास्‍तव ने कनहर गोलीकांड पर फेसबुक पर जो लिखा है, सोन नदी के ऊपर फैले अभद्रता के राज पर उससे बेहतर लिखना मुमकिन नहीं:
''यूपी के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने बर्लिन से ट्वीट कर चिंता ज़ाहिर की है हेम्बोल्ट विश्वविदयालय के अभिलेखागार से लोहिया जी की वह थीसिस ग़ायब है जिस पर उन्हें डॉक्टरेट दी गयी थी। ख़बर सुनते ही तमाम समाजवादी पत्रकार और लोहियावादी सोशल मीडिया पर रोना-पीटना मचाने लगे हैं। उन सबके लिए सूचना है कि डॉक्टर लोहिया की थीसिस अधबने कनहर बाँध में ख़ून से लिथड़ी पड़ी है। कुछ पन्ने सोनभद्र पुलिस की संगीनों पर भी चिपके दिखे हैं। दम हो तो बचा लें समाजवादी थीसिस को!''